
बिहार में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शुक्रवार को सीतामढ़ी के पुनौरा धाम में माता सीता मंदिर का शिलान्यास करने जा रहे हैं। यह कदम न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि इसे आगामी चुनाव से पहले एनडीए के राजनीतिक समीकरण को और पुख्ता करने की रणनीति भी माना जा रहा है। Bihar Assembly Election 2025
माता सीता की जन्मस्थली मिथिलांचल लंबे समय से बिहार की सत्ता संतुलन का निर्णायक क्षेत्र रहा है। जिस तरह दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है, उसी तरह पटना के सिंहासन की चाबी अक्सर मिथिलांचल की जनता के हाथ में रहती है। कभी यह क्षेत्र RJD का अभेद गढ़ माना जाता था, लेकिन पिछले एक दशक में यह जेडीयू-बीजेपी के मजबूत किले में तब्दील हो चुका है। अमित शाह के दौरे को इसी किले को और दुरुस्त करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। वे पुनौरा धाम में भूमि पूजन और मंदिर शिलान्यास के साथ एक भव्य आयोजन में हिस्सा लेंगे, जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राज्य सरकार के कई मंत्री भी मौजूद रहेंगे।
करीब 67 एकड़ में बनने वाला यह मंदिर परिसर अयोध्या के राम मंदिर की तर्ज पर विकसित होगा। इसमें माता सीता के भव्य मंदिर के अलावा संग्रहालय, सीता वाटिका और लवकुश वाटिका भी होगी। पुनौरा धाम हिंदू आस्था का ऐतिहासिक केंद्र रहा है और इसे माता सीता की जन्मस्थली के रूप में मान्यता प्राप्त है। बीजेपी, जो राम मंदिर निर्माण का श्रेय पहले से लेती रही है, अब सीता मंदिर को भी अपनी उपलब्धियों की सूची में जोड़ना चाहती है। यह धार्मिक पहल विकास के पैकेज के साथ सियासी संदेश भी देगी, खासकर उस समय जब चुनावी बिसात बिछ चुकी है।
मिथिलांचल के सात जिलों - मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, वैशाली और सहरसा में विधानसभा की कुल 60 सीटें आती हैं, जो राज्य की कुल सीटों का लगभग एक-चौथाई हिस्सा हैं। 2020 में NDA ने इनमें से 40 सीटों पर जीत हासिल कर अपनी मजबूत पकड़ दिखाई थी। जातीय समीकरण के लिहाज से यहां ब्राह्मण, राजपूत, यादव, अति पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय का बड़ा असर है। ब्राह्मण-राजपूत जहां बीजेपी का पारंपरिक वोटबैंक माने जाते हैं, वहीं ईबीसी और यादव मतदाता जेडीयू और आरजेडी के बीच बंटे रहते हैं। मुस्लिम आबादी कुछ क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाती है, जिसे आरजेडी साधने की कोशिश करती रही है।
बता दें कि2005 में नीतीश कुमार के उदय के साथ यह इलाका जेडीयू का गढ़ बना, लेकिन 2015 में महागठबंधन में शामिल होकर चुनाव लड़ने पर जेडीयू ने बीजेपी को यहां कमजोर कर दिया था। 2020 में दोनों दलों की दोस्ती ने महागठबंधन को मिथिलांचल में करारी हार दी। दरभंगा, मधुबनी और सीतामढ़ी जैसे जिलों में एनडीए का दबदबा साफ दिखा।
मोदी सरकार ने मिथिलांचल में राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए दरभंगा एयरपोर्ट, एम्स की सौगात, मैथिली भाषा में संविधान की उपलब्धता और मखाना को जीआई टैग जैसी योजनाएं लागू कीं। अब शाह के इस दौरे से बीजेपी-जेडीयू गठबंधन एक साथ धार्मिक आस्था, विकास और राजनीतिक संदेश तीनों को साधने की कोशिश करेगा। सवाल यही है—क्या यह रणनीति एनडीए के गढ़ को अजेय बनाए रख पाएगी, या RJD का ‘मिथिला प्रदेश’ का दांव यहां नई सियासी बयार बहा देगा। Bihar Assembly Election 2025