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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दिल्ली आने की खबर के साथ ही एक बार फिर सरकारी आवासों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि उन्हें राजधानी के सबसे प्रतिष्ठित इलाके लुटियंस दिल्ली में उच्च श्रेणी का बंगला आवंटित किया जा सकता है।

Nitish Kumar : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दिल्ली आने की खबर के साथ ही एक बार फिर सरकारी आवासों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि उन्हें राजधानी के सबसे प्रतिष्ठित इलाके लुटियंस दिल्ली में उच्च श्रेणी का बंगला आवंटित किया जा सकता है। चर्चा इस बात की है कि उनके लिए टाइप-8 श्रेणी का आवास तय हो सकता है, जो केंद्र सरकार के सबसे खास सरकारी घरों में गिना जाता है। इसी बहाने यह सवाल भी फिर उठने लगा है कि आखिर सांसद, मंत्री, जज और अफसरों को किस आधार पर अलग-अलग तरह के सरकारी मकान दिए जाते हैं।
दिल्ली में सरकारी आवास केवल रहने की सुविधा नहीं होते, बल्कि वे किसी व्यक्ति के पद, जिम्मेदारी, सुरक्षा और प्रोटोकॉल को भी दर्शाते हैं। राजधानी के वीवीआईपी क्षेत्र लुटियंस जोन में टाइप-1 से लेकर टाइप-8 तक अलग-अलग श्रेणियों के आवास मौजूद हैं। इनकी श्रेणी आवास के आकार, स्थान, सुविधाओं, सुरक्षा व्यवस्था और संबंधित व्यक्ति के पद के आधार पर तय होती है। यही वजह है कि ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को अधिक बड़ी और सुरक्षित श्रेणी के आवास मिलते हैं। टाइप-8 बंगला सरकारी आवास व्यवस्था की सबसे प्रतिष्ठित श्रेणियों में शामिल होता है। यह आवास आमतौर पर उन लोगों को दिया जाता है जो देश के सर्वोच्च पदों पर रहे हों या जिनकी जिम्मेदारियां बहुत बड़ी मानी जाती हैं। इस श्रेणी के बंगले बड़े क्षेत्रफल में बने होते हैं और इनमें कई बेडरूम, विशाल ड्रॉइंग रूम, डाइनिंग एरिया, स्टडी रूम, गैराज, सर्वेंट क्वार्टर और बड़े लॉन जैसी सुविधाएं होती हैं। सुरक्षा भी यहां बेहद कड़ी रहती है और चौबीसों घंटे निगरानी की व्यवस्था की जाती है।
टाइप-8 श्रेणी के आवास आमतौर पर कैबिनेट मंत्रियों, पूर्व प्रधानमंत्रियों, पूर्व राष्ट्रपतियों, पूर्व उपराष्ट्रपतियों, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों और कुछ अन्य शीर्ष पदाधिकारियों को आवंटित किए जाते हैं। ऐसे आवास केवल सुविधा का मामला नहीं होते, बल्कि यह व्यक्ति के संवैधानिक महत्व और सुरक्षा जरूरतों से भी जुड़ा होता है। यही कारण है कि जब किसी बड़े नेता के लिए टाइप-8 बंगले की चर्चा होती है, तो उसे उनकी राजनीतिक हैसियत के नजरिए से भी देखा जाता है।
टाइप-7 श्रेणी के बंगले भी प्रतिष्ठित सरकारी आवासों में गिने जाते हैं। ये टाइप-8 की तुलना में थोड़े छोटे होते हैं, लेकिन सुविधा और सम्मान के मामले में इनका भी अलग स्थान होता है। इनमें बड़े कमरे, बैठक, डाइनिंग हॉल, स्टडी रूम, लॉन, सर्वेंट क्वार्टर और खुला परिसर होता है। इस तरह के आवास राज्य मंत्रियों, वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों, कई बार सांसद रह चुके नेताओं या विशेष पात्रता रखने वाले लोगों को दिए जा सकते हैं।
