Shankaracharya Jayanti : जन्म से पहले ही तय हो गई थी शंकाराचार्य की मृत्यु
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 05:38 PM
Shankaracharya Jayanti : आज हिंदुओं के सबसे बड़े धर्म आचार्य आदि गुरु शंकराचार्य की जयंती (Shankaracharya Jayanti) है। हिंदू पंचांग के अनुसार इनका जन्म 788 ईसवी में वैशाख मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को हुआ था। इस वर्ष वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 25 अप्रैल को पड़ रही है। आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म दक्षिण भारत में एक नंबूदरी ब्राह्मण कुल में हुआ था।
8 साल की उम्र में हुआ वेदों का ज्ञान -
शंकराचार्य जी ने मात्र 8 साल की उम्र में वेद, पुराण उपनिषद, रामायण महारत सहित सभी धर्मग्रंथ कंठस्थ कर लिए थे।
हिंदू धर्म के रक्षक थे शंकराचार्य-
हिंदू धर्म के रक्षक आदि गुरु शंकराचार्य का उल्लेख शास्त्रों में भी किया गया है। सनातन धर्म में इन्हें शिव का अवतार माना जाता है। उन्होंने वेदों में लिखे ज्ञान का प्रचार प्रसार किया है, और भारत के चार कोनों में चार मठों की स्थापना की है। 8 वर्ष की अवस्था में ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के ठीक नीचे इन्होंने गोविंदाचार्य से दीक्षा लेकर सन्यास ग्रहण किया था। इसके बाद वाराणसी होते हुए बद्रिकाश्रम तक पैदल यात्रा की थी। 16 वर्ष की आयु में बद्रिकाश्रम में इन्होंने ब्रह्मसूत्र विषय पर भाष्य लिखा था।
जन्म से पहले ही तिथि शंकराचार्य की मृत्यु -
पौराणिक मान्यता के अनुसार आदि गुरु शंकराचार्य की माता आर्यंबा और पिता शिवगुरु ने पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की कठिन आराधना की थी। इनकी प्रार्थना से प्रसन्न हो भोलेनाथ ने इन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। यह भी मान्यता है कि इनके माता-पिता ने शिवजी से आराधना की थी कि, उनके संतान की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैले। शिव जी ने इनके माता-पिता की यह मनोकामना तो पूरी कर दी, लेकिन इसके बदले में यह शर्त भी रखी कि या तो उनका पुत्र प्रसिद्धि हासिल करेगा या फिर दीर्घायु होगा। शंकराचार्य के माता-पिता ने सर्वज्ञ संतान की कामना की। जिसकी वजह से शंकराचार्य अल्पायु हुए। मात्र 32 साल की अवस्था में 820 ईसवी में शंकराचार्य जी ने समाधि ले ली।
Shankaracharya Jayanti -
ओंकारेश्वर से है आदि गुरु शंकराचार्य का खास रिश्ता -
मध्यप्रदेश में स्थित ओमकारेश्वर से आदि गुरु शंकराचार्य का एक बेहद खास रिश्ता है। यह आदि गुरु शंकराचार्य की दीक्षा स्थली है। गुरु शिष्य के सम्मान भरे रिश्ते की प्रतीक इस तीर्थ स्थली में शंकराचार्य के गुरु गोविंदपाचार्य की गुफा है। इस गुफा में आदि गुरु शंकराचार्य को मां नर्मदा को अपना कमंडल लेते हुए दिखाने वाली एक मूर्तियां स्थापित की गई। ओंकारेश्वर आने वाले श्रद्धालुओं को सबसे पहले गोविंदपाचार्य की मूर्ति के ही दर्शन प्राप्त होते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार नर्मदा नदी में बाढ़ आने से उसका पानी गोविंदपाचार्य की गुफा तक पहुंच चुका था। उस समय गोविंदपाचार्य गुफा के अंदर तपस्या कर रहे हैं। उस समय गुरु की तपस्या भंग ना हो इसलिए शंकराचार्य ने मां नर्मदा से शांत हो जाने की प्रार्थना की थी। उसी समय मां नर्मदा शंकराचार्य के कमंडल में समा गई थी। इसके बाद से ही इस गुफा की महत्वता और भी अधिक बढ़ गई है।
ओमकारेश्वर में बन रही आदि गुरु शंकराचार्य की प्रतिमा -
मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में आदि गुरु शंकराचार्य की प्रतिमा बन रही है जो 108 फीट ऊंची होगी, जिसे 54 फीट ऊंचे प्लेटफार्म पर स्थापित किया जाएगा। इस प्रतिमा को बनाने के लिए दो हजार करोड़ रुपए की लागत लग रही है। यह प्रतिमा आदिगुरु शंकराचार्य के बाल स्वरूप की होगी। प्रतिमा का निर्माण कंस्ट्रक्शन कंपनी, पर्यटन विकास निगम के जरिए किया जा रहा है।