भारतीय जनता पार्टी की नेता, BJP की राष्ट्रीय महासचिव, पूर्व लोकसभा सदस्य, पूर्व केंद्रीय मंत्री, कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी दुश्मन, राहुल गांधी को हार का मजा चखाने वाली, सास भी कभी बहू थी तथा तुलसी ईरानी आदि -आदि ये सारे परिचय एक ही महिला के है।

Smriti Irani : भारतीय जनता पार्टी की नेता, BJP की राष्ट्रीय महासचिव, पूर्व लोकसभा सदस्य, पूर्व केंद्रीय मंत्री, कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी दुश्मन, राहुल गांधी को हार का मजा चखाने वाली, सास भी कभी बहू थी तथा तुलसी ईरानी आदि -आदि ये सारे परिचय एक ही महिला के है। इस महिला का पूरा नाम स्मृति ईरानी हैं। स्मृति ईरानी आज किसी भी परिचय की मोहताज नहीं है। वर्तमान युग में स्मृति ईरानी भारत में तमाम लड़कियों, महिलाओं तथा तमाम युवाओं के लिए एक बहुत बड़ी मिसाल बन गई है। यहां हम आपको स्मृति ईरानी के सफर से परिचित कर रहे हैं। Smriti Irani
आपको बता दें कि टेलीविजन की दुनिया में एक समय ऐसा था, जब ‘तुलसी विरानी’ नाम सुनते ही करोड़ों दर्शकों के सामने स्मृति ईरानी का चेहरा उभर आता था। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ ने स्मृति ईरानी को घर-घर में पहचान दी और तुलसी का किरदार भारतीय टेलीविजन की सबसे लोकप्रिय महिला भूमिकाओं में शामिल हो गया। लेकिन स्मृति ईरानी की कहानी सिर्फ एक सफल टीवी अभिनेत्री की कहानी नहीं है। उन्होंने उस लोकप्रियता को अपनी मंजिल नहीं बनने दिया और मनोरंजन की चकाचौंध से निकलकर भारतीय राजनीति के बेहद कठिन मैदान में कदम रखा। आज स्मृति ईरानी की पहचान सिर्फ तुलसी विरानी के तौर पर नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री के रूप में भी है। खास बात यह है कि करीब दो दशक तक राजनीति में सक्रिय रहने के बाद उन्होंने फिर टीवी पर तुलसी के रूप में वापसी की और अब 2026 में बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने के बाद उनका राजनीतिक सफर एक बार फिर चर्चा में है। Smriti Irani
स्मृति ईरानी ने वर्ष 2000 में टेलीविजन की दुनिया में कदम रखा। इसी दौर में उन्हें एकता कपूर के लोकप्रिय धारावाहिक ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में तुलसी विरानी का किरदार मिला। यह भूमिका उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुई। तुलसी एक ऐसी महिला थीं, जो परिवार से गहराई से जुड़ी थीं, लेकिन अन्याय के सामने चुप नहीं रहती थीं। वह पत्नी, मां, बहू और सास की भूमिकाओं के बीच अपनी पहचान बनाए रखने वाली महिला के रूप में सामने आईं। यही वजह रही कि दर्शकों ने तुलसी को केवल एक टीवी किरदार के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे अपने परिवार और सामाजिक जीवन का हिस्सा मान लिया। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ अपने दौर के सबसे चर्चित और लोकप्रिय धारावाहिकों में रहा। स्मृति ईरानी के अभिनय ने तुलसी विरानी को ऐसा चेहरा दिया, जिसकी लोकप्रियता शो की कहानी से भी आगे निकल गई। Smriti Irani
स्मृति ईरानी के लिए सबसे बड़ा फैसला तब आया, जब उन्होंने मनोरंजन की दुनिया की स्थापित पहचान के बावजूद राजनीति का रास्ता चुना। उन्होंने वर्ष 2003 में बीजेपी की सदस्यता ली और 2004 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा। उनका राजनीतिक पदार्पण आसान नहीं था। 2004 में उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद स्मृति पीछे नहीं हटीं। संगठन में काम करते हुए उन्होंने धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक पहचान बनाई और पार्टी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंचीं। स्मृति ईरानी की राजनीतिक यात्रा में अमेठी का विशेष स्थान रहा है। वर्ष 2014 में बीजेपी ने उन्हें अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा। वह चुनाव हार गईं, लेकिन उनकी सक्रियता और राजनीतिक संघर्ष ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इसके बाद उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में केंद्रीय मंत्री की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्रालय समेत कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। बाद में वह कपड़ा मंत्रालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से भी जुड़ीं। वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव स्मृति ईरानी के राजनीतिक जीवन का ऐतिहासिक पड़ाव बना। उन्होंने अमेठी में राहुल गांधी को हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया। इस जीत के बाद स्मृति ईरानी की पहचान बीजेपी की सबसे चर्चित महिला नेताओं में और मजबूत हो गई। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें अमेठी से कांग्रेस के किशोरी लाल शर्मा के हाथों हार का सामना करना पड़ा। चुनावी हार के बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव खत्म नहीं हुआ। Smriti Irani
