भारत के गणतंत्र दिवस की इस खास परम्परा को नहीं जानते आप

भारत के गणतंत्र दिवस पर विदेशी मेहमान को मुख्य अतिथि बनाने की बहुत पुरानी परम्परा है। गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि की यह परम्परा उतनी ही पुरानी है जितना पुराना भारत का गणतंत्र दिवस है।

गणतंत्र दिवस समारोह
गणतंत्र दिवस समारोह
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar23 Jan 2026 02:33 PM
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Republic Day : भारत का गणतंत्र दिवस भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए बहुत बड़ा पर्व होता है। 26 जनवरी 2026 को भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। भारत के गणतंत्र दिवस की अनेक विशेषताएं हैं। गणतंत्र दिवस की विशेषताओं में एक विशेषता यह भी है कि गणतंत्र दिवस के मौके पर किसी ना किसी देश के राष्ट्राध्वज को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया जाता है। भारत के गणतंत्र दिवस पर विदेशी मेहमान को मुख्य अतिथि बनाने की बहुत पुरानी परम्परा है। गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि की यह परम्परा उतनी ही पुरानी है जितना पुराना भारत का गणतंत्र दिवस है।

भारत के पहले गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि थे इंडोनेशिया के राष्ट्रपति

देश के 77वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि होंगे यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन। गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथियों की परंपरा 1950 से जारी है। बेशक, मुख्य अतिथि की उपस्थिति न केवल 26 जनवरी को निकलने वाली परेड की शोभा बढ़ाती है, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों, व्यापार, रक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को गति देती है। भारत जब अपना पहला गणतंत्र दिवस मना रहा था, तब इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। उस समय परेड इर्विन स्टेडियम (अब दादा ध्यानचंद स्टेडियम) में आयोजित की गई थी। हालांकि, 1952 और 1953 के गणतंत्र दिवस समारोह में विभिन्न कारणों से कोई मुख्य अतिथि नहीं था। 1955 से परेड राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर स्थायी रूप से आयोजित होने लगी। 1955 में पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद को आमंत्रित किया गया। वह महिंद्रा एंड महिंद्रा के संस्थापकों में से एक थे।

अनेक महान हस्ती बन चुकी हैं भारत की मुख्य अतिथि

भारत में गणतंत्र दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथियों की परम्परा की आगे बात करें तो 1960 में सोवियत संघ के राष्ट्रपति क्लिमेंट वोरोशिलोव और 1961 में ब्रिटेन की रानी एलिजाबेथ द्वितीय जैसे नेता गणतंत्र दिवस परेड में शामिल हुए। 1966 में कोई अतिथि नहीं था। अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों का 1970 के दशक में प्रतिनिधित्व बढ़ा। 1980 के दशक में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई, और मुख्य अतिथियों के चयन में विकसित देशों पर जोर दिया गया। 1995 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला आए। इस दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस और पूर्वी यूरोप के देशों पर ध्यान केंद्रित हुआ। 2007 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और 2010 में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली म्युंग-बाक जैसे नेता मुख्य अतिथि बने। इस दशक में भारत की 'लुक ईस्ट' नीति पर जोर दिया गया। 2015 में बराक ओबामा, पहले अमेरिकी राष्ट्रपति, मुख्य अतिथि थे। यह भारत-अमेरिका संबंधों में मील का पत्थर था। 2018 में आसियान के 10 नेता (पहली बार सामूहिक आमंत्रण) मुख्य अतिथि बने। 2021 व 2022 में कोविड के कारण कोई मुख्य अतिथि नहीं था। मिस्त्र के राष्ट्रपति 2023 में, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों 2024 में, और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो 2025 में मुख्य अतिथि बने। इस परंपरा का महत्व भारत की विदेश नीति के साथ गहराई से जुड़ा है। मुख्य अतिथि के चयन से भारत अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाता है। यह परंपरा न केवल सैन्य शक्ति प्रदर्शन है, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम भी है, जहां मुख्य अतिथि भारतीय संस्कृति, विविधता और प्रगति से परिचित होते हैं। Republic Day

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पूरी दुनिया में मनाई जाती है नेता जी सुभाष चंद्र बोस की जयंती

भारत सरकार ने नेता जी सुभाष चंद्र बोस को सम्मान प्रदान करते हुए 23 जनवरी के दिन को पराक्रम दिवस घोषित कर रखा था। भारत सरकार की तरफ से नेता जी सुभाष चंद्र बोस की जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है।

