सार्वजनिक जगह पर प्रदर्शन करने वालों के चेहरे स्कैन करना क्या निजता के अधिकार का उल्लंघन है? दिल्ली पुलिस की निगरानी और Facial Recognition Technology को लेकर सुप्रीम कोर्ट में ऐसी बहस शुरू हुई है, जिसका असर देशभर में नागरिकों के अधिकारों और पुलिस की कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है।

National News : देश में विरोध प्रदर्शन और नागरिकों की निजता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम मामला पहुंचा है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए CCTV और Facial Recognition Technology के इस्तेमाल पर उठे सवालों के बीच अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और सरकार का पक्ष यह तय करने में अहम होगा कि सार्वजनिक सुरक्षा और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। मंगलवार, 3 नवंबर 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने Software Freedom Law Centre (SFLC) की ओर से दाखिल याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान चेहरे पहचानने वाली तकनीक और निगरानी उपकरणों का इस्तेमाल नागरिकों के निजता के अधिकार को प्रभावित कर सकता है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए सुप्रीम कोर्ट को यह जांचना है कि सार्वजनिक सुरक्षा के नाम पर सरकार और पुलिस नागरिकों के चेहरे, उनकी पहचान और उनसे जुड़े डिजिटल डेटा का इस्तेमाल किस सीमा तक कर सकती हैं।
जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस की निगरानी और प्रदर्शनकारियों की निजता से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत से कहा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रदर्शन स्थलों पर किस तरह की निगरानी की जा रही है और इसके लिए किन कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल किया जा रहा है ? उन्होंने निगरानी के दौरान जुटाए गए डेटा की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि नागरिकों की तस्वीरों और पहचान से संबंधित जानकारी का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है, इसकी स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल CCTV कैमरे लगाने और उन कैमरों से प्राप्त तस्वीरों को Facial Recognition Technology के जरिए किसी व्यक्ति की पहचान से जोड़ने के बीच कानूनी अंतर हो सकता है ?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने निजता के अधिकार से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की तस्वीर देखने और उसकी पहचान करने का काम इंसान के बजाय बेहद शक्तिशाली मशीन करने लगे, जो लाखों नागरिकों के चेहरों को पहचान सकती है, तो यह जांचना जरूरी होगा कि इससे निजता के अधिकार का उल्लंघन तो नहीं हो रहा। अदालत ने यह भी सवाल किया कि किसी व्यक्ति की तस्वीर को पहचानने के बाद उसके डेटा का किस तरह इस्तेमाल किया जाता है और क्या उस जानकारी का इस्तेमाल उसके खिलाफ किया जा सकता है ? जस्टिस बागची ने सार्वजनिक स्थान पर निजता की उचित अपेक्षा (Reasonable Expectation of Privacy) के सवाल को भी महत्वपूर्ण बताया। अदालत के सामने अब यह तय करने का मुद्दा है कि सार्वजनिक जगह पर मौजूद होने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि व्यक्ति के सभी व्यक्तिगत अधिकार समाप्त हो जाएं।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि निर्धारित प्रदर्शन स्थलों पर CCTV कैमरे सुरक्षा व्यवस्था के उद्देश्य से लगाए गए हैं। इनका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी तरह की अप्रिय घटना न हो और आम नागरिकों की सुरक्षा बनी रहे। उन्होंने दलील दी कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शन कर रहा होता है, तो वहां मौजूद CCTV कैमरों को निजता के अधिकार का उल्लंघन कैसे माना जा सकता है ? उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा के लिए सार्वजनिक स्थानों पर कैमरों की उपयोगिता का भी उल्लेख किया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह भी स्पष्ट किया कि Facial Recognition System से किसी व्यक्ति की पहचान होने का मतलब यह नहीं है कि उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई कर दी जाती है। पहचान की पुष्टि के लिए भौतिक सत्यापन किया जाता है। यानी पुलिस संबंधित व्यक्ति की मौजूदगी और अन्य तथ्यों की जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई करती है।
