देश में अब राजभवन का नाम बदलकर लोकभवन और पीएमओ परिसर का नाम बदलकर सेवा‑तीर्थ कर दिया गया है। इस कदम के पीछे सरकार का संदेश है – सत्ता से सेवा की ओर बदलाव और प्रशासन में जनता की प्राथमिकता।

भारत सरकार औपनिवेशिक सोच से मुक्ति और शासन को अधिक जन‑केन्द्रित बनाने के प्रयास में लगातार सरकारी संस्थानों और सड़कों के नाम बदल रही है। हाल में केंद्र सरकार ने राज्यों को राजभवन/राज निवास का नाम बदलकर लोकभवन/लोक निवास रखने और नई प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) परिसर को सेवा‑तीर्थ नाम देने का निर्णय किया है। यह कदम पहले से चले आ रहे नाम‑परिवर्तन (जैसे रेस कोर्स रोड का लोक कल्याण मार्ग तथा राजपथ का कर्तव्य पथ) की कड़ी है और इसका उद्देश्य पद और सत्ता के बजाय सेवा और कर्तव्य की भावना को प्राथमिकता देना है।
पिछले कुछ सालों में कई जगहों के नाम बदलने का काम हुआ है। जैसे दिल्ली में रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग रखा गया और राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ रखा गया। इन बदलावों का संदेश यह है कि सरकारी काम सिर्फ पद और अधिकार के लिए नहीं, बल्कि जनता की सेवा और कर्तव्य निभाने के लिए हैं।
25 नवंबर 2025 को गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे राजभवन/राज निवास का नाम बदलकर लोकभवन/लोक निवास करें। मंत्रालय के अनुसार, ‘राजभवन’ शब्द पुरानी औपनिवेशिक सोच की याद दिलाता है इसलिए इसे बदलना जरूरी था। इसके तुरंत बाद पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम, उत्तराखंड, ओडिशा, गुजरात, त्रिपुरा और लद्दाख ने अपने राजभवनों के नाम बदल दिए। उदाहरण के तौर पर, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी. वी. अनंद बोस ने कोलकाता राजभवन को ‘लोकभवन’ नाम दिया जबकि तमिलनाडु में सभी राजभवनों ने भी नाम परिवर्तन की घोषणा की। हालांकि, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने कहा कि नाम बदलना अच्छा है लेकिन असली बदलाव मानसिकता में होना चाहिए। सरकार का मानना है कि ये कदम लोकतंत्र को ज्यादा जनता-केंद्रित बनाने और राजभवनों को आम लोगों के लिए सुलभ बनाने की दिशा में हैं।
दिल्ली में चल रहे सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत नया प्रधानमंत्री कार्यालय और अन्य प्रमुख सरकारी कार्यालयों के लिए नया एन्क्लेव तैयार किया गया जिसे सेवा तीर्थ नाम दिया गया। इसमें तीन इमारतें शामिल हैं सेवा तीर्थ 1, 2 और 3। सेवा तीर्थ 1 में नया PMO, सेवा तीर्थ 2 में कैबिनेट सचिवालय और सेवा तीर्थ 3 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का कार्यालय होगा। ‘सेवा तीर्थ’ का मतलब है सेवा का पवित्र स्थल यानी यह सिर्फ किसी पद का केंद्र नहीं बल्कि जनता की सेवा का केंद्र है।
जहां समर्थक इसे औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति और जनता-केंद्रित शासन की दिशा में कदम मानते हैं, वहीं आलोचक कहते हैं कि सिर्फ नाम बदलने से प्रशासनिक सोच में बदलाव नहीं आता। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन का कहना है कि “नाम बदलने से ज्यादा जरूरी है कार्यप्रणाली और सोच में बदलाव।” राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ये नाम परिवर्तन मोदी सरकार की ‘नए भारत’ की योजना का हिस्सा हैं जिसमें देश को उसकी औपनिवेशिक छवि से अलग कर जनता के प्रति जिम्मेदार शासन दिखाने की कोशिश की जा रही है।