नेता जी सुभाष चंद्र बोस
नेता जी सुभाष चंद्र बोस
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar23 Jan 2026 01:01 PM
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Netaji Subhas Chandra Bose's birth anniversary: केवल भारत ही नहीं पूरी दुनिया में नेता जी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मनाई जाती है। हर साल 23 जनवरी को भारत सहित पूरी दुनिया में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के चाहने वाले उनकी जयंती मनाते हैं। 23 जनवरी 2026 को नेता जी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती मनाई जा रही है। भारत सरकार ने नेता जी सुभाष चंद्र बोस को सम्मान प्रदान करते हुए 23 जनवरी के दिन को पराक्रम दिवस घोषित कर रखा था। भारत सरकार की तरफ से नेता जी सुभाष चंद्र बोस की जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है।

नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने ICS की नौकरी को मार दी थी लात

पूरी दुनिया में नेता जी के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को हुआ था। वह जानकीनाथ बोस और प्रभावती देवी की नौवीं संतान थे। वह शुरु से ही एकेडमिक्स में काफी तेज थे। उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से फिलॉसफी की डिग्री हासिल की और बाद में इंग्लैंड में भारतीय सिविल सेवा (ICS ) परीक्षा दी। नेता जी ने ICS की परीक्षा में हाई रैंक हासिल की थी। ICS की नौकरी को अंग्रेजों की गुलामी बताते हुए नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने ICS की नौकरी को लात मार दी थी। सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिश शासन के तहत एक विशेषाधिकार प्राप्त नौकरी को चुनने बजाय स्वतंत्रता आंदोलन के अनिश्चित मार्ग को चुनते हुए सेवा से इस्तीफा दे दिया। सुभाष चंद्र बोस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत इंडियन नेशनल कांग्रेस से की और इसमें अलग-अलग पद पर तेजी से आगे बढ़े। उन्हें 1938 (हरिपुरा) और 1939 (त्रिपुरी) में कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया। हालांकि, बोस और वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद उभरे, खासकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन संघर्ष और सशस्त्र प्रतिरोध के उपयोग को लेकर। जहां महात्मा गांधी और अन्य लोगों ने अहिंसा पर जोर दिया, वहीं बोस का मानना था कि स्वतंत्रता के लिए तत्काल और निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता है। इन मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया।

आजाद हिन्द फौज के गठन से पूरी दुनिया को चौंका दिया था नेता जी ने

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सुभाष चंद्र बोस 1941 में ब्रिटिश निगरानी से बच निकले और औपनिवेशिक शासन को चुनौती देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मांगा। जर्मनी में काम करने के बाद, वह दक्षिण पूर्व एशिया चले गए, जहां उन्होंने जापानी समर्थन से भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) का नेतृत्व संभाला। 1943 में, उन्होंने आजाद हिंद फौज की अंतरिम सरकार के गठन की घोषणा की और भारत की संप्रभुता के दावे पर जोर दिया। हालांकि, INA का सैन्य अभियान अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका, लेकिन इसका गहरा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ा, जिससे पूरी दुनिया में राष्ट्रवादी भावना मजबूत हुई। सुभाष चंद्र बोस का जोशीला नारा, ‘तुम मुझे खून दो और मैं तुम्हें आजादी दूंगा’भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे शक्तिशाली नारों में से एक बना।

रहस्य के पर्दे में खो गई नेता जी की मौत

कथित तौर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 1945 में एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। हालांकि, उनके गायब होने के आसपास की परिस्थितियां अभी भी बहस का विषय बनी हुई हैं। इन अनसुलझे सवालों के बावजूद, एक निडर राष्ट्रवादी और रणनीतिक विचारक के तौर पर नेताजी की विरासत कायम है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती 2026 पर भारत उनके इस विश्वास को याद करता है कि आजादी के लिए हिम्मत, बलिदान और कार्रवाई की जरूरत होती है, भले ही इसके लिए लीग से हटकर रास्ते अपनाने पड़ें। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दुनिया को अनेक नारे दिए थे।  ‘‘तुम मुझे खून दो और मैं तुम्हें आजादी दूंगा!’’ उनका प्रमुख नारा था। इसी प्रकार ‘‘आजादी दी नहीं जाती, ली जाती है’’ भी सुभाष चंद्र बोस का प्रिय नारा रहा था।  इसी प्रकार ‘‘ इतिहास में कोई भी असली बदलाव चर्चाओं से हासिल नहीं हुआ है।’’ इसी प्रकार ‘‘एक व्यक्ति किसी विचार के लिए मर सकता है, लेकिन वह विचार उसकी मृत्यु के बाद, हजार जिंदगियों में फिर से जन्म लेगा’’ और ‘‘आज हमारी बस एक ही इच्छा होनी चाहिए- मरने की इच्छा, ताकि भारत जीवित रह सके’’ जैसे अनेक नारों ने सुभाष चंद्र बोस के आंदोलन को ऊंचाई तक पहुंचाने का काम किया था। Subhas Chandra Bose's birth Anniversary

