आज स्वर्गीय इंदिरा गांधी का जन्म दिवस है। चार दिन पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जन्म दिवस था। उससे पहले अक्टूबर में इंदिरा गांधी जी की पुण्यतिथि थी। राजीव गांधी की पुण्यतिथि थी। इसी तरह लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, चंद्रशेखर, चौधरी चरण सिंह आदि-आदि पूर्व प्रधानमंत्रियों की जयंती और पुण्यतिथि आती जाती रहती है, लेकिन सरकारी स्तर पर कोई समारोह नहीं होता है।
प्रधानमंत्री मोदी के लिए सदन में और सदन से बाहर एक बार नहीं अनेक बार यह कहा जाता रहा है कि मोदी जी भाजपा और भाजपाइयों के ही नहीं पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं। सही बात है प्रधानमंत्री बनने के बाद कोई नेता केवल एक पार्टी का हो ही नहीं सकता, आखिर उसे पूरे देश की जनता ने प्रधानमंत्री चुना होता है। इसलिए वह देश का प्रधानमंत्री होता है और देश में सारी पार्टियों और पार्टियों के नेता भी आते हैं। मैं पुनः दोहराता हूं कि मोदी जी पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं।
मैं यह नहीं समझ पाता हूं या यूं कहें कि मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि दिवंगत होने के बाद प्रधानमंत्री किसी पार्टी विशेष का ही नेता होकर कैसे और क्यों रह जाता है? पूर्व दिवंगत प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सम्मान दिया जाना क्यों समाप्त कर दिया जाता है? क्या यह परंपरा दिवंगत नेताओं का परोक्ष रूप से अपमान नहीं है? इस बारे में किसी भी पार्टी, किसी भी सरकार ने सोचा क्यों नहीं यह समझ से परे है।
एक वाक्य बुजुर्गों से सुनते हैं सम्मान करोगे तो सम्मान पाओगे। यह वाक्य किसी भी दल के नेता, यहां तक कि किसी भी प्रधानमंत्री के मस्तिष्क में क्यों घर नहीं बना पाया। प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ परंपराओं को तोड़ा है, तोड़ने का सार्थक प्रयास किया है, लेकिन फिर भी इस संकीर्णता से ऊपर नहीं उठ पाए कि पूर्व प्रधानमंत्रियों की समाधि पर जाकर श्रद्धांजलि देने से छवि पर बुरा असर पड़ सकता है।
मेरा दावा है कि यदि मोदी जी पूर्व प्रधानमंत्रियों के जन्मदिवस-पुण्यतिथि पर उनकी समाधि पर जा कर दो फूल चढ़ा आएं, तो उनकी छवि में चार चांद लग जाएंगे। विरोधी दल भी उनकी प्रशंसा करते नजर आएंगे। उनकी छवि एक ऐसे महान नेता की बनेगी, जो राजनीति तो करता है लेकिन सम्मान में भेदभाव नहीं करता। यह ठीक है कि पूर्व प्रधानमंत्रियों में से किसी ने यह पहल नहीं की कि दिवंगत विपक्षी पूर्व प्रधानमंत्रियों की समाधि तक हो आए। मोदी जी चाहें, तो इस विचार को बल दे सकते हैं कि मरणोपरांत भी पूर्व प्रधानमंत्री देश का ही रहता है, किसी एक पार्टी विशेष का होकर नहीं रह जाता है। यह एक बड़ा कदम होगा। मुझे लगता है कि इससे चुनावों में पार्टी की वोटों पर भी सकारात्मक प्रभाव ही पड़ेगा।