
Sardar Patel Jayanti : भारत के दृष्टिकोण से 31 अक्टूबर का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। 31 अक्टूबर के दिन ही वर्ष 1875 में भारत की धरती पर सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म हुआ था। 31 अक्टूबर 2023 को जब हम उनकी जयंती मना रहे हैं तो उनके द्वारा किए गए महान कार्यों को भी याद कर रहे हैं। सरदार पटेल ने भारत को इतना कुछ दिया है कि उसका वर्णन करने के लिए कागज और स्याही कम पड़ सकते हैं। भारत की जनता को उन्होंने सबसे बड़ा गुरू मंत्र यह दिया था कि-"जब जनता एक हो जाती है, तब उसके सामने क्रूर से क्रूर शासक भी नहीं टिक सकता"। उनके इस मंत्र को समझने से पूर्व उनके जीवन को समझ लेते हैं।
सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात प्रदेश के नडियाद गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम झवेरभाई पटेल और माता का नाम लाडबा देवी था। उनका जन्म पाटीदार समाज में हुआ था। वल्लभभाई पटेल का बचपन करमसाद के पैतृक खेतों में बीता। यहीं से वह मिडिल स्कूल से पास हुए और नडियाद के हाई स्कूल में गए, जहां से उन्होंने 1897 में मैट्रिक पास किया। उन्होंने बाद में लंदन जाकर बैरिस्टर की पढ़ाई की और भारत आकर अहमदाबाद में वकालत करने लगे और इसमें उन्हें बड़ी सफलता मिली। देखते-ही-देखते वे गुजरात के सर्वश्रेष्ठ वकील बन गए थे।
ये वो दौर था जब पूरे भारत में स्वतंत्रता के लिए आंदोलन चल रहे थे। आंदोलन में महात्मा गांधी की मुख्य भूमिका थी। सरदार पटेल महात्मा गांधी से बहुत प्रेरित थे। यही कारण था कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। देश को आजादी दिलाने और आजादी के बाद देश का शासन सुचारु रुप से चलाने में सरदार पटेल का विशेष योगदान रहा है। वर्ष 1917 में भारत में प्लेग और 1918 में अकाल जैसी आपदाएँ भी आईं और दोनों ही मौकों पर सरदार पटेल ने संकट निवारण के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। वर्ष 1917 में उन्हें 'गुजरात सभा' का सचिव चुना गया, जो एक राजनीतिक संस्था थी, जिसने गांधीजी को उनके अभियानों में बहुत मदद की थी।
वहीं 1918 में 'खेड़ा सत्याग्रह' के दौरान सरदार पटेल के संबंध महात्मा गांधी के साथ घनिष्ठ हो गए। उस समय गांधी जी ने कहा था कि यदि वल्लभभाई की सहायता नहीं होती तो "यह अभियान इतनी सफलतापूर्वक नहीं चलाया जाता"। इसके बाद पंजाब में ब्रिटिश सरकार के नरसंहार और आतंक के साथ 'खिलाफत आंदोलन' शुरू हुआ। इसमें गांधी जी और कांग्रेस ने असहयोग का निर्णय लिया। वल्लभभाई ने हमेशा के लिए अपनी कानून की प्रैक्टिस छोड़ दी और खुद को पूरी तरह से राजनीतिक और स्वतंत्रता के कार्यों में लगा दिया।
इस समय तक कांग्रेस ने देश के लिए पूर्ण स्वराज के अपने लक्ष्य को स्वीकार कर लिया था। साइमन कमीशन के बहिष्कार के बाद गांधीजी द्वारा प्रसिद्ध नमक सत्याग्रह शुरू किया गया। इसके बाद 'अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी' ने 8 अगस्त, 1942 को मुंबई (तब का बंबई) में प्रसिद्ध 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित किया। जिसके बाद फिर से ब्रिटिश सरकार द्वारा वल्लभभाई को कार्य समिति के अन्य सदस्यों के साथ 9 अगस्त, 1942 को गिरफ्तार कर लिया गया और गांधी जी, कस्तूरबा के समेत अहमदनगर किले में नजरबंद कर दिया गया।
