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दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाने का सुप्रीम कोर्ट का 11 अगस्त का आदेश अब विवाद का केंद्र बन गया है। इस फैसले ने डॉग लवर्स और सुरक्षा चिंतित नागरिकों के बीच गहरी बहस छेड़ दी है। जहां अदालत का आदेश कुत्तों को शेल्टर होम्स में भेजने पर जोर देता है, वहीं पशु प्रेमी इसे अमानवीय बताते हुए विरोध कर रहे हैं। आज सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें 11 अगस्त के निर्देश पर रोक लगाने की मांग की गई है। यह विवाद साल 2011 की फिल्म चिल्लर पार्टी की कहानी को सच करता दिख रहा है, जिसमें बच्चों ने अपने आवारा कुत्तों को बचाने के लिए लड़ाई लड़ी थी। आज की दिल्ली की सड़कों पर भी वही सीन दोहराया जा रहा है—जहां सुप्रीम कोर्ट का आदेश, आवारा कुत्तों और उनके अधिकारों की लड़ाई के बीच जमीनी संघर्ष को जन्म दे रहा है। Stray dogs
सुप्रीम कोर्ट के 11 अगस्त के आदेश ने दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों को शेल्टर होम में भेजने की दिशा में बहस को दो धड़ों में बाँट दिया है। एक तरफ डॉग लवर्स हैं, जो इसे अमानवीय बताते हैं और कहते हैं कि कुत्तों को सड़क से हटाना उनके जीवन और सुरक्षा के अधिकार के खिलाफ है। उनका तर्क है कि यह सिर्फ अस्थायी समाधान है और समस्या की जड़ को नहीं छूता। दूसरी ओर ऐसे लोग हैं, जो इन आवारा कुत्तों के हमलों का शिकार बन चुके हैं। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में भारत में 37.17 लाख कुत्तों के काटने के मामले दर्ज किए गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर साल करीब 20 हजार लोग रेबीज से अपनी जान गंवाते हैं, जिनमें से 95% मामलों में स्ट्रे डॉग्स ही जिम्मेदार होते हैं। Stray dogs
दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर करीब 10 लाख आवारा कुत्तों का बसेरा है, जबकि पूरे देश में उनकी संख्या 1.6 करोड़ से लेकर 6.2 करोड़ तक मानी जा रही है। ये बेजुबान जानवर हर गली-मोहल्ले में दिखते हैं और कभी भी हिंसक हो सकते हैं। यही वास्तविकता सुप्रीम कोर्ट के 11 अगस्त के आदेश को और अहम बना देती है, जिसके तहत इन स्ट्रे डॉग्स को सुरक्षित शेल्टर होम्स में भेजने का निर्देश दिया गया है। सुरक्षा की दृष्टि से यह कदम कई नागरिकों के लिए आवश्यक माना जा रहा है, जबकि पशु प्रेमी इसका विरोध कर रहे हैं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि दिल्ली में पर्याप्त सरकारी शेल्टर नहीं हैं। इतने बड़े पैमाने पर शेल्टर बनाने में कम से कम 15,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके अलावा, पड़ोसी राज्यों से गैर-बधियाकृत कुत्तों का आना भी चिंता का विषय है। मेनका गांधी का कहना है कि यह निर्णय जल्दबाज़ी और गुस्से में लिया गया है।
आवारा कुत्तों के मामले में बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए एबीसी (Animal Birth Control) फॉर्मूला सबसे कारगर माना जा रहा है। केंद्र सरकार के एबीसी नियम, 2023 के तहत कुत्तों को पकड़ा जाता है, नसबंदी और टीकाकरण किया जाता है, और फिर उन्हें वापस छोड़ा जाता है। इससे जनसंख्या नियंत्रित होती है और रेबीज का खतरा कम होता है। पिछले तीन सालों में एमसीडी ने लगभग 2.7 लाख कुत्तों की नसबंदी की है। Stray dogs
टीकाकरण और नसबंदी के अलावा, आवारा कुत्तों को गोद लेना (अडॉप्शन) एक व्यवहारिक और मानवतावादी समाधान के रूप में सामने आता है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और सिंगापुर जैसे देशों में कुत्तों को पहले शेल्टर होम्स में रखा जाता है, उनकी नसबंदी और टीकाकरण की जाती है, और फिर उन्हें अडॉप्शन के लिए भेजा जाता है। सुप्रीम कोर्ट के 11 अगस्त के आदेश के बाद यह मॉडल दिल्ली में भी लागू करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, दिल्ली में करीब 10 लाख आवारा कुत्तों की संख्या इसे पूरी तरह लागू करना चुनौतीपूर्ण बनाती है। ब्रिटेन में तो स्थानीय प्रशासन और डॉग्स ट्रस्ट जैसी संस्थाएं मिलकर आवारा कुत्तों की देखभाल और अडॉप्शन का काम संभालती हैं।
सिंगापुर में Animal & Veterinary Service के तहत कुत्तों को पकड़ा, नसबंदी और टीकाकरण कर शेल्टर में रखा जाता है। जापान में भी कड़ा पशु कल्याण ढांचा है, जहां से कुत्तों को गोद लिया जा सकता है। बता दें कि 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आवारा कुत्तों को 6-8 हफ्ते के भीतर सड़कों से हटाकर शेल्टर होम्स में भेजा जाए। आदेश में यह भी कहा गया कि एक बार शेल्टर में भेजे गए कुत्तों को वापस सड़क पर नहीं छोड़ा जाएगा। इसके खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गई हैं। अब 22 अगस्त को अदालत इस पर अंतिम आदेश सुनाएगी। Stray dogs
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