जब भी कोई चुनाव भारतीय जनता पार्टी की प्रतिष्ठा को प्रभावित करने वाला प्रतीत होता है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई विवादित मुद्दा लेकर आ खड़ा होता है और वही मुद्दा भाजपा का तारणहार बन जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि विपक्ष इस मुद्दे से उत्तेजित होता है और उसके उत्तेजना का लाभ संघ के माध्यम से भाजपा को मिल जाता है।...और यह सब तब होता है, जब कि संघ स्वयं को गैर राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संगठन बताते नहीं थकता है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत एक नए विवादित बयान के साथ सामने आए हैं। उन्होंने अपने ताजा बयान में कहा है कि वीर सावरकर को बदनाम करने वाले अभी और आगे बढ़ेंगे, अभी कुछ और महान विभूतियों को बदनाम करने की साजिश की जाएगी। इस संदर्भ में भागवत ने तीन नाम बताए - स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती और योगी अरविंद।
उल्लेखनीय है कि इन तीन महान विभूतियों को सावरकर से जोड़कर संघ प्रमुख ने पेश किया है। सावरकर को स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती और योगी अरविंद के समकक्ष खड़ा करने का यह एक ऐसा प्रयास है, जिसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
सावरकर को राष्ट्रवादी और दूरदर्शी बताते हुए संघ प्रमुख ने यहां तक कह डाला कि यह सावरकर युग है, यह युग देशभक्ति का है, यह कर्तव्य और भागीदारी को सिखाने वाला युग है। संघ प्रमुख ने यह नहीं बताया कि स्वतंत्रता संग्राम में संघ कथित रूप से अपने कर्तव्य के प्रति विमुख क्यों था?
मोहन भागवत ने कहा कि चूंकि सावरकर स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद और योगी अरविंद से प्रभावित थे इसलिए इन तीनों विभूतियों को बदनाम करने की साजिश रची जाएगी। यह तर्क नहीं विशुद्ध कुतर्क है। यदि कोई शिष्य अथवा अनुयायी अपने शिक्षक अथवा गुरु की शिक्षा व विचारों के अनुसार व्यवहार ना करें, तो निंदा आलोचना तो शिष्य की ही होती है न कि गुरु अथवा शिक्षक की। जिन तीन महान विभूतियों के नाम संघ प्रमुख ने लिए उनके विचारों से देश-विदेश के करोड़ों करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं। इन महान आत्माओं की शिक्षाओं को आत्मसात करने वाले असंख्य लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आए हैं। प्रश्न उठता है कि निंदा और आलोचना सावरकर की ही क्यों होती है बाकी लोगों की क्यों नहीं? एक व्यक्ति की आलोचना से तीन-तीन महान आध्यात्मिक विभूतियों को टारगेट किए जाने की आशंका जताने के पीछे संघ प्रमुख का कोई तो आज एजेंडा जरूर है। भागवत या संघ के अन्य विचारकों, प्रचारकों के मन में यह विचार आज तक क्यों नहीं आया कि सावरकर की आलोचना तो देश की आजादी से पहले और आजादी के बाद से लगातार होती रही है, सावरकर स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती और योगी अरविंद के विचारों से प्रभावित तो यह रहस्योद्घाटन आज से पहले संघ या सावरकर समर्थकों ने क्यों नहीं किया?
संघ, भाजपा के लिए सावरकर को एक महामानव और देश रक्षक के रूप में खड़ा करना चाहता है। सावरकर को उन महान विभूतियों से जोड़कर पेश करना चाहता है जो हिंदुत्व के पैरोकार थे। लेकिन उनका हिंदुत्व सावरकर के हिंदू वाद से बिल्कुल मेल नहीं खाता है। तीनों महान विभूतियों के साथ सावरकर का नाम जोड़कर सावरकर के हिंदुत्व को उनके हिंदू वाद से प्रभावित बता कर संघ एक नया खेल रचना चाहता है ताकि उसका लाभ निकट भविष्य में भाजपा को मिले। अब जल्द यह भी देखने को मिल सकता है कि कुछ लोग स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और योगी अरविंद की निंदा आलोचना करते मिलें। यह भी संघ का ही एक गेम प्लान होगा। ये निंदक संघ की विचारधारा के प्रचारक, विस्तारक और पोषक भी हो सकते हैं, जो पर्दे के पीछे रहकर संघ का काम करते हैं। रही सही कसर सोशल मीडिया पर बैठे भाजपा समर्थक पूरी कर देंगे। सावरकर महान विभूतियों के विचारों से प्रभावित होंगे, लेकिन इस बात के लिए उन महान विभूतियों को कोई बदनाम करेगा, यह दलील खोखली है, निराधार है।