संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला और लगातार हंगामे तथा सत्ता पक्ष-विपक्ष के बीच टकराव के कारण इसका बड़ा हिस्सा प्रभावित रहा। लोकसभा को अंततः अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।

Monsoon Session : संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला और लगातार हंगामे तथा सत्ता पक्ष-विपक्ष के बीच टकराव के कारण इसका बड़ा हिस्सा प्रभावित रहा। लोकसभा को अंततः अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इस दौरान कई विधेयक पारित हुए, लेकिन संसद के सुचारू कामकाज, सवाल-जवाब और जनहित के मुद्दों पर चर्चा को लेकर तस्वीर संतोषजनक नहीं रही। सबसे ज्यादा असर प्रश्नकाल पर पड़ा, जिसे सांसदों के लिए सरकार से सीधे सवाल पूछने का सबसे अहम मंच माना जाता है। संसद की कार्यवाही बाधित होने का असर केवल विधायी कामकाज तक सीमित नहीं रहता। सदन चलाने के लिए कर्मचारियों, सुरक्षा, तकनीकी व्यवस्था, भवन और अन्य संसाधनों पर होने वाला खर्च कार्यवाही स्थगित होने के बावजूद जारी रहता है। Monsoon Session
संसद की कार्यवाही पर होने वाले खर्च का एक पुराना आंकड़ा अक्सर चर्चा में आता है। तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने वर्ष 2012 में बताया था कि लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही पर प्रति मिनट करीब 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। यह आंकड़ा उस समय का है और मौजूदा दौर में खर्च इससे अधिक होने की संभावना है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक, मॉनसून सत्र के शुरुआती तीन दिनों में ही लोकसभा के 1,026 मिनट और राज्यसभा के 816 मिनट का कामकाज प्रभावित हुआ था। वर्ष 2012 के 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट के आधार पर देखें तो शुरुआती तीन दिनों के व्यवधान से करीब 23 करोड़ रुपये के बराबर कार्य समय प्रभावित हुआ। हालांकि, यह पुराने खर्च के आधार पर किया गया अनुमान है, वर्तमान लागत का सटीक आकलन नहीं। Monsoon Session
संसद में प्रश्नकाल का विशेष महत्व है। इस दौरान सांसद अपने क्षेत्रों और देश से जुड़े मुद्दों पर मंत्रियों से सवाल पूछते हैं। तारांकित प्रश्नों के जरिए पूरक सवाल पूछकर सांसद सरकार से अतिरिक्त जानकारी भी मांग सकते हैं। यही वजह है कि प्रश्नकाल का समय निकल जाने के बाद उसकी भरपाई आसान नहीं होती। विधेयकों पर चर्चा के लिए सदन का समय बढ़ाया जा सकता है, लेकिन किसी दिन का प्रश्नकाल दोबारा उसी रूप में आयोजित नहीं किया जा सकता। उपलब्ध संसदीय आंकड़ों के मुताबिक, 16वीं लोकसभा में प्रश्नकाल निर्धारित समय का करीब 67 प्रतिशत ही चल पाया था। हाल के वर्षों में भी प्रश्नकाल के संचालन का औसत करीब 59 प्रतिशत रहा है। वर्ष 2023 के मॉनसून सत्र में राज्यसभा में कई ऐसे दिन रहे, जब प्रश्नकाल लगभग पूरी तरह बाधित रहा Monsoon Session
संसद में व्यवधान बढ़ने का असर विधायी कामकाज पर भी दिखाई देता है। सदन के पास उपलब्ध समय कम होने पर कई विधेयक लंबित रह सकते हैं या कम समय में पारित हो सकते हैं। पीआरएस के पुराने आंकड़ों के मुताबिक, 2023 में लोकसभा ने 20 विधेयकों को एक घंटे से भी कम चर्चा के बाद पारित किया था। इनमें कुछ विधेयक ऐसे भी थे, जिन पर 20 मिनट से कम समय चर्चा हुई। संसदीय समितियां विधेयकों की समीक्षा करती हैं, लेकिन सदन में होने वाली खुली बहस का अपना अलग महत्व है। संसद में हंगामे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लंबे समय से आरोप-प्रत्यारोप चलता रहा है। सरकार का तर्क रहता है कि विपक्ष के विरोध और नारेबाजी से सदन का समय बर्बाद होता है और करदाताओं के पैसे का नुकसान होता है। दूसरी ओर विपक्ष का कहना है कि जब महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दों पर चर्चा की अनुमति नहीं मिलती तो विरोध के जरिए सरकार का ध्यान खींचना जरूरी हो जाता है। मॉनसून सत्र में भी दोनों पक्षों के बीच इसी तरह का गतिरोध देखने को मिला। Monsoon Session
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