
श्राद्ध
श्राद्ध का अर्थ पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव से है । जो मनुष्य उनके प्रति उनकी तिथि पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार फलफूल, अन्न, मिष्ठान आदि से ब्राह्मण को भोजन कराते हैं । उनसे पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। इसे पितृयज्ञ भी कहते हैं। श्राद्ध के द्वारा व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है और पितरों को संतुष्ट करके स्वयं की मुक्ति के मार्ग पर बढ़ता है । धर्म शास्त्रों के अनुसार पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है । उस पर प्रसन्न होकर पितृ उसे आशीर्वाद देकर जाते हैं । वर्ष में उस तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध भी कहते हैं इसमें केवल एक पितर की संतुष्टि के लिए श्राद्ध किया जाता है। इसमें एक पिंड का दान और एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। श्राद्ध को दक्षिण भारत में पिण्डदान भी कहते हैं वैसे तो दोनों ही शब्द एक ही शब्द के दो पहलू है पिण्डदान शब्द का अर्थ है अन्न को पिण्डाकार में बनाकार पितर को श्रद्धा पूर्वक अर्पण करना । यह भी सच है की श्राद्ध करने से हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं इस दिन हमारे बच्चे भी उन्हें जान पाते हैं . ये भी समझ पाते हैं की हमारे परिवार में खाली जीवित सदस्यों का ही नहीं जो चले गए उनका भी सम्मान किया जाता है।
पितृ पक्ष
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब सूर्य नारायण कन्या राशि में विचरण करते हैं तब पितृ लोक पृथ्वी लोक के सबसे अधिक नजदीक आता है। अत : इस दिन पार्वण श्राद्ध किया जाता है। पार्वण श्राद्ध में 9 ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है, किंतु सामर्थ्य अनुसार शास्त्र किसी एक सात्विक एवं संध्या वंदन करने वाले ब्राह्मण को भी भोजन करा सकते हैं । पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध दो तिथियों पर किए जाते हैं, प्रथम मृत्यु या क्षय तिथि पर और दूसरा पितृ पक्ष में जिस मास और तिथि को पूर्वज की मृत्यु हुई है या जिस तिथि को उसका दाह संस्कार हुआ है। इस संसार में हर प्राणी या वास्तु का एक जोड़ा होता है । जैसे - रात - दिन, अँधेरा- उजाला, काला- सफेद, नर - मादा इत्यादि सभी चीजें अपने जोड़े से ही जानी जाती हैं तथा एक दूसरे की पूरक होती है। इसीलिए एक-दूसरे पर निर्भर भी होती हैं । ऐसे ही दृश्य और अदृश्य संसार का जोड़ है। दृश्य यानी जिसे हम देख पाते हैं अदृश्य जो हमारी दृष्टि से ओझल है सामने नहीं है यानी हमारे पितृ । हमारे पितृ भी हमारे श्राद्धों से हमारी श्रद्धा देखते हैं तृप्त होते हैं और हमें आशीर्वाद देते हैं।
हम अपने पितरों का ऋण तो नहीं चुका सकते पर श्राद्ध द्वारा हम उनको याद करते हैं तथा अपने परिवार को अपने पितरों के बारे में बता उनसे जोड़ते हैं है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध कर सकते है। धर्म ग्रंथों के मुताबिक श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध किया जाता है । इस दिन से ही श्राद्ध का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिंडदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है। श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।
यह भी माना जाता है की श्राद्ध विधि पूर्वक करना चाहिए अन्यथा हमारे पितृ हमें श्राप भी दे देते हैं। अपनों को श्राप देना तो काफी कठिन है पर दुखी अवश्य होते होंगे। दझिण भारत में श्राद्ध को ही पिंडदान कहते हैं । वैसे हैं दोनों ही एक शब्द के दो पहलू . अन्न को पिण्डाकार मे बनाकार पितर को श्रद्धा पूर्वक अर्पण करना इसी को पिण्डदान कहते हैं माना जाता है कि श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है की हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा से वे पितृलोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं।
श्राद्धों में कुश और तिल का महत्व
कुश और तिल दोनों ही विष्णु के शरीर से निकलते हैं गरुड़ पुराण के अनुसार, तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्रभाग में रहते हैं। ये भी सर्वविदित है कि कुश जल और वनस्पतियों का सार कहलाते हैं । कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्यों का और जड़ पितरों का माना जाता है। तिल पितरों को बहुत प्रिय हैं और दुष्ट आत्माओं को दूर भगाने वाले माने जाते हैं। इसलिए माना जाता है कि बिना तिल बिखेरे यदि श्राद्ध किया जाये तो दुष्टात्माएँ हवि को ग्रहण कर लेती हैं।वर्ष 2022 के श्राधों की तिथियाँ
शनिवार सितम्बर 10
गूंगे बहरे पितरों का श्राद्ध, या पुर्णिमा- पड़वा श्राद्ध
रविवार सितम्बर 11
तिथि द्वितया का श्राद्ध
सोमवार सितम्बर 12
तिथि तृतीया का श्राद्ध
मंगलवार सितम्बर 13
तिथि चतुर्थी का श्राद्ध
बुधवार सितम्बर 14
तिथि पंचमी का श्राद्ध
ब्रहस्पतिवार सितम्बर 15
तिथि षष्ठी या भरणी का श्राद्ध
शुक्रवार 16 सितम्बर
तिथि सप्तमी का श्राद्ध
रविवार सितम्बर 18
तिथि अष्टमी का श्राद्ध।
सोमवार सितम्बर 19
तिथि नवमी का श्राद्ध
मंगलवार 20 सितम्बर
मातृ नवमी का दशमी का श्राद्ध
बुधवार सितम्बर 21
तिथि एकादश का श्राद्ध
गुरुवार सितम्बर 22
तिथि द्वादश का श्राद्ध
शुक्रवार सितंबर 23
तिथि त्रयोदशी का श्राद्ध
शनिवार सितम्बर 24
तिथि चतुरदशी दुर्घटना या अकाल मृत्यु वाले पीतरों का श्राद्ध
रविवार सितम्बर 25
तिथि अमावस्या का श्राद्ध
या सर्वपित्र श्राद्ध