टाइप-6 बंगले आकार में टाइप-7 से कुछ छोटे होते हैं, लेकिन आराम और उपयोगिता के लिहाज से इन्हें भी पर्याप्त माना जाता है। इनमें आमतौर पर चार या पांच बेडरूम, बड़ा हॉल, पार्किंग, गार्डन और स्टाफ के लिए अलग व्यवस्था होती है। यह श्रेणी उन सांसदों, पूर्व मुख्यमंत्रियों, पूर्व राज्यपालों या अन्य वरिष्ठ पदों पर रहे व्यक्तियों को दी जा सकती है, जो इस स्तर की सुविधा के पात्र माने जाते हैं।
पहली बार चुनकर आने वाले सांसदों को आमतौर पर टाइप-5 या कई मामलों में टाइप-6 श्रेणी के आवास या फ्लैट दिए जाते हैं। ये आवास शीर्ष श्रेणी के बंगलों जैसे विशाल नहीं होते, लेकिन इनमें जरूरी सभी मूलभूत सुविधाएं रहती हैं। दो या तीन बेडरूम, छोटा लॉन, बैठक और सीमित स्टाफ स्पेस जैसी सुविधाएं इनमें शामिल हो सकती हैं। यह व्यवस्था इस बात को ध्यान में रखकर की जाती है कि जनप्रतिनिधि को राजधानी में उचित स्तर का सरकारी ठिकाना मिल सके।
टाइप-1 से टाइप-4 तक की श्रेणियां मुख्य रूप से सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए होती हैं। ये अक्सर फ्लैट या छोटे आवासीय यूनिट के रूप में होते हैं और राजधानी के अलग-अलग सरकारी आवासीय इलाकों में स्थित रहते हैं। इनका आवंटन संबंधित कर्मचारी के पद, वेतन स्तर और सेवा श्रेणी के आधार पर किया जाता है। वरिष्ठता बढ़ने के साथ आवास की श्रेणी भी बदलती जाती है।
टाइप-4 श्रेणी के आवास अपेक्षाकृत बड़े फ्लैट माने जाते हैं। इनमें दो या तीन बेडरूम, बैठक, रसोई और बाथरूम जैसी सुविधाएं होती हैं। इस श्रेणी के आवास आमतौर पर वरिष्ठ ग्रुप-बी या जूनियर ग्रुप-ए अधिकारियों को मिलते हैं। यह सुविधा उन अधिकारियों के लिए होती है जो प्रशासनिक ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन अभी शीर्ष श्रेणी के पदों तक नहीं पहुंचे होते।
टाइप-3 श्रेणी के आवास मध्यम स्तर के अधिकारियों के लिए बनाए जाते हैं। इनमें आमतौर पर दो कमरे, एक लिविंग एरिया, रसोई और बाथरूम की सुविधा होती है। वहीं टाइप-2 श्रेणी इससे छोटी होती है, जिसमें एक बेडरूम, छोटा बैठक कक्ष, रसोई और बाथरूम होता है। ये आवास अक्सर असिस्टेंट, स्टेनो, इंस्पेक्टर या अन्य मध्यम और कनिष्ठ स्तर के कर्मचारियों को दिए जाते हैं।
टाइप-1 सरकारी आवास व्यवस्था की सबसे छोटी श्रेणी मानी जाती है। इनमें एक कमरा, रसोई और बाथरूम जैसी बुनियादी सुविधाएं होती हैं। ऐसे आवास सामान्य तौर पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों, ड्राइवरों या सपोर्ट स्टाफ को दिए जाते हैं। इन घरों में अतिरिक्त जगह या विशेष सुविधाएं नहीं होतीं, लेकिन यह सरकारी सेवा में काम करने वाले निचले स्तर के कर्मचारियों के लिए बुनियादी आवास व्यवस्था का हिस्सा होते हैं।
सरकारी आवास का आवंटन मनमाने तरीके से नहीं होता, बल्कि इसके पीछे तय नियम, पात्रता और प्रोटोकॉल काम करते हैं। संबंधित व्यक्ति का पद, उसकी वर्तमान जिम्मेदारी, सुरक्षा की जरूरत, सेवा रिकॉर्ड और सरकारी नियम यह तय करते हैं कि उसे किस श्रेणी का घर मिलेगा। कई बार विशेष परिस्थितियों में अपवाद भी देखने को मिलते हैं, लेकिन सामान्य तौर पर आवंटन पूरी व्यवस्था और अधिकारिता के आधार पर किया जाता है। Nitish Kumar