इस बार सरदार लगभग तीन वर्ष तक जेल में रहे। यह उनके जीवन की सबसे लंबी जेल यात्राओं में से एक थी। जब कांग्रेस नेताओं को मुक्त कर दिया गया और ब्रिटिश सरकार ने भारत की स्वतंत्रता की समस्या का शांतिपूर्ण संवैधानिक समाधान खोजने का निर्णय लिया, उस समय वल्लभभाई पटेल कांग्रेस के मुख्य वार्ताकारों में से एक थे।
जब भारत को वर्ष 1947 में पूर्ण स्वतंत्रता मिली तो सरदार वल्लभभाई पटेल भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री बने और गृह मंत्री बनाएं गए। इसके साथ ही उन्होंने राज्य और सूचना और प्रसारण विभागों के लिए जिम्मेदारी भी उठाई। लेकिन एक गंभीर समस्या अभी भी सामने खड़ी थी जिसका उन्हें सामना करना था। उस समय देश में छोटी-बड़ी 562 रियासतें थीं। इनमें से कई रियासतों ने तो आजाद रहने का ही फैसला कर लिया था, लेकिन सरदार पटेल ने इन सबको देश में मिलाने में अपनी अहम भूमिका निभाई। देश की बड़ी जनसंख्या और राज्यों का एकीकरण वल्लभभाई पटेल के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि में से एक थी।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने बड़े साहस और दूरदर्शिता के साथ भारत-पाकिस्तान विभाजन की समस्याओं को सुलझाया, कानून और व्यवस्था को बहाल किया। इसके साथ ही दोनों देशों से आए हजारों शरणार्थियों के पुनर्वास का काम किया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के चले जाने के बाद आम सेवाओं को दुबारा सुचारु रूप से चलाने और हमारे नए लोकतंत्र को एक स्थिर प्रशासनिक आधार प्रदान करने के लिए एक 'नई भारतीय प्रशासनिक सेवा' का भी गठन किया। सरदार वल्लभभाई पटेल का मुंबई में 15 दिसंबर 1950 को निधन हो गया था। वल्लभभाई पटेल भारत की स्वतंत्रता के प्रमुख वास्तुकारों और अभिभावकों में से एक थे और देश की स्वतंत्रता को मजबूत करने में उनका योगदान अद्वितीय है।
भारत ने सदैव ही देश और दुनिया को 'वसुधैव कुटुंबकम' का मंत्र दिया है। हमारे हजारों साल पुराने शास्त्रों तथा पुराणों में भी 'वसुधैव कुटुंबकम' के महत्व को बताया गया है जिसका अर्थ है "विश्व एक परिवार है"। भारत में राष्ट्रीय एकता की भावना को व्यवहार में लाने वाले सरदार पटेल की जयंती 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। सरदार पटेल 'लौह पुरुष' के रूप में जाने जाते हैं, तथा उन्होंने आजादी के समय 562 रियासतों को एकजुट करके एक संघ का रूप दिया, जिसे आज हम भारत के नाम से जानते हैं।
सरदार पटेल ने समय-समय पर भारत की जनता को संबोधित किया। देश की जनता को दी गई उनकी सबसे बड़ी शिक्षा एकजुटता की थी। उन्होंने जनता को समझाया कि जब जनता एकजुट हो जाती है तो कितना भी खराब व कू्रर शासक क्यों न हो जनता उसे उखाड़ फेंकती है। सरदार पटेल हमेशा कहते थे कि जनता की एकजुटता के मार्ग में धार्मिक कटटरता व जात-पात सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने जनता को समझाया था कि देश की उन्नति के लिए धार्मिक कट्टरता व जातिवाद को समाप्त करना पड़ेगा। अखंड भारत के जनक अपने महान नेता सरदार पटेल की जयंती पर चेतना मंच परिवार उन्हें आकाश भर नमन करता है।
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