बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से पलट कर रख दिया है। इस बार के चुनाव परिणामों ने जातीय आधार पर राजनीति का नया परिदृश्य सामने लाया है, जिसमें सवर्ण, ओबीसी, दलित और मुस्लिम समुदायों के विधायकों की संख्या में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है।

बता दे कि इस बार के चुनाव में सवर्ण जातियों से जीतकर आए विधायकों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। 2020 में जहां 64 सवर्ण विधायक जीतकर आए थे, वहीं इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 72 हो गया है। इसमें राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण और कायस्थ जैसे समुदाय प्रमुख हैं। भाजपा और जेडीयू जैसी प्रमुख पार्टियों ने भी सवर्ण वोट बैंक को सहेजने में सफलता हासिल की है।
बिहार की कुल 243 विधानसभा सीटों में से लगभग आधी, यानी 120 सीटों पर पिछड़ी जातियों और अतिपिछड़ी जातियों का वर्चस्व रहा है। ओबीसी और ईबीसी से 83 और 37 विधायक जीतकर आए हैं। कुशवाहा, कुर्मी, यादव और वैश्य जैसे समुदायों का प्रतिनिधित्व भी इस चुनाव में बढ़ा है। खास बात यह है कि कुशवाहा जाति से 7 विधायक, वैश्य से 11, कुर्मी से 2 और यादव से 4 विधायक चुने गए हैं।
मुस्लिम समुदाय के विधायकों की संख्या इस बार अब तक के सबसे कम 11 पर आ पहुंची है। 2020 में 19 मुस्लिम विधायक चुने गए थे। इस बार AIMIM से 5, आरजेडी से 3, कांग्रेस से 2 और जेडीयू से 1 मुस्लिम विधायक जीतकर आए हैं। यह संख्या बिहार के मुस्लिम मतदाताओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में गिरावट को दर्शाती है।
दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व इस बार भी कायम रहा है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर 40 विधायक चुने गए हैं, जिनमें बीजेपी से 12 और जेडीयू से 14 विधायक हैं। पासवान और रविदास जैसे समुदायों के भी प्रतिनिधि इस बार विजेता रहे हैं।