तीन साल की पदयात्रा, हजारों किलोमीटर की जमीनी मुहिम और रोजगार-शिक्षा जैसे मुद्दों पर केंद्रित राजनीति की इसके बावजूद मतदाताओं ने पीके के मॉडल को क्यों नहीं हाथों-हाथ लिया? यही वह सवाल है जिसने इस चुनावी माहौल को और दिलचस्प बना दिया है। आइए, इसकी वजहों को करीब से समझते हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अगर किसी एक चेहरे ने सबसे ज्यादा सुर्खियाँ बटोरीं, तो वह थे देश के चर्चित रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर। ‘जन सुराज’ के नाम पर नई राजनीति का खाका खींचते हुए पीके ने दावा किया था कि उनका प्रयोग बिहार की जड़ राजनीति को झकझोर देगा। शुरुआत में 243 सीटों पर दावेदारी, फिर 240 सीटों पर उम्मीदवार जन सुराज ने दमदार मौजूदगी का संदेश देने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही शुरुआती रुझान आए, यह साफ दिखने लगा कि बिहार की जनता ने पीके के इस बड़े प्रयोग को वैसी स्वीकृति नहीं दी, जैसी उम्मीद की जा रही थी। जन सुराज का खाता तक नहीं खुलने की स्थिति ने संकेत दिया कि बात सिर्फ ‘नई पार्टी’ की नहीं है, कहानी कहीं ज़्यादा गहरी है। तीन साल की पदयात्रा, हजारों किलोमीटर की जमीनी मुहिम और रोजगार-शिक्षा जैसे मुद्दों पर केंद्रित राजनीति की इसके बावजूद मतदाताओं ने पीके के मॉडल को क्यों नहीं हाथों-हाथ लिया? यही वह सवाल है जिसने इस चुनावी माहौल को और दिलचस्प बना दिया है। आइए, इसकी वजहों को करीब से समझते हैं।
बिहार की राजनीति का असली मैदान गाँव-कस्बों में बसता है, लेकिन जन सुराज यहीं सबसे कमजोर साबित हुई। पीके की लंबी पदयात्रा और महीनों की मेहनत के बावजूद पार्टी गांवों में अपनी स्पष्ट पहचान नहीं बना सकी। कई ग्रामीण इलाकों में मतदाताओं को पार्टी का चुनाव चिन्ह तक याद नहीं रहा, और न ही उम्मीदवारों का चेहरा पहचाना जा सका। पारंपरिक दलों का मजबूत संगठन जहाँ हर टोले-मोहल्ले तक धागे की तरह फैला था, वहीं जन सुराज की मौजूदगी सतही और सीमित दिखी। नतीजा गांवों का बड़ा वोट बैंक जन सुराज की पकड़ से पूरी तरह फिसल गया।
जन सुराज की सबसे बड़ी कमजोरी उसका संगठनात्मक ढांचा रहा, जो शुरुआत से ही कमजोर आधार पर खड़ा नजर आया। पीके ने पार्टी को एक मजबूत संरचना देने के बजाय अपनी ब्रांड इमेज पर ज्यादा जोर दिया। नतीजा कई पुराने, मेहनती और जमीन से जुड़े कार्यकर्ता टिकट से वंचित रह गए, जबकि कई ‘पैराशूट उम्मीदवार’ ऊपर से सीधे मैदान में उतार दिए गए। टिकट बंटवारे की इस खींचतान ने अंदर ही अंदर भारी असंतोष पैदा किया, जिसे पीके ने भले ‘घर की बात’ बताकर हल्का कर दिया हो, लेकिन कार्यकर्ताओं का मनोबल वहीं टूट गया। पूर्व आईपीएस आनंद मिश्रा जैसे प्रमुख चेहरों का पार्टी छोड़ना भी साफ संकेत था कि अंदर सब ठीक नहीं था। ऐसे हालात में पार्टी चुनावी दौड़ में पूरी ताकत से उतर ही नहीं सकी।
बिहार की राजनीति का असली पहिया आज भी जातीय समीकरणों से घूमता है, और यही वह मोर्चा था जहाँ जन सुराज की नई राजनीति टिक नहीं पाई। पीके ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और शराबबंदी जैसे मुद्दों को जाति पर आधारित राजनीति के विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही थी। मतदाता अपनी पारंपरिक गोलबंदी से बाहर निकलने को तैयार नजर नहीं आए। मुस्लिम वोटरों ने बीजेपी को रोकने के लिए RJD–कांग्रेस को सुरक्षित विकल्प माना, जबकि अन्य जातीय समूह भी अपने स्थापित खेमों में ही टिके रहे। ऐसे में ‘नई राजनीति’ का संदेश जातीय हकीकतों की दीवार से टकराकर वापस लौट आया।
चुनावी दौड़ के बीच सबसे बड़ा विवाद तब उठा जब पीके ने खुलकर आरोप लगाया कि बीजेपी समेत कई बड़े दल उनके उम्मीदवारों पर दबाव बना रहे हैं—कहीं डराया जा रहा है, तो कहीं लालच देकर नामांकन वापस लेने को मजबूर किया जा रहा है। कई उम्मीदवारों के अचानक मैदान से हटने ने जन सुराज की गति तोड़ कर रख दी। इससे यह मजबूत संदेश गया कि स्थापित दल इस नए राजनीतिक प्रयोग को जड़ पकड़ने का मौका नहीं देना चाहते। पीके ने इसे “जनतंत्र की हत्या” की संज्ञा दी, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सीधा नुकसान जन सुराज की विश्वसनीयता और मनोबल पर पड़ा। नतीजतन, पार्टी कमजोर दिखाई दी और उसकी संघर्ष क्षमता पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए।
जन सुराज के अभियान के बीच सबसे बड़ा सवाल यही गूंजता रहा जब पूरी पार्टी पीके की पहचान और लोकप्रियता पर टिकी है, तो वे खुद चुनावी मैदान में क्यों नहीं उतरे? भारतीय राजनीति की परंपरा रही है कि पार्टी का शीर्ष चेहरा खुद लड़ाई में उतरकर नेतृत्व का भरोसा मजबूत करता है। लेकिन पीके के चुनाव न लड़ने से मतदाताओं के मन में यह संदेह गहराने लगा कि क्या वह वाकई सत्ता की दौड़ में गंभीर हैं या यह सिर्फ एक सामाजिक-राजनीतिक प्रयोग भर है। कई समर्थकों को भी यह निर्णय निराश करने वाला लगा। नतीजा -नेतृत्व की प्रतिबद्धता और भविष्य को लेकर मतदाता पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पाए।