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों से जुड़ी है। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में दावा किया था कि Facial Recognition System के माध्यम से प्रदर्शन स्थल पर 2,873 ऐसे लोगों की पहचान हुई, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड पुलिस के उपलब्ध डेटाबेस से मेल खाता था। पुलिस के अनुसार, इनमें से 2,402 लोगों की पहचान Crime Kundli डेटाबेस के जरिए और 471 लोगों की पहचान आपराधिक रिकॉर्ड के आधार पर हुई थी। पुलिस ने अदालत को बताया था कि इन लोगों के मामलों की आगे जांच की जा सकती है, लेकिन केवल Facial Recognition System से मिले परिणाम के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जाता। इसके लिए अलग से भौतिक सत्यापन किया जाता है। दूसरी तरफ, इस तकनीक की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठे।
यह इस मामले का सबसे अहम संवैधानिक सवाल है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2017 में के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ मामले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना था। इस फैसले के अनुसार, निजता के अधिकार पर किसी भी सरकारी हस्तक्षेप के लिए कानूनी आधार, वैध उद्देश्य और आनुपातिकता जैसे पहलुओं की कसौटी महत्वपूर्ण है। अब सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शन करने वाले लोगों की तस्वीरों को Facial Recognition Software के जरिए पुलिस के आपराधिक डेटाबेस से मिलाना इन संवैधानिक कसौटियों पर खरा उतरता है ? याचिकाकर्ताओं का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल नागरिकों की पहचान और उनकी व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल स्पष्ट कानूनी सुरक्षा उपायों के बिना नहीं होना चाहिए। वहीं केंद्र सरकार का पक्ष है कि सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए निगरानी जरूरी हो सकती है।
इस सुनवाई में केवल पुलिस निगरानी और निजता का मामला ही नहीं उठा, बल्कि दिल्ली के व्यापारियों की आजीविका का मुद्दा भी सामने आया। व्यापारियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि विरोध प्रदर्शनों और उनसे जुड़ी व्यवस्थाओं के कारण दिल्ली के कई बाजारों का कारोबार प्रभावित हुआ है। उन्होंने दावा किया कि त्योहारों के मौसम में दुकानों के बंद रहने से व्यापारियों और उनसे जुड़े लाखों कामगारों को नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने मांग की कि ऐसे प्रदर्शन और धरने लंबे समय तक जारी रहने से आम कारोबार प्रभावित होता है। इसलिए इस पर कोई व्यावहारिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार और व्यापार तथा आजीविका का अधिकार दोनों महत्वपूर्ण हैं। किसी एक पक्ष के अधिकार को ध्यान में रखकर दूसरे पक्ष के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह भी टिप्पणी की कि किसी निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता। ऐसे स्थलों का इस्तेमाल एक निश्चित अवधि और तय शर्तों के तहत होना चाहिए। अदालत ने कहा कि किसानों, मजदूरों, ट्रेड यूनियनों और अन्य संगठनों को भी प्रदर्शन करने का अधिकार है। इसलिए किसी एक समूह के लंबे समय तक किसी स्थान पर बने रहने से दूसरे समूहों के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए।
पीठ ने यह भी कहा कि प्रदर्शन के लिए स्थान और अवधि तय करते समय सभी संबंधित पक्षों के अधिकारों को ध्यान में रखना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने SFLC की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अब इस मामले में सरकार को अपना पक्ष और संबंधित कानूनी प्रावधान स्पष्ट करने होंगे। अदालत के सामने मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण सवाल हैं। पहला, सार्वजनिक स्थान पर CCTV कैमरे और Facial Recognition Technology के इस्तेमाल की कानूनी सीमा क्या होगी? दूसरा, प्रदर्शनकारियों की तस्वीरों और व्यक्तिगत डेटा को कितने समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और उसका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है? तीसरा, पुलिस की निगरानी और नागरिकों के निजता तथा विरोध प्रदर्शन के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा? फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। लेकिन अदालत की सुनवाई ने देश में डिजिटल निगरानी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस जरूर शुरू कर दी है।
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