संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हिन्दू राष्ट्र की कर दी नई व्याख्या
भारत
चेतना मंच
29 Nov 2025 01:56 PM
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को RSS के नाम से जाना जाता है। RSS की एक बार फिर पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। RSS की चर्चा का कारण बना है RSS के प्रमुख मोहन भागवत का ताजा बयान। मोहन भागवत के ताजा बयान में हिन्दू राष्ट्र बनाने की परिकल्पना की नए सिरे से व्याख्या की गई है। RSS की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने ही वाले हैं। 100 साल पहले RSS की स्थापना हिन्दू राष्ट्र का सपना लेकर की गई थी। ऐसे में RSS के साथ हिन्दू राष्ट्र हमेशा से जुड़ा
हुआ है। R S S :
RSS के 100 साल पूरे हाने के उपलक्ष्य में आया ताजा बयान
मंगलवार को RSS प्रमुख मोहन भागवत ने एक बड़ा बयान दिया है। दरअसल RSS ने 100 वर्ष की संघ यात्रा पर
व्याख्यान का पूरा अभियान शुरू किया है। इसी अभियान के तहत मंगलवार को RSS प्रमुख मोहन भागवत दिल्ली में
व्याख्यान दे रहे थे। इस व्याख्यान में RSS प्रमुख ने हिन्दू राष्ट्र की नए ढंग से परिभाषा बताने का प्रयास किया है।
मंगलवार को RSS प्रमुख ने क्या खास बात कही। उस बात को जानने से पहले RSS के हिन्दू राष्ट्र के इतिहास की चर्चा
कर लेना बहुत जरूरी है।
RSS के 100 साल पूरे होने पर खड़ा हुआ है बड़ा सवाल
जैसा कि आप जानते ही हैं कि राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ को RSS के नाम से जाना जाता है। RSS की
स्थापना के 100 साल पूरे हो रहे हैं। RSS की स्थापना के 100 साल पूरे होने पर एक बड़ा सवाल खड़ा
हो गया है। बड़ा सवाल यह है कि क्या RSS अपनी स्थापना का असली मकसद हासिल कर पाया है?
इस सवाल का उत्तर यह है कि पूरे 100 साल में भी RSS अपनी स्थापना का असली मकसद पूरा नहीं
कर पाया है। सवाल तो यह भी है कि क्या RSS अपना असली मकसद कभी हासिल कर पाएगा ?
RSS की स्थापना 27 सितंबर 1925 को भारत के नागपुर शहर में हुई थी। वर्तमान में सन 2025 चल
रहा है। 27 सितंबर 2025 को RSS की स्थापना के 100 साल पूरे हो जाएंगे। स्थापना के 100 साल पूरे
होने पर RSS अपना शताब्दी वर्ष पूरी धूमधाम के साथ मनाने की तैयारी कर रहा है। 100 वर्ष के सफर
में RSS ने अनेक उपलब्धि हासिल की हैं। इस दौरान सबसे बड़ा सवाल यह है कि RSS ने अपनी
स्थापना का असली मकसद पूरा क्यों नहीं किया? RSS की स्थापना के असली मकसद पर जाने से
पहले RSS का इतिहास तथा RSS की उपलब्धि जान लेते हैं। फिर आएंगे RSS के असली मकसद पर।
विजय दशमी के पावन पर्व पर पड़ी थी फरर की नींव
RSS को दुनिया का सबसे बड़ा स्वंयसेवी संगठन माना जाता है। RSS के संस्थापक डॉ. केशव बलराम
हेडगेवार थे। हेडगेवार के नाम से प्रसिद्ध रहे RSS के संस्थापक ने 27 सितंबर 1925 को विजय दशमी
के पर्व पर अपने घर एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में हेडगेवार के साथ विश्वनाथ केलकर, भाऊजी
कावरे, अण्णा साहने, बालाजी हुद्दार, बापूराव भेदी आदि मौजूद थे।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानि RSS नाम अस्तित्व में आने से पहले विचार मंथन हुआ। राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ, जरीपटका मंडल और भारतोद्वारक मंडल इन तीन नामों पर विचार हुआ। बाकायदा
वोटिंग हुई नाम विचार के लिए बैठक में मौजूद 26 सदस्यों में से 20 सदस्यों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
नाम के पक्ष में अपना वोट दिया, जिसके बाद RSS नाम अस्तित्व में आया। RSS का दावा है कि
उसके एक करोड़ से ज्यादा प्रशिक्षित सदस्य हैं। संघ परिवार में 80 से ज्यादा समविचारी या आनुषांगिक
संगठन हैं। दुनिया के करीब 40 देशों में संघ सक्रिय है RSS।
RSS का असली मकसद रह गया अधूरा
अब आते हैं RSS के असली मकसद के ऊपर। RSS की स्थापना का असली मकसद भारत को हिन्दू
राष्ट्र बनाना था। RSS स्वयं तो भारत को हिन्दू राष्ट्र मानता तथा बोलता है किन्तु भारत अधिकारिक
