एक चैनल पर काफी दिन पहले एक रिपोर्ट देखी जो बहुत अच्छी लगी। ऐसी रिपोर्ट देश के प्रत्येक स्कूल में दिखाई जानी चाहिए। रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के एक गांव की थी, जहां के स्कूल के मास्टर जी का तबादला हुआ था। मास्टरजी के तबादले पर स्कूल के बच्चे फूट-फूट कर रो रहे थे। मास्टर जी को विदा करने के लिए पूरा गांव इकट्ठा था। ढोल-ताशे के साथ उन्हें गांव से बाहर तक विदा किया गया। उन्हें विदा करके गांव के लोग और बच्चे अश्रुपूरित नेत्रों से घर लौट आए।
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मास्टर जी ने गांव के बच्चों में स्कूल जाने की आदत डाली थी। गांव के बच्चों को पढ़ाया था। अन्य विषयों के साथ गांव के बच्चे अंग्रेजी में भी पारंगत हो गए थे। एक बड़ी बात और गांव में कोई ऐसा बच्चा नहीं था, जिसकी पढ़ने की उम्र हो और वह स्कूल ना आता हो। मास्टर जी के इसी गुण के चलते उन्हें विदा करते हुए, बच्चे फूट-फूटकर रोए थे। बच्चों के मां-बाप अश्रुपूरित थे।
यह एक उदाहरण है, एक सबक है, उन सरकारी मस्साबों के लिए, जो स्कूल तो जाते हैं लेकिन बच्चों को पढ़ाना अपनी ड्यूटी का हिस्सा नहीं मानते हैं। सरकारी ग्रामीण स्कूलों में अध्यापक इसलिए रोजाना पहुंचते हैं, ताकि वेतन समय पर मिलता रहे। ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण मेरी आंखों के सामने से गुजरे हैं कि बड़े मास्साब (प्रधानाध्यापक), छोटे मास्साब से कहकर अपने निजी काम से निकल जाते हैं और छोटे मास्साब भी स्कूल को बच्चों के हवाले छोड़ कर घर निकल जाते हैं। इन स्कूलों के अध्यापक अपने लिए साग, दही, मट्ठा तो आमतौर पर बच्चों मंगाते ही रहते हैं और जो नहीं लाता है, उसे मुर्गा बना देते हैं। बस एक बात जरूर अच्छी है कि इन स्कूलों में बच्चों को फेल करने की परंपरा नहीं के बराबर है।
जिस अध्यापक के तबादले पर बच्चे रो रहे थे, वह निश्चित रूप से पढ़ने पढ़ाने में विश्वास रखते होंगे। उन्हें खुद को भी सप्ताह के दिनों और साल के महीनों की अंग्रेजी स्पेलिंग पता होगी। उन्हें पता होगा कि प्रदेश का मुख्यमंत्री और देश का प्रधानमंत्री कौन है और ये तमाम बातें उनके स्कूल के बच्चे भी जानते हैं।
मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं ताकि यह बात समझी जा सके कि स्कूलों में सुधार हो सकता है। बशर्ते अध्यापक अपनी ड्यूटी को सही तरीके से निभाने का संकल्प ले लें। यदि अध्यापक यह मान लें कि वह बच्चों को नहीं पढ़ा रहे बल्कि देश का भविष्य बनाने का महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं, तो हर स्कूल की तस्वीर बदल जाएगी। लेकिन सरकार को उन लोगों पर भी लगाम लगानी होगी, जो पैसा बांटते और पैसा लेते हैं। बस एक बात का दु:ख है, आदर्श मास्साब की खबर मुझे किसी अखबार में देखने को नहीं मिली थी।