
देश के वरिष्ठ नेता और जम्मू-कश्मीर समेत कई राज्यों के राज्यपाल रह चुके सत्यपाल मलिक का शुक्रवार को निधन हो गया। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे और नई दिल्ली स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में उनका उपचार जारी था। मलिक के निधन की पुष्टि उनके आधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल के माध्यम से की गई। लंबे समय से बीमार चल रहे मलिक को अस्पताल में विशेष चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया था, जहां शुक्रवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। Satyapal malik
अपने पांच दशक से भी लंबे सियासी जीवन में उन्होंने अनेक दलों की राजनीतिक यात्रा की, लेकिन उनकी पहचान हमेशा एक जाट किसान नेता और लोहियावादी विचारधारा के पैरोकार के रूप में बनी रही। जहां एक दौर में वह भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता माने जाते थे, वहीं अपने अंतिम वर्षों में उन्होंने खुलकर मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना की, खासतौर पर पुलवामा हमले और किसान आंदोलन के मुद्दों पर।
24 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले के हिसावदा गांव में जन्मे सत्यपाल मलिक का जीवन प्रारंभिक संघर्षों से भरा रहा। मात्र दो वर्ष की उम्र में उन्होंने पिता को खो दिया था। छात्र जीवन में ही राजनीति से जुड़ाव हो गया और इसके पीछे प्रेरणा स्रोत थे पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह। 1974 में चरण सिंह की पार्टी 'भारतीय क्रांति दल' के टिकट पर उन्होंने पहली बार बागपत विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। 1980 में वे लोकदल के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे और इस दौरान इमर्जेंसी का मुखर विरोध करते हुए जेल भी गए।
राजनीतिक प्रयोगों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। 1984 में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा, लेकिन जल्द ही उससे मोहभंग हो गया। इसके बाद उन्होंने 'जन मोर्चा' नामक पार्टी बनाई और 1988 में उसका जनता दल में विलय कर दिया। 1989 में अलीगढ़ से सांसद बने। 1990 के दशक में मुलायम सिंह यादव के प्रभावी दौर में वह समाजवादी पार्टी में शामिल हुए और 1996 में सपा के टिकट पर अलीगढ़ से चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2004 में वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। हालांकि चुनाव में किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया, लेकिन पार्टी में संगठनात्मक जिम्मेदारी मिली और 2012 में उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। 2017 में उन्हें पहली बार बिहार का राज्यपाल बनाया गया। इसके बाद जम्मू-कश्मीर (2018), गोवा (2019) और मेघालय (2020) जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के राज्यपाल पद की जिम्मेदारी संभाली। जम्मू-कश्मीर में उनके कार्यकाल के दौरान ही अनुच्छेद 370 हटाने की दिशा में घटनाएं तेज़ हुईं।
राज्यपाल के पद से हटने के बाद सत्यपाल मलिक खुलकर मोदी सरकार के खिलाफ बोले। उन्होंने पुलवामा हमले को लेकर केंद्र की लापरवाही का आरोप लगाया और दावा किया कि सुरक्षा बलों की मांगों को नज़रअंदाज़ किया गया, जिसके चलते यह त्रासदी घटी। किसान आंदोलन के दौरान भी उनका रुख सरकार के खिलाफ बेहद सख्त रहा। उन्होंने दिल्ली की सीमाओं पर किसानों की मौत को लेकर कहा था – "700 किसान मर गए, लेकिन केंद्र सरकार से एक संवेदना तक नहीं आई।" उनके इस बयान ने राष्ट्रीय स्तर पर तीखी बहस को जन्म दिया। Satyapal malik