रूप से धर्मनिरपेक्ष देश था। भारत को अधिकारिक रूप से हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना लेकर RSS की
स्थापना की गई थी। RSS के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने साफ-साफ कहा था कि भारत को हिन्दू राष्ट्र
बनाना ही RSS की स्थापना का मूल उद्देश्य है। 100 साल हो गए किन्तु RSS का असली मकसद
अधूरा ही बना हुआ है। भारत में RSS के समर्थकों की बड़ी संख्या है।
RSS के समर्थकों का दावा है कि RSS अपने मूल मकसद की तरफ आगे बढ़ रहा है। दूसरी तरफ
भारत के आम नागरिक से लेकर राजनेता तक मानते हैं कि भारत को अधिकारिक रूप से हिन्दू राष्ट्र
बनाने का RSS का सपना हमेशा सपना बनकर ही रह जाएगा। भारत ही नहीं दुनिया के तमाम लोग
मानते हैं कि RSS कितना भी प्रयास कर ले अगले 100 साल में भी RSS भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने
का अपना सपना पूरा नहीं कर पाएगा। यह अलग बात है कि RSS ने पूरी दुनिया का सबसे बड़ा
सामाजिक संगठन बनने का बहुत बड़ा गौरव हासिल किया है।
बात RSS प्रमुख मोहन भागवत के हिन्दू राष्ट्र की
RSS का संक्षिप्त विश्लेषण करने के बाद अब बात करते हैं RSS प्रमुख मोहन भागवत के ताजा बयान
की। RSS प्रमुख ने अपने ताजा बयान में हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को नए सिरे से समझाने का प्रयास
किया है। RSS प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू राष्ट्र का सत्ता या शासन से कोई लेना-देना
नहीं है। हिंदू राष्ट्र किसी धर्म का विरोध नहीं, बल्कि एकजुटता का मंत्र है। इसमें बिना किसी भेदभाव के
सभी के लिए न्याय सुनिश्चित किया जाता है। भागवत संघ शताब्दी वर्ष के तहत पहले व्याख्यान में
100 वर्ष की संघ यात्रा नए क्षितिज विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा, हम राष्ट्र का अनुवाद नेशन
करते हैं, जो एक पश्चिम अवधारणा है, जिसमें राष्ट्र के साथ राज्य भी जुड़ता है। भारत की अवधारणा में
राष्ट्र के साथ राज्य का होना जरूरी नहीं है। हिंदू की परिभाषा बताते हुए भागवत ने कहा, वह जौ अपने
मार्ग पर चलने में भरोसा रखता है और अलग-अलग मत व मान्यताओं वाले लोगों का भी सम्मान करता
है, वह हिंदू है। भारतवर्ष में बीते 40 हजार साल से रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक है। भारत
पहले से अखंड है और विविधता में एकता इसकी असली ताकत है। हम यह नहीं मानते कि एक होने के
लिए सबको एक जैसे कपड़े या एक जैसी सोच रखनी होगी। संघ प्रमुख ने कहा, हिंदू शब्द हमने नहीं
विदेशियों ने हमारी जीवन शैली व मिलजुल कर रहने की संस्कृति के कारण दिया है। ऐसे में अगर हम
हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं तो इसव इसका यह अर्थ नहीं है कि हम किसी का विरोध कर रहे हैं। हैं।
दुनिया में में सिर्फ हिंदू ही हैं जिसने विविधता को एकता के रूप में स्वीकार किया है। विभिन्न पूजा
पद्धतियों का एक ही लक्ष्य तक पहुंचने का माध्यम माना है।
क्या दूसरों को देते रहेंगे बदलाव का ठेका?
भागवत ने कहा, समाज की आदत पड़ गई है कि किसी भी बदलाव के लिए खुद आगे नहीं आता। रावण
से मुक्ति के लिए राम आए, गुलामी से मुक्ति के लिए शिवाजी आए। सवाल यह है कि समाज कब तक
परिस्थितियों में बदलाव का ठेका नेताओं और दलों को देगा। जैसा समाज होगा, वैसे ही दल और नेता
होंगे। जरूरी बदलाव के लिए समाज को ही आगे आना होगा। देश का ठेका सभी को लेना होगा।
RSS किसी को नहीं दबाता है
संघ प्रमुख ने कहा कि अतीत में हम विश्वगुरु थे। लंबी गुलामी से इसमें बदलाव आया। हम देश को
फिर विश्वगुरु बनाना चाहते हैं। यह किसी को दबाने के लिए या नई प्रतिस्पर्धा शुरू करने के लिए नहीं,
बल्कि दुनिया के जरूरत के अनुरूप योगदान देने के लिए बनना चाहते हैं। यह भारत का समय है।
गुलामी से पहले एक ही हम सामरिक व भौगोलिक रूप से चिंतामुक्त थे। जब दुनिया ने देखे को ही सच
माना, तब हमने अपने अंदर झांक कर आंतरिक सुख की तलाश की। यही विचार दुनिया को नई राह
दिखा सकता है।