स्मृति ईरानी का राजनीतिक सफर केवल जीत की कहानी नहीं है। इसमें हार, आलोचना, विवाद और लगातार सार्वजनिक निगरानी भी शामिल रही है। उन्होंने चुनावी हार के बाद भी सार्वजनिक जीवन से दूरी नहीं बनाई। यही वह पक्ष है, जो उनके सफर को तुलसी विरानी के किरदार से जोड़ता है। तुलसी भी परिस्थितियां बदलने के बावजूद परिवार और अपने फैसलों के लिए खड़ी दिखाई देती थीं। स्मृति के राजनीतिक जीवन में भी संघर्षों के बीच सक्रिय बने रहने की प्रवृत्ति साफ दिखाई देती है। उनकी यात्रा यह भी बताती है कि किसी लोकप्रिय चेहरे के लिए राजनीति में प्रवेश करना और लंबे समय तक टिके रहना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। टीवी की लोकप्रियता ने उन्हें पहचान जरूर दी, लेकिन संगठनात्मक राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए उन्हें अलग तरह की मेहनत करनी पड़ी। स्मृति ईरानी की कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय तब आया, जब उन्होंने लंबे अंतराल के बाद फिर से ‘तुलसी विरानी’ का किरदार निभाने का फैसला किया। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी 2’ में स्मृति ईरानी और अमर उपाध्याय की जोड़ी एक बार फिर दर्शकों के सामने आई। मूल धारावाहिक के करीब 25 साल बाद तुलसी और मिहिर की वापसी ने टेलीविजन दर्शकों के बीच पुरानी यादें ताजा कर दीं। स्मृति ने खुद अपनी पहचान को ‘पार्ट-टाइम एक्टर, फुल-टाइम पॉलिटिशियन’ के रूप में बताया था। उनका कहना रहा कि राजनीति में रहते हुए अभिनय की दुनिया में वापसी उनके लिए केवल किसी पुराने किरदार को दोबारा निभाना नहीं था, बल्कि दर्शकों और पुराने सहयोगियों से दोबारा जुड़ने जैसा अनुभव था। Smriti Irani
साल 2026 में स्मृति ईरानी एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र में हैं। बीजेपी की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके राजनीतिक करियर को लेकर चर्चाएं तेज हुई हैं। मीडिया रिपोर्टों में इसे उनकी सक्रिय राजनीति में बड़े कमबैक के तौर पर देखा गया है। इसी दौरान बीजेपी ने युवाओं, खासकर Gen Z तक पहुंच बनाने के लिए भी एक टीम बनाई है, जिसमें स्मृति ईरानी प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। यह संकेत है कि पार्टी उन्हें नई पीढ़ी के साथ संवाद और राजनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका में देख रही है। हाल में एक बड़े सार्वजनिक मंच पर स्मृति ईरानी ने राजनीति, महिलाओं की भूमिका, सत्ता और सार्वजनिक जीवन की चुनौतियों पर भी खुलकर बात की। उन्होंने महिलाओं के लिए सार्वजनिक जीवन में मौजूद अतिरिक्त दबाव और चुनौतियों का उल्लेख किया। Smriti Irani
तुलसी विरानी काल्पनिक चरित्र थीं और स्मृति ईरानी वास्तविक जीवन की राजनीतिक शख्सियत हैं। दोनों को एक मानना सही नहीं होगा। लेकिन दोनों की कहानियों में एक समानता जरूर दिखाई देती है—मुश्किल परिस्थितियों के सामने हार न मानने की प्रवृत्ति।तुलसी ने टेलीविजन के पर्दे पर परिवार और रिश्तों के संघर्षों का सामना किया। स्मृति ने वास्तविक दुनिया में चुनावी हार, राजनीतिक विरोध और सार्वजनिक आलोचना के बीच अपना सफर जारी रखा।यही वजह है कि स्मृति ईरानी की कहानी सिर्फ ‘एक्ट्रेस से नेता’ बनने की कहानी नहीं रह जाती। यह उस महिला की कहानी बन जाती है, जिसने अपने जीवन में एक सफल पहचान हासिल करने के बाद भी खुद को उसी पहचान तक सीमित नहीं रहने दिया। Smriti Irani
आज जब स्मृति ईरानी को एक तरफ फिर तुलसी विरानी के रूप में टेलीविजन पर देखा जा रहा है और दूसरी तरफ बीजेपी की राष्ट्रीय राजनीति में उनकी सक्रियता बढ़ रही है, तब उनके करियर का यह सफर एक अलग ही तस्वीर पेश करता है। एक समय करोड़ों दर्शक उन्हें टीवी की आदर्श बहू और परिवार की मजबूत महिला के रूप में देखते थे। बाद में वही चेहरा चुनावी मैदान में उतरा, संसद पहुंचा और केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा बना। फिर अमेठी जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर राहुल गांधी को हराकर उन्होंने भारतीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। 2024 की चुनावी हार के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन समाप्त नहीं हुआ और 2026 में पार्टी संगठन में नई भूमिका के साथ उनकी राजनीतिक सक्रियता फिर चर्चा में है। स्मृति ईरानी की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें सिर्फ सफलता नहीं, बल्कि बदलाव की क्षमता भी है। तुलसी विरानी ने उन्हें लोकप्रिय बनाया, लेकिन राजनीति में लंबे समय तक टिके रहने के लिए स्मृति ईरानी को अपनी पहचान खुद गढ़नी पड़ी। पर्दे की तुलसी से लेकर राजनीति की स्मृति तक का यह सफर भारतीय सार्वजनिक जीवन की उन कहानियों में शामिल है, जहां एक पहचान दूसरी पहचान का अंत नहीं करती, बल्कि उसके लिए एक नया रास्ता खोलती है। Smriti Irani
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