
बिहार की राजनीति हमेशा से जातिगत समीकरणों की बुनियाद पर टिकी रही है। बिहार में सीटों का बटवारा भी जाति के आधार पर तय किया जाता है। बिहार में यादव समुदाय इस जातिगत समीकरण का सबसे बड़ा और निर्णायक खिलाड़ी माना जाता है।बिहार में यादव आबादी लगभग 14% है, जो किसी भी अन्य जाति से कहीं अधिक प्रभावशाली है। यही वजह रही कि दशकों तक राष्ट्रीय जनता दल (RJD) यादव वोटों पर पूरी तरह हावी रही। लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि लालू परिवार का यह “यादव किला” दरकने लगा है। Bihar Assembly Election 2025
2025 के बिहार विधानसभा चुनावों से पहले यह बदलाव और स्पष्ट हो गया है। लंबे समय तक आरजेडी का यादव वोटों पर एकल दबदबा रहा, लेकिन लोकसभा चुनावों ने इस परंपरा को चुनौती दी। यादव मतदाता अब देख रहे हैं कि केंद्र में पहली बार चार मंत्री यादव समुदाय से हैं और मध्यप्रदेश में भी बीजेपी ने यादव मुख्यमंत्री चुनकर नए राजनीतिक संदेश दिए हैं। यह संकेत साफ करता है कि यादव समाज अब आरजेडी को अपने एकमात्र विकल्प के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि बीजेपी और अन्य दलों को भी गंभीर विकल्प के रूप में परख रहा है। Bihar Assembly Election 2025
1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने बिहार की राजनीति में एक ऐसा समीकरण गढ़ा जिसे ‘MY समीकरण’ कहा गया – यादव और मुस्लिम समुदाय की एकजुटता पर आधारित। उन्होंने सिर्फ सामाजिक न्याय और पिछड़ों की आवाज़ को मजबूत नहीं किया, बल्कि यादव वोटों को आरजेडी की सबसे बड़ी ताकत बना दिया। 2020 के विधानसभा चुनाव में यही वोट बैंक आरजेडी को सबसे बड़ी पार्टी बनाकर उभारा। सारण, मधेपुरा, सुपौल और झंझारपुर जैसे यादव बहुल क्षेत्रों में पार्टी का दबदबा साफ दिखा। महागठबंधन ने 144 सीटों में से 75 पर जीत हासिल की, और इसमें यादव मतदाताओं का योगदान सीधे-सीधे निर्णायक साबित हुआ। सच कहें तो यादव वोट आरजेडी के लिए किसी सुपरपावर से कम नहीं थे।
लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों ने आरजेडी के यादव किले पर जोरदार सेंध लगा दी। पार्टी ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 4 ही जीत पाई। यादव उम्मीदवारों की हार ने इस मजबूत वोट बैंक में दरार दिखा दी। कुल वोट शेयर 22.14% होने के बावजूद एनडीए ने 30 सीटें जीतकर पूरी बाज़ी मार ली। खासकर सारण, सीवान और मधुबनी जैसे यादव बहुल क्षेत्रों में NDA की बढ़त ने आरजेडी को हैरत में डाल दिया। ऐसा लग रहा था जैसे यादव किले में अचानक दरारें पड़ गई हों और राजनीतिक भूचाल आरजेडी को हिलाकर रख दिया हो।
मोदी सरकार की विकास योजनाओं और बड़े पैकेज ने यादव वोट बैंक में हलचल पैदा कर दी है। केंद्र ने बिहार को 9.23 लाख करोड़ रुपये का निवेश दिया, वहीं PM किसान, उज्ज्वला योजना, PMAY और मुफ्त राशन जैसे लाभ सीधे यादव किसानों और मजदूरों तक पहुंचे। साथ ही ‘विकास बनाम जंगलराज’ और हिंदुत्व के राजनीतिक संदेश ने यादव मतदाताओं की सोच को नई दिशा दी है। मध्यप्रदेश में यादव मुख्यमंत्री और केंद्र में चार यादव मंत्रियों की नियुक्ति इस बात का संकेत है कि अब यादव समाज बीजेपी को अपने लिए दुश्मन नहीं, बल्कि एक सक्रिय विकल्प के रूप में देखने लगा है। जाहिर है, अब यादव वोटों का महाकुंभ सिर्फ RJD का नहीं रहा।
आरजेडी के सामने अब बड़ा सिरदर्द यही है कि यादव उम्मीदवारों को कितने टिकट दिए जाएँ। 2020 में पार्टी ने 144 उम्मीदवारों में से 58 यादवों को मैदान में उतारा, यानी लगभग 40%, जबकि यादव आबादी सिर्फ 14% है। इतने ज्यादा यादव उम्मीदवारों को टिकट देने से गैर-यादव ओबीसी और ईबीसी मतदाताओं में खीज पैदा हो सकती है, जो आसानी से जेडीयू और बीजेपी की ओर रुख कर सकते हैं। यानी आरजेडी के लिए यादव वोटों की सुरक्षा और ओबीसी/ईबीसी संतुलन के बीच संतुलन साधना अब किसी सियासी पहेली से कम नहीं। Bihar Assembly Election 2025
2025 में आरजेडी यादव और मुस्लिम वोट बैंक को फिर से अपने पक्ष में लाने की हर संभव कोशिश करेगी। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों ने साफ संकेत दे दिए हैं कि यादव वोट अब लालू परिवार को पहले जैसी निष्ठा और उत्साह के साथ समर्थन नहीं दे रहे। अगर यह रुझान जारी रहा, तो आरजेडी को सत्ता की राह में बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है और पार्टी का “यादव किला” कमजोर पड़ता दिख सकता है। साफ है, बिहार की राजनीति में अब पुरानी ताकतों को नए समीकरणों का सामना करना होगा। Bihar Assembly Election 2025