पं. नैन सिंह रावत, जिन्होंने पैदल चलकर तिब्बत का नक्शा बनाया
भारत
चेतना मंच
21 Oct 2021 04:50 AM
एक थे पंडित नैन सिंह रावत। जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने तीन गांवों की जागीरदारी पुरस्कार स्वरूप प्रदान की थी, इसके अतिरिक्त उनके कामों की कद्र करते हुए उन्हें ' कॉम्पेनियन ऑफ द इंडियन एंपायर' की उपाधि से विभूषित किया था। हिंदी में आधुनिक विज्ञान में 'अक्षांश दर्पण' नामक पुस्तक लिखने वाले पहले भारतीय पंडित नैन सिंह रावत की आज जयंती है। एशिया के मानचित्र को तैयार करने में सर्वोपरि योगदान देने वाले पंडित नैन सिंह के नाम और काम से वर्तमान पीढ़ी बहुत परिचित नहीं है।
21 अक्टूबर 1830 में कुमाऊं के पिथौरागढ़ जिले के मिलम नाम के गांव में जन्मे नैन सिंह ने प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त की। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें जल्द ही अपने पिता के साथ भारत और तिब्बत के बीच चलने वाले पारंपरिक व्यापार से जुड़ना पड़ा। यही समय था जब उन्हें तिब्बत को देखने और समझने का मौका मिला।
19वीं शताब्दी में अंग्रेज लगभग पूरे भारत का मानचित्र तैयार कर चुके थे लेकिन दुनिया से छुपा हुआ तिब्बत अंग्रेजों को आगे बढ़ने से रोक रहा था। अंग्रेजी सरकार की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हो रही थीं, अंग्रेज तिब्बत को जानने में सफल नहीं हो पा रहे थे। तब उस समय के सर्वेक्षक माउंटगुमरी ने निर्णय लिया कि अंग्रेजों के बदले उन भारतीयों से काम लिया जाए जो तिब्बत के साथ व्यापार करते हैं और वहां आते जाते रहते हैं। खोज शुरू हुई और 1863 में माउंटगुमरी को ऐसे दो लोग मिल गए। इनमें से एक थे, नैन सिंह रावत और दूसरे थे उनके चचेरे भाई माणी सिंह।
अंग्रेजी हुकूमत ने नैन सिंह से संपर्क साधा। नैन सिंह क्योंकि पिता अमर सिंह के साथ तिब्बत में रहे थे, इसलिए उन्हें तिब्बत की स्थानीय भाषा, वहां के रहन-सहन और वहां की संस्कृति की पूरी जानकारी थी। फिर बाद में नैन सिंह 1855 से 1857 के बीच जर्मन व्यापारियों के साथ एक यात्रा कर चुके थे। तभी नैन सिंह मानसरोवर और राक्षस ताल झील और फिर गार्टोक और लद्दाख गए थे।
अंग्रेज नैन सिंह और मीणा सिंह को प्रशिक्षण देने के लिए देहरादून लाए, लेकिन दिशा और दूरी मापक यंत्र इतने बड़े थे कि उन्हें लेकर तिब्बत में प्रवेश करना संभव नहीं था। जब बात नहीं बनी तो नैन सिंह और मीणा सिंह ने बौद्ध भिक्षुओं का वेश बनाया अपने कपड़ों में दिशा सूचक यंत्र और थर्मामीटर छुपाया और पैदल ही चल पड़े। नैन सिंह खुद तो काठमांडू के रास्ते तिब्बत को निकले और मीणा सिंह को कश्मीर के रास्ते रवाना किया। मीणा सिंह बीच रास्ते से वापस लौट आए। नैन सिंह तिब्बत पहुंचे। नैन सिंह रावत ने अपने दोनों पैरों में 33.5 इंच की रस्सी बांधी, जिससे कदम समान दूरी पर पड़ें और दूरी की सटीक जानकारी हो सके। इस तरह उन्होंने 2000 कदम में एक मील अर्थात् 1.6 किलोमीटर की दूरी तय की। उन्होंने 100 मनके की एक माला ले रखी थी, जितना चलते मनका फेरते जाते।
तीन साल की अपनी दुस्साहसिक यात्रा में नैन सिंह रावत ने दुनिया को बताया कि तिब्बत की लंबाई चौड़ाई कितनी है। उन्होंने बताया ल्हासा की समुद्र तल से ऊंचाई कितनी है। नैन सिंह ने ब्रह्मपुत्र नदी के साथ 800 किलोमीटर पैदल यात्रा कर दुनिया को जानकारी दी कि सांग पो और ब्रह्मपुत्र एक ही नदी है। तिब्बत की सांग पो ही भारत की ब्रह्मपुत्र है। 1866 में नैन सिंह मानसरोवर होते हुए देहरादून और लौट आए और अपनी खोज अंग्रेजों को सौंपी, जिसे अंग्रेजों ने दुनिया के सामने रखा। इसके बाद 1867-68 में भी नैन सिंह एक बार फिर तिब्बत गए। इस बार नैन सिंह चमोली जिले से निकले और वहां से तिब्बत के थोक जालूंग पहुंचे जहां उन्हें सोने की खदानें मिलीं, जिनकी जानकारी तब तक दुनिया को नहीं थी। सोने की खदानों की जानकारी भी नैन सिंह ने अंग्रेजों को दे दी थी।
अपनी यात्रा की समाप्ति के बाद नैन सिंह ने अपने गांव के स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया था। यहीं से उनके नाम के आगे पंडित जुड़ा पंडित का अर्थ ज्ञानी अथवा विद्वान होता है और नैन सिंह तो महाज्ञानी थे। 1895 में नैन सिंह का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। नैन सिंह जैसे जीवट के धनी और विद्वान के जीवन व कार्यों को पाठ्य पुस्तकों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।