उत्तर प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता डॉ. रविंद्र शुक्ला ने यूजीसी के नए प्रावधानों का विरोध करते हुए पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी है। उनका कहना है कि यह नियम शिक्षा व्यवस्था में समानता के बजाय नए प्रकार का भेदभाव पैदा कर सकता है।

UGC Controversy : यूजीसी द्वारा हाल ही में लागू किए गए नए नियमों को लेकर उत्तर प्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इन नियमों के विरोध में भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं और पदाधिकारियों ने खुलकर असहमति जताते हुए पार्टी से दूरी बना ली है। अभी तो यह सिलसिला शुरू हुआ है, जल्दी ही भाजपा सहित अन्य पार्टियों के भी पदाधिकारी आगे आ सकते हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता डॉ. रविंद्र शुक्ला ने यूजीसी के नए प्रावधानों का विरोध करते हुए पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी है। उनका कहना है कि यह नियम शिक्षा व्यवस्था में समानता के बजाय नए प्रकार का भेदभाव पैदा कर सकता है। डॉ. शुक्ला हिंदी साहित्य अंतरराष्ट्रीय संस्था से भी जुड़े रहे हैं और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर मुखर आवाज माने जाते हैं।
राजधानी लखनऊ से भी बीजेपी के भीतर असंतोष की तस्वीर सामने आई है। बख्शी तालाब क्षेत्र के कुम्हारवां मंडल महामंत्री आलोक तिवारी सहित पार्टी के कुल 11 पदाधिकारियों ने अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। इन इस्तीफों से जुड़ा एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि यूजीसी का नया नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।
नोएडा बीजेपी महानगर के उपाध्यक्ष राजू पंडित ने भी इन नियमों को काला कानून करार देते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा कि यह नियम समाज को जोड़ने के बजाय विभाजन की ओर ले जा रहा है। वहीं श्रावस्ती जिले में बीजेपी शिक्षक प्रकोष्ठ के जिला संयोजक समेत दो पदाधिकारियों ने भी पार्टी नेतृत्व को अपना इस्तीफा भेज दिया है। उनका कहना है कि नई व्यवस्था शिक्षकों और छात्रों दोनों में असुरक्षा की भावना पैदा कर रही है।
यूजीसी ने 13 जनवरी को एक नया नियम लागू किया है, जिसके तहत शैक्षणिक संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए 24़7 हेल्पलाइन, एंटी-डिस्क्रिमिनेशन सेल, शिकायत निवारण समितियों का गठन अनिवार्य किया गया है।
नियमों का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि इसमें झूठी शिकायतों से निपटने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। उनका आरोप है कि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत अधिकारों पर असर पड़ सकता है। साथ ही यह आशंका भी जताई जा रही है कि बिना ठोस सबूत के लगाए गए आरोप छात्रों के शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य को नुकसान पहुँचा सकते हैं। यूजीसी के नए नियमों ने जहां एक ओर सामाजिक न्याय की बहस को आगे बढ़ाया है, वहीं दूसरी ओर यह मुद्दा राजनीतिक टकराव और आंतरिक असंतोष का कारण बनता जा रहा है। आने वाले समय में इस पर सरकार और संबंधित पक्ष क्या रुख अपनाते हैं, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।