इस तुलना से यह भी साफ होता है कि जनसुराज का प्रदर्शन भले ही उम्मीद से बहुत कमजोर रहा हो, लेकिन कई पुराने छोटे दलों की तुलना में JSP की स्थिति थोड़ी बेहतर थी, क्योंकि वह हर जगह NOTA से नीचे नहीं गई।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने प्रशांत किशोर की नई पार्टी जनसुराज पार्टी (JSP) की असली चुनावी हैसियत साफ कर दी है। राज्यस्तर पर पार्टी को 3.44% वोट शेयर जरूर मिला, जो किसी नई पार्टी के लिए खराब शुरुआत नहीं मानी जाएगी और इस मामले में JSP ने पुराने वामपंथी दल CPI(ML)(L) के 3.05% वोट शेयर को भी पीछे छोड़ दिया। लेकिन जब बात सीट-दर-सीट प्रदर्शन की आती है, तो तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई देती है।
राज्यभर में पड़े कुल वैध मतों में से 3.44% वोट जनसुराज पार्टी के खाते में गए। इससे JSP सीधे तौर पर वोट शेयर की रैंकिंग में सातवें नंबर पर पहुंच गई। उससे ज्यादा वोट सिर्फ इनको मिले:
कागज पर यह आंकड़ा JSP के लिए “उम्मीद की शुरुआत” जैसा दिखता है, लेकिन किसी भी पार्टी की असली ताकत इस बात से मापी जाती है कि वह सीटों पर कितनी मजबूती से खड़ी है। यहीं आकर जनसुराज का ग्राफ अचानक नीचे चला जाता है।
जनसुराज ने 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन इनमें से 68 सीटों पर पार्टी को ‘किसी को नहीं’ यानी NOTA से भी कम वोट मिले। यानी करीब 28.6% सीटों पर मतदाताओं ने JSP को विकल्प मानने के बजाय सीधे-सीधे NOTA का बटन दबाना ज्यादा बेहतर समझा। यह स्थिति साफ संकेत देती है कि राज्यस्तर की पहचान के बावजूद कई इलाकों में JSP अभी “स्वीकार्य विकल्प” के रूप में भी जनता के मन में जगह नहीं बना पाई। प्रशांत किशोर की लंबी पदयात्रा, गांव-गांव बैठकों और व्यापक कैंपेन के बावजूद यह समर्थन वोटों में तब्दील नहीं हो सका।
कई सीटों पर यह अंतर साफ दिखा कि मतदाता ने जनसुराज की बजाय NOTA को प्राथमिकता दी। उदाहरण के तौर पर:
अलीनगर: JSP उम्मीदवार बिप्लव कुमार चौधरी – 2,275 वोट, NOTA – 4,751 वोट
अमरपुर: JSP उम्मीदवार सुजाता वैद्य – 4,789 वोट, NOTA – 6,017 वोट
अररिया: JSP उम्मीदवार फरहत आरा बेगम – 2,434 वोट, NOTA – 3,610 वोट
अत्रि: JSP उम्मीदवार शैलेंद्र कुमार – 3,177 वोट, NOTA – 3,516 वोट
औरंगाबाद: JSP उम्मीदवार नंद किशोर यादव – 2,755 वोट NOTA – 3,352 वोट
कोचाधामन: JSP उम्मीदवार अबु अफ्फान फारुकी – 1,976 वोट , NOTA – 2,039 वोट
इन आंकड़ों से साफ है कि कई विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं ने “जनसुराज को चुनने” की बजाय “किसी को नहीं चुनने” का रास्ता अपनाया। यह किसी भी नई पार्टी के लिए गंभीर चेतावनी की तरह है।
अगर छोटे और उभरते दलों से तुलना करें तो जनसुराज की स्थिति मिश्रित नजर आती है। AIMIM के उम्मीदवार करीब 14.3% सीटों पर NOTA से पीछे रह गए। VSIP सिर्फ 8.3% सीटों पर ही NOTA से कम वोट लेकर हारा। आजाद समाज पार्टी की स्थिति और भी कमजोर रही, वह लगभग आधी सीटों पर NOTA से पिछड़ गई।दूसरी ओर, कुछ छोटे दल – जैसे SUCI, समता पार्टी, बिहारी लोक चेतना पार्टी और NCP (बिहार यूनिट) – जिस-जिस सीट पर लड़े, वहां एक भी जगह NOTA को पीछे नहीं छोड़ पाए। यानी हर जगह NOTA ने इन दलों से ज्यादा वोट हासिल किए। इस तुलना से यह भी साफ होता है कि जनसुराज का प्रदर्शन भले ही उम्मीद से बहुत कमजोर रहा हो, लेकिन कई पुराने छोटे दलों की तुलना में JSP की स्थिति थोड़ी बेहतर थी, क्योंकि वह हर जगह NOTA से नीचे नहीं गई।
RJD, BJP, JD(U), LJP (RV) और CPI(ML)(L) जैसे स्थापित दलों ने इस चुनाव में हर सीट पर NOTA से ज्यादा वोट हासिल किए। यह दिखाता है कि:इन दलों का संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत है,इनके पास स्थायी वोट बैंक है, उम्मीदवार चयन और बूथ स्तर की तैयारियां अभी भी इनके पक्ष में काम कर रही हैं। इसके उलट, जनसुराज जैसी नई पार्टी के लिए यह चुनाव साफ संकेत है कि राज्य-स्तर का नैरेटिव खड़ा करना और लोकल स्तर पर भरोसेमंद विकल्प बन जाना,दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। प्रशांत किशोर की रणनीति ने JSP को पूरे बिहार में चर्चा तो दिलाई, लेकिन 68 सीटों पर NOTA से भी कम वोट मिलना इस बात का सबूत है कि पार्टी को अभी गांवों, कस्बों और बूथ स्तर पर संगठन खड़ा करने, चेहरा तैयार करने और विश्वसनीयता बनाने के लिए लंबी राजनीतिक साधना करनी होगी।