पांचवीं बार JDU अध्यक्ष बनने की ओर नीतीश कुमार, जल्द हो सकता है ऐलान

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। पार्टी की ओर से उनके नामांकन की प्रक्रिया पूरी कर दी गई है और माना जा रहा है कि वह इस पद पर निर्विरोध चुने जाएंगे।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar19 Mar 2026 04:42 PM
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Bihar News : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। पार्टी की ओर से उनके नामांकन की प्रक्रिया पूरी कर दी गई है और माना जा रहा है कि वह इस पद पर निर्विरोध चुने जाएंगे। जानकारी के मुताबिक, नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। हालांकि वह खुद दिल्ली नहीं पहुंचे। उनकी ओर से जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने निर्वाचन अधिकारी अनिल हेगड़े को नामांकन पत्र सौंपा। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने उनके नाम का प्रस्तावक बनकर समर्थन जताया है।

24 मार्च को हो सकती है आधिकारिक घोषणा

निर्वाचन अधिकारी अनिल हेगड़े ने बताया कि नीतीश कुमार के नामांकन पत्र दो सेट में प्राप्त हुए हैं। यदि 22 मार्च तक किसी अन्य उम्मीदवार का नामांकन दाखिल नहीं होता है, तो 24 मार्च को उन्हें औपचारिक रूप से राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया जा सकता है। संजय झा ने भी स्पष्ट किया कि अगर मुकाबले में दूसरा कोई उम्मीदवार नहीं आता है, तो नीतीश कुमार की ताजपोशी तय है। अध्यक्ष पद की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पार्टी की राष्ट्रीय परिषद और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भी आयोजित की जाएगी। चूंकि जेडीयू का राष्ट्रीय कार्यालय दिल्ली में स्थित है, इसलिए राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यभार भी यहीं से संचालित होगा।

पांचवीं बार अध्यक्ष बनने की ओर नीतीश कुमार

पार्टी की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, 15 मार्च से 22 मार्च 2026 तक अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल किए जा सकते हैं। इसके बाद 23 मार्च को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 24 मार्च नाम वापस लेने की अंतिम तारीख तय की गई है। अगर एक से अधिक उम्मीदवार मैदान में आते हैं, तो 27 मार्च को चुनाव कराया जाएगा। जेडीयू ने इस संबंध में 16 मार्च 2026 को औपचारिक चुनाव कार्यक्रम जारी किया था। यदि सब कुछ तय कार्यक्रम के मुताबिक रहा, तो जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में यह नीतीश कुमार का पांचवां कार्यकाल होगा। वह पहली बार अप्रैल 2016 में इस पद पर पहुंचे थे, जब उन्होंने वरिष्ठ नेता शरद यादव से कमान संभाली थी। इसके बाद 2019 में उन्हें दोबारा अध्यक्ष चुना गया। हालांकि 2020 में उन्होंने आरसीपी सिंह के लिए यह पद छोड़ा। बाद में दिसंबर 2023 में उन्होंने एक बार फिर पार्टी की कमान संभाली थी, जब उन्होंने अपने सहयोगी और मौजूदा केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह से राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदभार लिया था। Bihar News

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गुजरात में हलाला प्रथा पर रोक की तैयारी, सदन में रखा गया UCC विधेयक

गुजरात सरकार ने राज्य विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पेश कर दिया है। इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे नागरिक मामलों में सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करना है।

हलाला प्रथा
हलाला प्रथा
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar19 Mar 2026 04:16 PM
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Gujarat News : गुजरात सरकार ने राज्य विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पेश कर दिया है। इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे नागरिक मामलों में सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करना है। इस विधेयक को लेकर सबसे अधिक चर्चा उस प्रावधान की हो रही है, जिसमें हलाला जैसी प्रथा पर रोक की बात कही गई है। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि हलाला क्या है, इसे लेकर विवाद क्यों है और इस पर आपत्ति क्यों जताई जाती रही है।

क्या होती है हलाला प्रथा?

