
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात से दिल्ली तक का लंबा राजनीतिक सफर तय करके देश की सियासत के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है। उनके नेतृत्व में बीजेपी ने न केवल राजनीतिक बुलंदी हासिल की, बल्कि जातिवाद के पारंपरिक खेल को भी चुनौती दी, जिससे कई क्षेत्रीय सियासी क्षत्रपों की पकड़ कमजोर हुई। 75 साल के प्रधानमंत्री मोदी ने अपने करिश्माई नेतृत्व और विकास-केन्द्रित एजेंडे के दम पर भारतीय राजनीति में नया अध्याय लिखा। गुजरात में 12 साल मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने पटेल प्रभाव वाले राजनीतिक समीकरणों को संतुलित किया। इसी मॉडल को केंद्र पर प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अन्य राज्यों में लागू किया – हरियाणा में गैर-जाट और महाराष्ट्र में गैर-मराठा नेतृत्व को बढ़ावा देकर जातिवादी राजनीति को पीछे छोड़ दिया। PM Modi
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति हमेशा थोड़ी हटकर रही है। जमीनी कनेक्शन हो या चुनावी वादों की सच्चाई, वे हर मोर्चे पर माहिर रहे हैं। उन्होंने सिर्फ पार्टी को जीत दिलाई ही नहीं, बल्कि बीजेपी की ब्राह्मण-बनिया वाली इमेज को तोड़कर दलित, ओबीसी और आदिवासी वोटरों तक अपनी पकड़ मजबूत की। गुजरात के ओबीसी समाज से आने वाले मोदी ने विकास और जनकल्याण योजनाओं के जरिए गरीबों के बीच ऐसा भरोसा और लोकप्रियता बनाई, जैसे किसी खिलाड़ी ने पिच पर छक्का जड़ दिया हो। इसी रणनीति ने जातिवाद की पुरानी राजनीति को चुनौती देने का उनका सबसे बड़ा हथियार बना दिया।
प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे को नए राजनीतिक रंग और धार दी। राम मंदिर निर्माण से लेकर अनुच्छेद 370 हटाने और ट्रिपल तलाक पर सख्त कदम, हर एक फैसला जैसे सियासत की शतरंज में बड़ा संदेश बनकर सामने आया। लेकिन मोदी ने सिर्फ हिंदुत्व तक सीमित नहीं रहे – उन्होंने जातीय समीकरणों को भी बराबर तवज्जो दी। ओबीसी और दलित समुदायों को पार्टी में शामिल कर मोदी ने वोटर बैलेंस की मास्टरस्ट्रोक चल दी। हाल ही में जातिगत जनगणना का फैसला इसी रणनीति का हिस्सा है। साथ ही, उन्होंने मुस्लिमों के पसमांदा और बोहरा वर्ग को भी पार्टी की राजनीति में जोड़ा, जिससे सोशल इंजीनियरिंग का नया फॉर्मूला बन गया। अलग-अलग जातीय समूहों को सत्ता और पार्टी में हिस्सेदारी देकर मोदी ने परंपरागत जातिवादी राजनीति के दांवों को चकमा दे दिया। PM Modi
हरियाणा की राजनीति में जाट बनाम गैर-जाट का पुराना खेल चलता रहा, लेकिन मोदी ने इसे उलट दिया। उन्होंने गैर-जाट चेहरे को मुख्यमंत्री बनाकर समीकरण बदल दिए। महाराष्ट्र में मराठा प्रभाव वाले राज्य में गैर-मराठा नेतृत्व को तवज्जो देकर बीजेपी की सत्ता और मज़बूत हुई। झारखंड में गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री चुनकर मोदी ने राजनीतिक प्रयोग का नया ट्रेंड सेट किया। उत्तर प्रदेश और बिहार में भी मोदी ने ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों को साधकर सपा और बसपा के जातीय वोटबैंक को चुनौती दी। इस स्मार्ट रणनीति ने बीजेपी को 2014 के लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दिलाई और उसके बाद विधानसभा चुनावों में भी असर दिखाया। बिहार में गैर-ओबीसी और गैर-जाटव वोटों के दम पर पार्टी ने अपनी पकड़ पहले से कहीं ज्यादा मजबूत कर ली। PM Modi
मोदी की लोकप्रियता सिर्फ जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके राष्ट्रवाद और हर वर्ग को जोड़ने की कला ने उन्हें सबकी नजरों में अलग जगह दिलाई है। उनके नेतृत्व में जातिवाद पूरी तरह गायब नहीं हुआ, लेकिन उनके राष्ट्रवाद में हर समुदाय ने हिस्सेदारी पाई, जिससे व्यापक जनसमर्थन बना। मोदी सरकार ने छोटी-छोटी जातियों की उम्मीदों के हिसाब से योजनाएँ लागू कीं, जिससे समाज में भागीदारी बढ़ी और राजनीतिक संतुलन बना रहा। ओबीसी और दलित वर्ग का समर्थन मोदी की सबसे बड़ी ताकत बन गया, और इसने परंपरागत जातिवादी सियासत करने वाले नेताओं के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है। PM Modi