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पहलगाम अटैक ने भारत-पाकिस्तान के संबंधों को हमेशा के बदल दिया। दोनों देशों के बीच एक ऐसी लकीर खिंच गई जो शायद कभी पूरी तरह नहीं मिट सके। 7 मई 2025 को भारत ने "ऑपरेशन सिंदूर" शुरू किया।

Pahalgam Attack Anniversary: 22 अप्रैल, 2025 वह तारीख है जिसने पहलगाम को देखने, महसूस करने और याद करने का तरीका ही बदल दिया। यह वह पल था जब घाटी की शांति बिना किसी चेतावनी के टूट गई। पक्षियों के चहचहाने की जगह गोलियों की आवाज़ ने ले ली। छब्बीस जानें चली गईं और उनके साथ ही, उस जगह से सुरक्षा का एहसास भी जाता रहा, जिसे कभी भारत के पर्यटन मानचित्र पर बड़े गर्व से दिखाया जाता था; यह दिन एक ऐसा जख्म दे गया जो भारतवासियों के दिल-दिमाग में हमेशा ताजा रहेगा।
पहलगाम अटैक ने भारत-पाकिस्तान के संबंधों को हमेशा के बदल दिया। दोनों देशों के बीच एक ऐसी लकीर खिंच गई जो शायद कभी पूरी तरह नहीं मिट सके। 7 मई 2025 को भारत ने "ऑपरेशन सिंदूर" शुरू किया। यह भारत की आतंकवाद-विरोधी रणनीति में एक निर्णायक बदलाव था। इस ऑपरेशन में पूरे पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में मौजूद आतंकी ठिकानों पर सुनियोजित और सटीक हमले किए गए। लेकिन पहलगाम वहीं ठहर गया आज वहां क्या माहौल है: -
काले ग्रेनाइट की एक दीवार
स्क्रॉल.इन की एक रिपोर्ट के मुताबिक कश्मीर के खूबसूरत घास के मैदानों वाले पहलगाम जाने वाले ज़्यादातर सैलानियों के लिए, कई सालों से पहला पड़ाव लिद्दर नदी के किनारे पत्थरों से बना खूबसूरत रास्ता रहा है। इसके बीच में, लकड़ी के बीम से बना एक सजावटी फ्रेम है, जिस पर रंग-बिरंगे अक्षरों में “I love Pahalgam” लिखा है; यह सैलानियों के लिए एक मशहूर “सेल्फ़ी पॉइंट” का काम करता है।
लेकिन अब, ठीक 200 मीटर की दूरी पर, काले ग्रेनाइट की एक दीवार लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। इसके ऊपर दो तिरंगे लहरा रहे हैं। जैसे ही आप इसके करीब जाते हैं, आप पत्थर पर उकेरे हुए उन 26 लोगों के नाम देखते हैं, जिन्हें आतंकवादियों ने गोली मार दी थी। यह स्मारक बैसारन घास के मैदान से लगभग 6 किलोमीटर दूर बना है, जहां यह आतंकवादी हमला हुआ था।
पर्यटन गतिविधियों में भारी गिरावट
अटैक के बाद पहलगाम और आस-पास के इलाकों में पर्यटन गतिविधियों में भारी गिरावट आई। होटल एसोसिएशनों और लोकल टूरिज्म ऑपरेटर्स ने गर्मियों के पीक सीजन के दौरान बड़े पैमाने पर बुकिंग रद्द होने की जानकारी दी। गर्मियों के मौसम के अंत तक धीरे-धीरे हालात सुधरने लगे, लेकिन पूरी तरह नहीं।
इस इलाके और इसके आस-पास के होटलों का कहना है कि ऑक्यूपेंसी (कमरों का भरा होना) तो वापस आ रही है, लेकिन एक जैसी नहीं है। गर्मियों का पीक सीज़न अभी भी है, लेकिन अब इसमें पहले जैसी बात नहीं रही।
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक पहलगाम में एक ट्रैवल एजेंसी, गैलेक्टिक गेटवेज के एक प्रतिनिधि ने कहा, “हमले के तुरंत बाद कैंसलेशन में 90–95 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, और कुछ हफ़्तों तक बुकिंग में भी भारी गिरावट आई।” उन्होंने कहा कि अगले कुछ महीनों में हालात धीरे-धीरे सुधरे, जिसमें ज्यादातर उन लोगों का योगदान था जो पहले भी यहां आ चुके थे; पर्यटन कुछ हद तक तो वापस आया, लेकिन पहले के स्तर से नीचे ही रहा।
पहलगाम के 'होटल रॉयल ग्रैंडियोज़' में सेल्स डायरेक्टर शेख खालिद ने कहा, “22 अप्रैल के आतंकी हमले के बाद के हालात कश्मीर के पर्यटन क्षेत्र के लिए बेहद विनाशकारी साबित हुए। इसका असर तुरंत और बहुत गहरा हुआ—जो होटल कभी पूरी तरह से बुक रहते थे, वे कुछ ही दिनों में खाली हो गए।” उन्होंने बताया कि बीच-बीच में सुधार देखने को मिले, लेकिन पर्यटकों के आगमन पर दबाव बना रहा। हालांकि वो पूरी तरह निराश नहीं है साथ ही, उन्होंने कहा कि मौजूदा चुनौतियों के बावजूद कश्मीर की पर्यटन क्षमता बरकरार है।
लोगों की जिंदगी पर असर
सैयद आदिल हुसैन शाह— एक लोकल पोनी ऑपरेटर थे और हमले में मारे गए 26 लोगों में से एक थे—उन्हें उनका परिवार ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करता है, जिन्होंने हमले के दौरान दूसरों को बचाने की कोशिश की थी। प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और बाद की रिपोर्टों से पता चला कि गोलीबारी शुरू होने पर उन्होंने हमलावरों का मुकाबला करने और पर्यटकों को बचाने में मदद करने की कोशिश की थी।
हमले की पहली बरसी पर पीटीआई से बात करते हुए उनके परिवार ने कहा, "उन्हें हर पल उनकी कमी महसूस होती रहती है, भले ही इस असहनीय नुकसान के बीच वे गर्व की भावना को थामे हुए हैं।"
इस बीच, जम्मू-कश्मीर में रोज़मर्रा की ज़िंदगी तो चलती रही, लेकिन संवेदनशील इलाकों में कड़ी निगरानी, सुरक्षा बलों की मज़बूत मौजूदगी और अपने ही राज्य में घटी घटनाओं के असर के साये में।
किश्तवाड़ के निवासी, इरफ़ान अहमद ने बताया उस समय मैं घबरा गया था, क्योंकि ऐसी घटनाएं पहले कभी नहीं हुई थीं। पहलगाम मेरे घर से 280 किलोमीटर दूर है। उस समय कोई पाबंदी या कर्फ्यू नहीं था, लेकिन हम गहरे दुख में थे। हमने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके और लोगों की जान जाने का शोक मनाने के लिए इकट्ठा होकर, मानवता के खिलाफ इस जघन्य अपराध का विरोध करने की पूरी कोशिश की। उन्होंने कहा, “आज भी वह घटना हमें परेशान करती है — कि यह कैसे हुई, इसके लिए कौन जिम्मेदार है, और कोई ऐसा काम क्यों करेगा। हमारे मन में आज भी कई सवाल बने हुए हैं।”
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