हलाला, जिसे आम बोलचाल में निकाह हलाला कहा जाता है, मुस्लिम समाज से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील और लंबे समय से विवादों में रहने वाला मुद्दा है। परंपरागत व्याख्या के अनुसार, यदि किसी महिला को उसके पति ने तलाक दे दिया हो और बाद में वही पति उससे दोबारा निकाह करना चाहे, तो यह सीधे संभव नहीं माना जाता। ऐसी स्थिति में महिला को पहले किसी दूसरे पुरुष से वैध निकाह करना होता है। इस दूसरे विवाह को केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि वास्तविक वैवाहिक संबंध के रूप में देखा जाता है। बाद में यदि दूसरा विवाह समाप्त हो जाता है, तब महिला अपने पहले पति से दोबारा निकाह कर सकती है। हालांकि, इस विषय पर कई इस्लामी विद्वानों की राय है कि हलाला के नाम पर जो कुछ व्यवहार में कराया जाता है, उसमें मूल धार्मिक नियमों की अक्सर गलत व्याख्या की जाती है और कई बार उन्हें तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है।

इस्लामी विद्वानों की क्या है राय?

इस मुद्दे पर इस्लामी विद्वानों के बीच भी एक जैसी राय नहीं है। कई विद्वानों का कहना है कि हलाला के नाम पर जो कुछ व्यवहार में कराया जाता है, वह इस्लाम की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। उनका तर्क है कि यदि किसी महिला का निकाह सिर्फ इस उद्देश्य से किसी दूसरे पुरुष से कराया जाए कि बाद में वह पहले पति के पास लौट सके, तो ऐसी पूर्वनियोजित व्यवस्था धार्मिक रूप से स्वीकार्य नहीं मानी जाती।

कई इस्लामी जानकार यह भी मानते हैं कि हलाला के लिए दूसरा निकाह वास्तविक और वैध होना चाहिए, न कि किसी तयशुदा समझौते या औपचारिकता के रूप में। यदि यह पूरी प्रक्रिया दबाव, सौदेबाजी या मजबूरी के आधार पर कराई जाए, तो यह न केवल धार्मिक दृष्टि से गलत है, बल्कि नैतिक और कानूनी सवाल भी खड़े करती है।

हलाला की आलोचना क्यों होती है?

हलाला प्रथा का विरोध करने वालों का कहना है कि यह महिलाओं की गरिमा, स्वतंत्रता और अधिकारों के खिलाफ है। आलोचकों के अनुसार, किसी महिला को अपने पहले पति से दोबारा विवाह करने के लिए किसी तीसरे पुरुष से निकाह करने की शर्त में बांधना उसके सम्मान और इच्छा, दोनों के साथ समझौता है। महिला अधिकारों से जुड़े कई समूहों का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था महिलाओं को मानसिक, सामाजिक और शारीरिक दबाव में डाल सकती है। इसी वजह से हलाला को लेकर लगातार कानूनी, सामाजिक और धार्मिक स्तर पर बहस होती रही है।

गुजरात के UCC विधेयक से क्या बदल सकता है?

गुजरात विधानसभा में पेश किए गए UCC विधेयक का मकसद नागरिक कानूनों में समानता लाना है। यदि यह विधेयक कानून बनता है, तो विवाह, तलाक, पुनर्विवाह, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े नियम धर्म आधारित अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय एक समान ढांचे में आ जाएंगे। ऐसी स्थिति में तीन तलाक और उससे जुड़ी हलाला जैसी प्रथाओं को कानूनी मान्यता नहीं मिलेगी। इसका सीधा असर यह होगा कि धर्म आधारित अलग-अलग व्यवस्थाओं की जगह सभी नागरिकों के लिए समान नियम लागू होंगे और हलाला जैसी प्रथा कानूनी रूप से अप्रासंगिक हो सकती है। Gujarat News

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सांपों के जहर बेचने के केस में एल्विश यादव को सुप्रीम राहत

हरियाणा के मशहूर यूट्यूबर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर एल्विश यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने वर्ष 2023 के चर्चित स्नेक वेनम मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है।

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर एल्विश यादव
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर एल्विश यादव
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar19 Mar 2026 01:20 PM
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Elvish Yadav : हरियाणा के मशहूर यूट्यूबर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर एल्विश यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने वर्ष 2023 के चर्चित स्नेक वेनम मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है। यह मामला नवंबर 2023 में नोएडा में कथित रेव पार्टी के दौरान सांपों और उनके जहर के इस्तेमाल के आरोपों के बाद सामने आया था। इसी मामले में एल्विश यादव को 17 मार्च 2024 को गिरफ्तार भी किया गया था। मामले में आरोप लगाए गए थे कि पार्टियों में मनोरंजन और नशे के उद्देश्य से सांपों तथा उनके जहर का इस्तेमाल किया जा रहा था। यह आरोप वन्यजीव संरक्षण कानून और मादक पदार्थों से जुड़े कानूनी प्रावधानों के तहत गंभीर माने गए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने किन आधारों पर रद्द की एफआईआर?