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भारत के लिए बहुत ही खास है 23 जनवरी का इतिहास

23 जनवरी का दिन हर साल नेता जी सुभाष चन्द बोस की जयंती मनाई जाती है। जिस प्रकार भारत कभी भी नेता जी सुभाष चंद बोस को नहीं भूल सकता उसी प्रकार 23 जनवरी के इतिहास को भी नहीं भूल सकता।

23 जनवरी: जानिए आज के दिन की कहानी
23 जनवरी: जानिए आज के दिन की कहानी
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar23 Jan 2026 12:42 PM
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23 January History : 23 जनवरी का इतिहास भारत के लिए बहुत ही खास इतिहास है। 23 जनवरी के इतिहास के साथ भारत की अनेक महान विभूतियों का इतिहास जुड़ा हुआ है। 23 जनवरी ही वह दिन है जिस दिन भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म हुआ था। 23 जनवरी का दिन हर साल नेता जी सुभाष चन्द बोस की जयंती मनाई जाती है। जिस प्रकार भारत कभी भी नेता जी सुभाष चंद बोस को नहीं भूल सकता उसी प्रकार 23 जनवरी के इतिहास को भी नहीं भूल सकता।

23 जनवरी के इतिहास से जुड़ा है भारत का इतिहास

23 जनवरी का इतिहास भारत के इतिहास का स्वर्णिम दिन है। 23 जनवरी 1897 को भारत के लाड़ले पुत्र सुभाष चंद बोस का जन्म हुआ था। नेता जी सुभाष चंद बोस ने भारत को आजाद कराने का जो काम किया था उसे भारत कभी भी नहीं भूल सकता। 23 जनवरी का इतिहास भारत की राजनीति से गहरे तौर पर जुड़ा हुआ इतिहास है। 23 जनवरी को ही वर्ष-1977 में भारत की उस समय की प्रमुख राजनीति पार्टी जनता पार्टी का गठन हुआ था। 23 जनवरी के दिन ही भारत की राजनीति को नई दिशा देने वाले शिव सेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे का जन्म हुआ था।

23 जनवरी के इतिहास से जुड़ी हुई प्रमुख घटनाएं

23 जनवरी से जुड़ी हुई प्रमुख घटनाओं की बात करें तो 23 जनवरी 1965 को टेलीकोटा की लड़ाई के कारण हिन्दू साम्राज्य विजयवाड़ा का पतन हो गया था।

23 जनवरी 1664 को शिवाजी के पिता शाहजी का निधन हुआ था। 

23 जनवरी 1849 को एलिजाबेथ ब्लैकवेल मेडिकल डिग्री हासिल करने वाली पहली अमेरिकी महिला बनीं थी।

23 जनवरी 1897 को भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकने वाले सुभाष चंद्र बोस का जन्म हुआ था।

23 जनवरी 1920 को वायु परिवहन और वायु डाक सेवा की शुरुआत हुई थी।

23 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र की राजनीति की नब्ज समझने वाले बाल ठाकरे का जन्म हुआ था।

23 जनवरी 1965 को दुर्गापुर इस्पात संयत्र में काम करना शुरू किया था। 

23 जनवरी 1973 को अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन द्वारा वियतनाम शांति समझौते की घोषणा की थी।

23 जनवरी 1976 को गौतमबुद्ध के लापता शहर कपिलवस्तु को खुदाई के बाद ढूंढ निकाला गया था।

23 जनवरी 1983 को स्वीडिश टेनिस खिलाड़ी ब्योर्न बोर्ग ने संन्यास की घोषणा की थी।

23 जनवरी 1997 को अमेरिका की पहली महिला विदेश मंत्री मंडलीन अल्बाइट से राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की सरकार में पदभार संभाला था।

23 जनवरी 2002 को अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल का पाकिस्तान के कराची से अपहरण कर लिया गया। बाद में, उनकी हत्या कर दी गई थी।

23 जनवरी 2020 को भारतीय गृह मंत्रालय ने सुभाष चंद्र बोस आपदा प्रबंधन पुरस्कार 2020 के विजेताओं की घोषणा की थी। 23 January History

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