चीन के फैसले से दुनिया में मचा हड़कंप, भारत-अमेरिका की बढ़ी चिंता
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 08:40 AM
Rare Earth Magnets : धरती की गोद में कई अरब साल पहले समाए थे कुछ ऐसे खजाने, जिनकी अहमियत आज की डिजिटल दुनिया में सबसे अधिक हो चुकी है। इन्हीं दुर्लभ खजानों में एक है रेयर अर्थ मैग्नेट। एक ऐसा चुम्बकीय तत्व, जो हमारी कारों, मोबाइलों, रॉकेटों और रक्षा उपकरणों की रफ्तार तय करता है। और अब जब चीन ने इन मैग्नेट्स के निर्यात पर अचानक ब्रेक लगा दिया, तो पूरी दुनिया की तकनीकी रफ्तार लड़खड़ा गई है।
रेयर अर्थ मैग्नेट : अदृश्य लेकिन अपरिहार्य
रेयर अर्थ मैग्नेट कोई साधारण चुम्बक नहीं हैं। ये खास तत्व जैसे नियोडिमियम, सैमरियम, डायसप्रोसियम और टर्बियम से बनते हैं, जो बेहद ताकतवर होते हैं। ये इलेक्ट्रिक गाड़ियों, टरबाइनों, स्पेस सैटेलाइट्स और मिसाइलों तक में इस्तेमाल होते हैं। इन्हें रेयर इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये धरती में बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं और इनका खनन व शुद्धिकरण बेहद जटिल प्रक्रिया होती है।
चीन की मोनोपॉली और वैश्विक संकट
आज दुनिया में इस्तेमाल होने वाले 90% से ज्यादा रेयर अर्थ मैग्नेट चीन में बनते हैं। जब चीन ने हाल ही में इन पर निर्यात प्रतिबंध लगाया, तो अमेरिका, जापान, भारत समेत तमाम देशों में अफरातफरी मच गई। अमेरिका में टेस्ला और जीएम जैसी कंपनियों को प्रोडक्शन स्लोडाउन का सामना करना पड़ा। भारत में मारुति सुजुकी की ग्रैंड विटारा ईवी का प्रोडक्शन टारगेट घटकर 28,000 से 8,000 यूनिट तक रह गया। जापान में स्विफ्ट कार की असेंबली अस्थायी रूप से बंद करनी पड़ी।
भारत के पास संसाधन हैं, लेकिन सिस्टम कमजोर
भारत में रेयर अर्थ खनिजों का भंडार चीन से कम नहीं है। 6.9 लाख टन, जो वैश्विक भंडार का लगभग 5% है। लेकिन चुनौती है। उत्पादन, शोधन और निजी निवेश की भारी कमी। भारत का मौजूदा उत्पादन महज 2,900 टन है और वह भी 1950 में बनी सरकारी कंपनी आईआरईएल (इंडिया रेयर अर्थ्स लिमिटेड) के जरिए। भारत की शोधन तकनीक अभी भी पुरानी और सीमित है। थोरियम जैसे रेडियोएक्टिव तत्वों के कारण खनन पर कई सरकारी प्रतिबंध हैं। प्रोसेसिंग में पर्यावरणीय जोखिम ज्यादा और विशेषज्ञों की संख्या कम है।
भारत क्या कर रहा है?
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि भारत अब रेयर अर्थ पर आत्मनिर्भर बनने के लिए मिशन मोड में काम कर रहा है। सरकार निजी कंपनियों के साथ भागीदारी, नई तकनीकों में निवेश और रेगुलेटरी सुधार पर फोकस कर रही है। साथ ही, भारत अब रेयर-अर्थ-मुक्त इलेक्ट्रिक व्हीकल टेक्नोलॉजी पर भी काम कर रहा है। अगले 2 वर्षों में ऐसी गाड़ियाँ भारतीय बाजार में आ सकती हैं, जिनमें इन दुर्लभ चुम्बकों की जरूरत नहीं होगी।
क्या है आगे का रास्ता?
वैश्विक साझेदारी के तौर पर भारत अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों से खनन और टेक्नोलॉजी सहयोग बढ़ा सकता है। रक्षा और आॅटो क्षेत्र के लिए इन मैग्नेट्स का एक राष्ट्रीय भंडार बनाया जा सकता है। स्थानीय खनन को बढ़ावा देकर भारत को अपने रेगुलेशन सिस्टम को सरल बनाना होगा ताकि निजी क्षेत्र भी इस क्षेत्र में निवेश करे। रेयर अर्थ मैग्नेट भले ही आम लोगों की आंखों से ओझल हों, लेकिन बिना इनके जीवन की गति और तकनीक की उड़ान अधूरी है। चीन के हालिया फैसले ने दुनिया को जता दिया है कि भविष्य में ऊर्जा या पेट्रोलियम से भी ज्यादा रणनीतिक शक्ति अब इन अदृश्य चुम्बकों के हाथ में होगी।