न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि एनडीपीएस एक्ट, 1985 की धारा 2(23) के तहत जिस कथित साइकोट्रॉपिक पदार्थ का उल्लेख किया गया, वह कानून की अनुसूचित सूची में शामिल ही नहीं है। अदालत ने यह भी माना कि एल्विश यादव के पास से किसी तरह की बरामदगी नहीं हुई थी। कोर्ट ने चार्जशीट का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें केवल यह आरोप था कि एल्विश यादव ने एक सहयोगी के माध्यम से कथित तौर पर ऑर्डर दिया था। ऐसे में अदालत ने पाया कि इस मामले में एनडीपीएस एक्ट का प्रयोग कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 55 का भी जिक्र किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस कानून के तहत अभियोजन की शुरुआत केवल अधिकृत अधिकारी की शिकायत के आधार पर ही हो सकती है। मौजूदा एफआईआर में इस अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था, इसलिए उसे विधिसम्मत नहीं माना जा सकता।

आईपीसी के आरोप भी स्वतंत्र रूप से नहीं टिके

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय दंड संहिता के तहत लगाए गए आरोप अपने आप में स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं होते। अदालत के अनुसार, ये आरोप उस पूर्व शिकायत से जुड़े थे जिसे पहले ही बंद किया जा चुका है। इसी वजह से इन धाराओं के आधार पर भी एफआईआर को कायम रखना उचित नहीं माना गया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि एफआईआर को रद्द करने का फैसला कानूनी और प्रक्रियागत आधारों पर लिया गया है। अदालत ने मामले के तथ्यों या आरोपों की सच्चाई पर कोई टिप्पणी नहीं की है। यानी कोर्ट ने यह नहीं कहा कि आरोप सही थे या गलत, बल्कि यह कहा कि मौजूदा कानूनी प्रक्रिया के आधार पर एफआईआर टिक नहीं सकती। अदालत ने सक्षम प्राधिकरण को यह स्वतंत्रता भी दी है कि वह कानून के मुताबिक उचित प्रक्रिया अपनाकर दोबारा कार्रवाई शुरू कर सकता है। विशेष रूप से वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 55 के तहत नई शिकायत दाखिल कर कानूनी कदम उठाने का रास्ता खुला रखा गया है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने जताई थी सख्ती

इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि यदि प्रभावशाली और लोकप्रिय लोग आवाजहीन जीवों, खासकर सांपों, का इस तरह इस्तेमाल करते हैं तो समाज में गलत संदेश जा सकता है। कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया था कि क्या किसी को चिड़ियाघर में जाकर जानवरों के साथ मनमर्जी करने की अनुमति दी जा सकती है और क्या ऐसा करना कानून का उल्लंघन नहीं होगा।

एल्विश यादव की ओर से क्या दलील दी गई?

एल्विश यादव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने अदालत में दलील दी थी कि वह एक वीडियो शूट के सिलसिले में गायक फाजिलपुरिया के निमंत्रण पर कार्यक्रम से जुड़े थे। बचाव पक्ष ने कहा कि कथित रेव पार्टी के पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं और न ही किसी मादक पदार्थ के इस्तेमाल का स्पष्ट सबूत है। बचाव पक्ष ने लैब रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह भी दावा किया कि बरामद किए गए नौ सांप विषैले नहीं थे। साथ ही यह भी कहा गया कि एल्विश यादव घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे।

राज्य सरकार का पक्ष क्या था?

वहीं राज्य पक्ष ने अदालत में कहा था कि पुलिस ने मौके से नौ सांप बरामद किए थे, जिनमें पांच कोबरा बताए गए। राज्य सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि सांप के जहर के इस्तेमाल के संकेत मिले थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से यह भी पूछा था कि सांप का जहर किस तरह निकाला जाता है और कथित तौर पर पार्टियों में उसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है। Elvish Yadav

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