पृथ्वी पर ग्रेविटी हड्डियों के घनत्व और मांसपेशियों की वृद्धि में अहम भूमिका निभाती है। वैज्ञानिकों की मानें, तो अंतरिक्ष में ग्रेविटी के अभाव में बच्चे की हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और मांसपेशियां सामान्य तरीके से विकसित नहीं हो पाएंगी। इसका असर बच्चे के शरीर के संरचना पर भी पड़ेगा।

Space Pregnancy: मानव जाति ने अंतरिक्ष अन्वेषण (स्पेस एक्सप्लोरेशन) के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की है। चंद्रमा से लेकर मंगल ग्रह तक, इंसान ने धरती के बाहर जीवन की तलाश में कई कदम आगे बढ़ाए हैं। लेकिन इन सभी उपलब्धियों के बीच एक ऐसा सवाल भी है, जो आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती और काफी हद तक सैद्धांतिक (थ्योरेटिकल) बना हुआ है—क्या अंतरिक्ष में प्रेग्नेंसी हो सकती है? अगर हां, तो मां के पेट में पल रहे बच्चे पर इसका क्या असर पड़ेगा?
वैज्ञानिकों का मानना है कि तकनीकी रूप से अंतरिक्ष में कंसीव (गर्भधारण) करना संभव है। इंसानी प्रजनन प्रणाली (रिप्रोडक्टिव सिस्टम) माइक्रोग्रैविटी (महत्वहीन गुरुत्वाकर्षण) में भी काम कर सकती है। लेकिन, इसके साथ ही कई गंभीर जैविक जोखिम (बायोलॉजिकल रिस्क) भी जुड़े हैं, जो इस प्रक्रिया को बेहद जटिल बनाते हैं।
सबसे बड़ी चिंता का विषय है 'जीरो ग्रैविटी' यानी शून्य गुरुत्वाकर्षण। पृथ्वी पर ग्रेविटी हड्डियों के घनत्व और मांसपेशियों की वृद्धि में अहम भूमिका निभाती है। वैज्ञानिकों की मानें, तो अंतरिक्ष में ग्रेविटी के अभाव में बच्चे की हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और मांसपेशियां सामान्य तरीके से विकसित नहीं हो पाएंगी। इसका असर बच्चे के शरीर के संरचना पर भी पड़ेगा। अनुमान लगाया जा रहा है कि ग्रेविटी के अभाव में बच्चे का ऊपरी हिस्सा काफी मजबूत हो सकता है, जबकि निचला हिस्सा—खासकर पैर—कमजोर रह सकते हैं।
माइक्रोग्रैविटी की वजह से शरीर का तरल पदार्थ (फ्लूइड) सिर की तरफ शिफ्ट हो जाता है। यही वजह है कि अंतरिक्ष में रहने वाले एस्ट्रोनॉट्स को अक्सर चेहरे पर सूजन और खोपड़ी में दबाव महसूस होता है। अगर यह स्थिति गर्भ में पल रहे बच्चे में हो, तो यह विकसित हो रही खोपड़ी के अंदर दबाव बढ़ा सकता है। इसका गंभीर असर बच्चे के ब्रेन डेवलपमेंट, आंखों की रोशनी और न्यूरोलॉजिकल विकास पर पड़ सकता है।
अंतरिक्ष कॉस्मिक रेडिएशन (ब्रह्मांडीय विकिरण) से भरा हुआ है। पृथ्वी का वायुमंडल हमें इससे बचाता है, लेकिन अंतरिक्ष में यह सुरक्षा कवच नहीं होता। एक बढ़ता हुआ भ्रूण (फीटस) इसके लिए खास तौर पर कमजोर होता है, क्योंकि इस दौरान उसकी कोशिकाएं (सेल्स) तेजी से विभाजित होती हैं। रेडिएशन से डीएनए को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे जेनेटिक म्यूटेशन (आनुवंशिक उत्परिवर्तन) का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, जन्म दोष, मिसकैरेज या समय से पहले जन्म का खतरा भी काफी बढ़ जाता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, स्पेस में बच्चे को जन्म देना मां और मेडिकल टीम दोनों के लिए ही बेहद मुश्किल होगा। ग्रेविटी के बिना शरीर के फ्लूइड को कंट्रोल करना और लेबर पेन के दौरान धक्का देना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण होगा। इसके अलावा, जन्म के बाद अंतरिक्ष में पला बच्चा यदि बाद में पृथ्वी आएगा, तो उसे यहां की ग्रेविटी के हिसाब से ढलने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। Space Pregnancy