
Ramcharit Manas Controversy : Bihar Education Minister Professor Chandrashekhar : गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीराम चरित मानस (Ramcharit Manas Controversy) की चौपाई ''ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥''को लेकर देश में एक बार फिर से बड़ा बखेड़ा खड़ा हो गया है। इस चौपाई को लेकर ही बिहार के शिक्षा मंत्री प्रोफेसर चंद्रशेखर (Professor Chandrashekhar) ने बयान दिया कि तुलसीदास कृत रामचरित मानस (Ramcharit Manas) को जला देना चाहिए। इस बयान को दिए हुए तीन दिन हो गए हैं और प्रोफेसर चंद्रशेखर अपने इस बयान पर अभी भी अडिग है। उनके इस से न केवल बिहार की राजनीति गरमा गई, बल्कि देशभर के हिन्दुवादी नेता उनके खिलाफ हो गए और प्रोफेसर के खिलाफ हिन्दुओं की भावनाएं आहत किए जाने का मुकदमा दर्ज किए जाने की मांग करने लगे।
यहां हम आपको स्मरण करना चाहते हैं कि आज से करीब तीन दशक पूर्व भी इस चौपाई को लेकर एक बड़ा आंदोलन एक दलित समाज द्वारा किया गया था। श्रीराम चरित मानस ही नहीं मनु स्मृति में भी ''ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥'' का उल्लेख मिलता है। संविधान रचियता और महान दलित नेता बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर ने भी अपने जीवन काल में इसका विरोध किया था। यही नहीं उस समय डा. अंबेडकर और उनके सहयोगियों और अनुयायियों ने मनु स्मृति की प्रतियां तक जलाई थी। तीन दशक पूर्व इस चौपाई को लेकर जो आंदोलन हुआ था, वह भी डा. अंबेडकर के अभियान से प्रेरित था।
Ramcharit Manas Controversy
यदि दलित चिंतकों की बात माने तो, किसी ने तो इस धर्म ग्रंथ के नष्ट किए जाने की पहल और हिम्मत तो की है। यह "एक दम सच्चा और अच्छा कदम" दलित चिंतकों द्वारा बताया जा रहा है।अब थोड़ा बात करते हैं भगवान श्रीराम के बारे में, भगवान श्रीराम ने हर उस वंचित को गले लगाया है, जिसे समाज द्वारा ठुकरा दिया गया। वनवास काल में उन्होंने निषादराज को गले लगाया। निषादराज एक नीच जाति से आते हैं। इसके बाद उन्होंने केवट को भी गले लगाया। यही नहीं सीता खोज के दौरान उन्होंने शबरी के झूठे बेर भी सेवन किए। जो श्रीराम मानव जाति में किसी भी तरह का ऊंच नीच का भेदभाव नहीं करते हैं, वही राम नीच जाति के विरोधी कैसे हो सकते हैं। फिर गोस्वामी तुलसी दास के ये कौन से राम है, जो ढोल, गंवार, शुद्र, पसु और नारी को ताड़ना के अधिकारी बताते हैं।
यहां एक बात और गौर करने लायक है। भारत में जब मुगल शासन आया तो मुगल शासकों ने धर्म ग्रंथों को भी नष्ट किया था। इस बाबत तर्क दिया जाता है कि कुछ धर्म ग्रंथ ऐसे थे, जो समानता का विरोध करते थे। इन धर्म ग्रंथों के नष्ट होने के बाद ब्राह्मणों ने मुगलों द्वारा नष्ट किए गए धर्म ग्रंथों को आधार बनाते हुए नए धर्म ग्रंथों का निर्माण किया और काफी कुछ ऐसा बदलाव किया, जो केवल एक वर्ग विशेष के हित में हो।
बिहार के शिक्षा मंत्री प्रोफेसर चंद्रशेखर अपने बयान पर अडिग हैं। उन्होंने कहा कि मैं अपने बयान पर कायम हूं और रहूंगा। इस मुद्दे पर उन्होंने ट्वीट करके कहा कि मेरा बयान बहुजनों के हक में है और मैं उस पर अडिग रहूंगा।
जहां एक तरफ शिक्षा मंत्री के इस बयान की आलोचना हो रही है तो दूसरी तरफ उनके बयान को कई हलकों से समर्थन भी मिल रहा है।
बिहार में आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने प्रोफेसर चंद्रशेखर के बयान का समर्थन करते हुए कहा है कि लोहिया जी ने कहा था रामचरितमानस में हीरा मोती भी हैं और बहुत सा कचरा भी है तो हमें कचरे की सफाई करना भी जरूरी है जो चंद्रशेखर जी ने किया है। अन्य कई बड़े दलित नेता भी प्रोफेसर के साथ नजर आ रहे हैं।
मूल रुप से नोएडा के रहने वाले दलित नेता दयाराम जाटव की माने तों दलितों को प्रारंभ से ही उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है। उन्होंने कहा कि रामरचित मानस जो धर्म ग्रंथ है, उसकी कुछ चौपाई और दोहे समानता का अधिकार नहीं देते हैं। उनका कहना है कि यदि हिन्दू दलितों के इतने ही हितैषी हैं तो मंदिरों में दलितों को महंत क्यों नहीं बनाया जाता है। दलित समाज में भी विद्वान हैं, उन विद्वानों को मंदिरों का महंत बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज भी देश के बहुत से ऐसे मंदिर हैं, जहां पर दलित और नीच जाति के लोगों को प्रवेश करने से रोका जाता है। यह समानता का अधिकार नहीं है।