बीआईएस का मानना है कि भूकंप संबंधी सुरक्षा मानकों को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम है। देशभर में निर्माण कार्यों और भवन निर्माण में इन नए नियमों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया गया है, ताकि भारत को भूकंप से होने वाले संभावित नुकसान से सुरक्षित किया जा सके।

भारत में भूकंप के खतरे से जुड़ा अब तक का सबसे बड़ा अपडेट सामने आया है। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) ने देश का नया सीस्मिक जोन मैप 2025 जारी कर दिया है। इस बार वैज्ञानिकों ने एक नया ‘जोन-6’ जोड़ा है, जिसे अब तक का सबसे खतरनाक जोन माना गया है। पूरा हिमालयी क्षेत्र—जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक—इस नई कैटेगिरी में आ गया है। यह बदलाव केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि आपके घर, आपकी सुरक्षा और भविष्य की बिल्डिंग डिज़ाइनों से सीधे जुड़ा है।
पुराना नक्शा कई दशकों पुराना था और पिछले भूकंपों के रिकॉर्ड पर आधारित था। लेकिन अब नई तकनीक और डेटा के आधार पर पता चला है कि: हिमालय पिछले 200 साल से “शांत” है, यानी जमीन के नीचे भारी ऊर्जा जमा हो चुकी है। पुराने नक्शे में इस लॉक्ड एनर्जी का आकलन नहीं था। जमीन की प्लेटें राज्य या जिले की सीमा नहीं मानतीं, इसलिए हिमालय को टुकड़ों में बांटना गलत था। नए मैप में पूरा हिमालयन आर्क Zone-6 में डाल दिया गया है—सबसे संवेदनशील जोन।
नए डेटा के अनुसार, भारत का 61% भू-भाग मध्यम से गंभीर खतरे वाले जोन में आ गया है। पहले यह आंकड़ा 59% था। यानी देश की करीब 75% आबादी भूकंप जोखिम वाले इलाकों में रहती है। जो शहर दो जोन की सीमा पर हैं, उन्हें अब ऑटोमैटिकली ऊंचे खतरे वाले जोन में रखा जाएगा।
नया मैप बनने में इस्तेमाल हुआ:
Probabilistic Seismic Hazard Assessment (PSHA)
यह तकनीक देखती है:
यह दुनिया की सबसे आधुनिक तकनीक मानी जाती है।
2025 से बनने वाली सभी इमारतों पर नए भूकंप डिजाइन कोड लागू होगा।
नए नियमों की मुख्य बातें:
यह कदम भूकंप में होने वाली मध्यम स्तर पर भी होने वाली मौतों में भारी कमी ला सकता है।
पुरानी इमारतें तुरंत बदलने की जरूरत नहीं, लेकिन: जोन-5 या नए जोन-6 में आने वाले पुराने घरों को रेट्रोफिटिंग की सलाह दी गई है। स्ट्रक्चरल इंजीनियर से घर की मजबूती की जांच कराना जरूरी होगा। खासकर टंकियों, छज्जों, बालकनी और भारी फिटिंग्स को सुरक्षित करना अनिवार्य होगा।
नई मैपिंग में पहली बार PEMA मॉडल अपनाया गया है:
प्रायद्वीपीय भारत (दक्षिण) की प्लेटें स्थिर मानी जाती हैं। इसलिए साउथ इंडिया में जोन में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। लेकिन नई बिल्डिंग के लिए नॉन-स्ट्रक्चरल सेफ्टी के नियम वहाँ भी लागू होंगे।