बड़ी आशंका: कहीं कोचिंग वाला राष्ट्र ना बन जाए भारत, समझें आंकड़ों से
Private Institute
भारत
चेतना मंच
29 Nov 2025 01:03 PM
Private Institute : शिक्षा यानि ज्ञान समानता की सबसे बड़ी आवश्यकता है। शिक्षा को मानव जाति का मौलिक अधिकार भी माना जाता है। जीवन के लिए आवश्यक शिक्षा के बाजारीकरण ने चिंतकों की चिंता बढ़ा दी है। भारत के अनेक चिंतकों को आशंका सता रही है कि कभी ज्ञान के मामले में विश्व गुरू रहा भारत धीरे-धीरे कोचिंग राष्ट्र बनता जा रहा है। भारत के कोचिंग राष्ट्र बनने की आशंका को आप आंकड़ों में समझ लीजिए।
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क्या कहते हैं आंकड़े
शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट 2023, ग्रामीण भारत के 14 से 18 वर्ष की आयु के युवाओं के बीच शिक्षा के निराशाजनक परिदृश्य पर रोशनी डालती है। पढऩे के कौशल में आठवीं कक्षा के 30 फीसदी ग्रामीण छात्र दूसरी कक्षा के मानक पाठ नहीं पढ़ सकते। इसी तरह अंकगणित कौशल में आठवीं कक्षा के 55 फीसदी ग्रामीण छात्र बुनियादी भाग करने में असमर्थ थे। जबकि अंग्रेजी समझ एवं कौशल में, आठवीं कक्षा के आधे ग्रामीण छात्र आसान वाक्यों को पढऩे में असमर्थ थे और जो पढ़ सकते थे, उनमें से लगभग एक तिहाई छात्र अर्थ बताने में असमर्थ थे।
स्कूली शिक्षा में सीखने के अपर्याप्त परिणामों को देखते हुए समकालीन भारत में कोचिंग संस्थानों का विस्तार होना स्वाभाविक है। शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट 2022 ने बताया कि कक्षा एक से आठवीं तक के 30.5 फीसदी ग्रामीण छात्र सशुल्क निजी कोचिंग कक्षाएं ले रहे थे। स्कूली शिक्षा में मूलभूत कौशल और गहन, सोच कौशल की कमी के कारण निजी कोचिंग पर निर्भरता जरूरी हो गई है। जैसे-जैसे छात्र उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, कोचिंग पर निर्भरता बढ़ती जाती है। भारत एक को कोचिंग राष्ट्र में बदल गया है, न केवल महानगरीय शहरों में, बल्कि छोटे शहरों में भी। सरकारी नौकरियों की इच्छा, जो, सामाजिक सुरक्षा के साथ आती है, शायद ग्रामीण छात्रों को आगे बढऩे चिंग के लिए यही एकमात्र रास्ता हो। भारत के 91 फीसदी कार्यबल अनौपचारिक रोजगार में है, जिसे सामाजिक निजी बीमा के बिना रोजगार के रूप में परिभाषित किया गया है, अर्थात वृद्धावस्था पेंशन, मृत्यु/विकलांगता बीमा, स्वास्थ्य और मातृत्व लाभ इत्यादि से वंचित रोजगार।
वर्ष 2022-23 में स्नातकों के लिए बेरोजगारी दर 13.4 फीसदी और स्नातकोत्तर और उससे ऊपर के लोगों के लिए 12.1 फीसदी रही, जो राष्ट्रीय औसत बेरोजगारी दर 3.2 फीसदी (15 वर्ष और उससे अधिक आयु) से लगभग चार गुना है।
भारत में बेरोजगारी की स्थिति एक प्रमुख सामाजिक मुद्दा बनी हुई है। अगर नौकरियां नहीं मिलेंगी, तो छात्र कहां जाएंगे? वर्ष 2017-18 से 2022-23 की अवधि में कृषि क्षेत्र में छह करोड़ श्रमिकों की वृद्धि हुई है! आखिरी पीएलएफएस जुलाई, 2022 और जून, 2023 के बीच भी 80 लाख श्रमिकों को कृषि में जोड़ा गया था। निजी नौकरियों में रोजगार की अनिश्चितता को देखते हुए यह उनकी मजबूरी ही थी।
अधिकांश सरकारी नौकरियों के लिए भी परीक्षा में अंग्रेजी कौशल मुख्य घटकों में से एक है। जबकि आबादी की मुख्य भाषा और स्कूली शिक्षा का माध्यम हिंदी बनी हुई है। प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए अंग्रेजी कौशल की आवश्यकता होती है, जिसके लिए कोचिंग अपरिहार्य हो जाती है।
माता-पिता की उम्मीदें ऊंची बनी हुई हैं और उम्मीदवारों को प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग लेने के लिए प्रेरित किया जाता है। सफलता और विफलता को परिभाषित करने में कोचिंग एक महत्वपूर्ण कारक साबित हो सकती है।
कोचिंग में धकेले जा रहे हें युवा
सभ्य गैर-कृषि रोजगार की अनुपलब्धता, रुकी हुई सरकारी नौकरियां और सीमित सरकारी नौकरियों के साथ-साथ उच्च शिक्षा के लिए युवाओं के बीच अभूतपूर्व प्रतिस्पर्धा है, जिसने छात्रों को ट्यूशन और कोचिंग में धकेल दिया है। कुल मिलाकर, शिक्षा का मौलिक अधिकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार में तब्दील नहीं हुआ है, इसलिए निजी ट्यूशन और कोचिंग संस्थान तेजी से बढ़ रहे हैं।
कोचिंग संस्थान लंबे समय तक एक अनियमित बाजार बने रहे, और कई शिकायतों और छात्रों को आत्महत्याओं के बाद ही सरकार कोचिंग सेंटरों को संचालित करने के लिए दिशा-निर्देश लेकर आई है। 'कोचिंग सेंटर का पंजीकरण और विनियमन, 2024' दिशा-निर्देश कोचिंग सेंटरों को भ्रामक वादे करने या सफलता की गारंटी देने से रोकते हैं।
हालांकि, इसका उपाय स्कूली शिक्षा, उच्च अध्ययन और प्रतियोगी परीक्षाओं की नींव में सीखने के परिणामों में सुधार करना है। इसके अलावा, हर कोई कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकता और सरकारी नौकरी की आकांक्षा नहीं कर सकता। गैर- औद्योगिकीकरण और संरचनात्मक परिवर्तन के उलट होने की स्थिति में जो कुछ बचा है, वह है गिग इकनॉमी, जो बिना किसी सामाजिक सुरक्षा जाल के कार्यबल को केवल निर्वाह प्रदान करती है। इस प्रकार, समकालीन भारत में नौकरियों को पुनर्जीवित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।