
SC : हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक टिप्पणी ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। हाईकोर्ट ने एक POCSO मामले में आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि "लड़की ने स्वयं मुसीबत को न्योता दिया।" इस विवादास्पद टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने न केवल आपत्ति जताई, बल्कि स्वतः संज्ञान लेते हुए इस पर सख्त रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह शामिल हैं, ने कहा:
“ऐसी टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए थी।”
“ऐसा कहा ही क्यों गया?”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक जिम्मेदारी का निर्वहन करते समय संवेदनशीलता और विवेक आवश्यक है।
कोर्ट ने आदेश पर दुख और नाराज़गी जताई, विशेषकर जब पीड़िता को ही दोषी ठहराया गया।
10 अप्रैल 2025 को दिए गए आदेश में कोर्ट ने कहा:
पीड़िता बालिग और शिक्षित है।
उसे अपने निर्णयों के कानूनी और नैतिक परिणाम समझने चाहिए थे।
उसने "स्वेच्छा से" शराब पी, देर रात तक बार में रुकी और आरोपी के साथ गई।
इसलिए उसने "स्वयं परेशानी को न्योता दिया।"
इस आधार पर आरोपी निश्चल चांडक को ज़मानत मिल गई।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
महिला की आज़ादी, उसकी पसंद और उसकी गलती न मानी जाए।
न्यायाधीशों को पीड़िता को दोषी ठहराने से बचना चाहिए।
ऐसे वक्तव्यों से न्यायपालिका की साख और महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था:
“सिर्फ छाती पकड़ना या नाड़ा खींचना, दुष्कर्म का प्रयास नहीं।”
इस टिप्पणी पर भी सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही रोक लगा दी थी।
पीड़िता मात्र 14 वर्ष की थी।
बाइक पर बैठाकर लड़की को सुनसान जगह ले जाया गया।
उसके कपड़े उतारने और पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश हुई।
स्थानीय लोगों के आने पर आरोपी भाग निकले। SC :