सात राज्यसभा सीटों को लेकर सियासी हलचल तेज है। विधानसभा में बदल चुके शक्ति-संतुलन ने विपक्षी खेमे खासकर कांग्रेस, शरद पवार गुट और उद्धव ठाकरे की राजनीति को नई चुनौती दे दी है।

Maharashtra Elections : महाराष्ट्र में इस समय सात राज्यसभा सीटों को लेकर सियासी हलचल तेज है। विधानसभा में बदल चुके शक्ति-संतुलन ने विपक्षी खेमे खासकर कांग्रेस, शरद पवार गुट और उद्धव ठाकरे की राजनीति को नई चुनौती दे दी है। संख्या बल के लिहाज से तस्वीर साफ दिख रही है, लेकिन असली पेच विपक्ष के भीतर की खींचतान है।
इन सात सीटों का कार्यकाल अप्रैल में समाप्त हो रहा है, इसलिए मार्च में मतदान प्रस्तावित है। राज्यसभा का चुनाव सीधे जनता नहीं, बल्कि विधायक करते हैं। इसलिए विधानसभा में किस दल के पास कितनी ताकत है, यही जीत-हार तय करती है। राज्य में सत्तारूढ़ महायुति जिसमें शिंदे गुट और अजित पवार गुट शामिल हैं के पास विधानसभा में स्पष्ट बढ़त है। मौजूदा आंकड़ों के आधार पर यह गठबंधन सात में से लगभग छह सीटें निकालने की स्थिति में माना जा रहा है। संख्या बल की मजबूती के कारण सत्ता पक्ष अपेक्षाकृत सहज दिख रहा है और उम्मीदवारों के चयन पर उसका ध्यान ज्यादा है, गणित पर कम।
दूसरी ओर महाविकास आघाड़ी (एमवीए) जिसमें इंडियन नेशनल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) शामिल हैं के पास इतनी ताकत है कि वह मुश्किल से एक सीट सुरक्षित कर सके। यहीं से राजनीतिक पेच शुरू होता है। उस एकमात्र संभावित सीट पर किसे उतारा जाए? क्या अनुभवी नेता शरद पवार फिर से राज्यसभा जाएंगे? या उद्धव ठाकरे की पार्टी अपना दावा मजबूत करेगी? कांग्रेस की सहमति किसके साथ जाएगी? इन सवालों ने गठबंधन के भीतर असहजता बढ़ा दी है।
शरद पवार लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति के अनुभवी चेहरा रहे हैं। यदि वे राज्यसभा जाने का फैसला करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से सहयोगी दलों को अपने दावों पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। लेकिन उद्धव ठाकरे गुट भी यह मानता है कि विधानसभा में उसके विधायकों की संख्या और हालिया राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए सीट पर उसका हक बनता है। कांग्रेस इस समीकरण में किंगमेकर जैसी भूमिका में दिख रही है, क्योंकि उसका समर्थन निर्णायक हो सकता है।
यह चुनाव केवल सात सीटों का नहीं है, बल्कि यह बताएगा कि महाराष्ट्र में विपक्षी एकता कितनी मजबूत है। क्या एमवीए भविष्य की लड़ाइयों के लिए संगठित रह पाएगा। या आंतरिक मतभेद उसकी राजनीतिक जमीन और कमजोर करेंगे। सत्ता पक्ष जहां संख्या के भरोसे आत्मविश्वास में है, वहीं विपक्ष के लिए यह चुनाव अस्तित्व और समन्वय दोनों की परीक्षा बन गया है।