
गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति श्रद्धा ,भक्ति व आदर प्रकट करने का दिन है। हालांकि शिष्यों के हृदय में गुरु प्रतिपल रहते हैं। लेकिन शिष्यों के लिए अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए यह दिन विशेष अवसर के रूप में आता है। जरूरी नहीं कि गुरु सशरीर ही हों, गुरु देह त्याग चुके भी हो सकते हैं । हम आपको याद दिला दें कि हम यहां शिक्षा गुरु की बात नहीं कर रहे हैं। उनके लिए शिक्षक दिवस है। यहां हम उस गुरु की बात कर रहे हैं जिन्होंने ईश्वर प्राप्त कर लिया है तथा जो अपने शिष्यों को आत्मसाक्षात्कार का मार्ग दिखाते हैं।
ईश्वर प्राप्ति अर्थात आत्म साक्षात्कार के मार्ग पर चलने वालों के लिए गुरु का मिलना जरूरी है,गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति कठिन ही नहीं दुर्लभ है तथा यह बात भी सत्य है कि ईश्वर की कृपा से ही गुरु की प्राप्ति होती है। बंगाल की महान महिला संत आनंदमयी मां कहती हैं कि जैसे हम किसी अधिकारी या मंत्री से मिलने के पूर्व उनके सचिव से संपर्क करते हैं वैसे ही ईश्वर प्राप्ति के लिए हम गुरु को साधते हैं। इसलिए गुरु का दर्जा काफी ऊंचा हेै। संत कबीर ने तो यहां तक कह दिया कि गुरु गाविंद दोउ खड़े काके लागूं पाय , बलिहारी गुरु आपनो जिन गोविंद दियो बताए। अथार्त कबीर ने गुरु का दर्जा ईश्वर से भी ऊंचा दिया है। कबीर ने यह भी कहा कि गुरु की महिमा वर्णनातीत है।इसे समुद्र को स्याही और धरती को कागज समझ कर भी नहीं लिखा जा सकता।लेकिन बिना शिष्य के गुरु भी अधूरा महसूस करता है। 19 वीं शताब्दी के महान संत रामकृष्ण परमहंस तो रो रो कर अपने शिष्यों को पुकारते थे कि कहां हो तुम लोग सामने क्यों नहीं आ रहे हो। मां काली ने उनसे कहा था कि तुम्हारे अनेक शिष्य होंगे जो समय के अनुसार मिलेंगे। लेकिन रामकृष्ण अपने शिष्यों से मिलने के लिए इतने आतुर थे कि विलंब होने पर वे रो रो कर पुकारते थे कि क्यों नहीं तुम लोग आ रहे हो।कालातंर में उनके अनेक शिष्य हुए जिनमें से एक विवेकानंद को दुनिया जानती है। 20वीं सदी के दक्षिण भारत के महान संत रमण महर्षि बताते हैं कि गुरु अपने शिष्य के ईश्वर प्राप्ति की राह में आने वाले बाधाओं को दूर कर देता है। गुरु ही परमात्मा है।गुरु दिखता है तो मनुष्य की तरह लेकिन वह ईश्वर सदृश्य होता है।