International elderly day : 01 अक्टूबर : अन्तर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर विशेष : ऐसे तो रस्म अदायगी ही बनकर रह जाएगा ‘अन्तर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस’
In this way, the ritual payment will remain as 'International Old Age Day'
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 08:04 AM
- आरके चतुर्वेदी, आईपीएस (रिटायर्ड)
यद्यपि भारतवर्ष में वृद्धजनों का सम्मान करने, इनका ध्यान रखने, उनकी सेवा-सुरक्षा करने की परम्परा व चलन रहा है। वेदों में भी बुजुर्गों के सम्मान करने की राह दिखलाई गई है। यजुर्वेद का निम्न मंत्र इसी दिशा में संकेत करता है-
यदापि पोष मातरं पुत्रः प्रमुदिता ध्यान। इतने अनृणो भवाम्यहम पितरो याम्।
अर्थात जिन माता पिता ने अपने अथक प्रयत्नों से पाल पोसकर मुझे बड़ा किया है, अब मेरे बड़े होने पर जब ये अशक्त हो गए हैं, इस हेतु में उनकी सेवा सत्कार से संतुष्ट कर उन्हें ऋणों से मुक्त कर रहा। किन्तु, समाज के विकास, सोच के बदलाव व संयुक्त परिवारों के विघटन से यह परम्परायें अब लुप्तप्राय हैं और वृद्धजन समाज व अपनों से तिरस्कार, अपमान व उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं। यह बदलाव केवल भारतवर्ष ही नहीं, पूरे विश्व में दृष्टिगत हो रहा है।
International elderly day :
इस स्थिति को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की सामान्य सभा ने 14 दिसम्बर 1990 को प्रस्ताव पारित कर दिनांक 01 अक्टूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस’ घोषित किया, जो 1982 के वियना अन्तर्राष्ट्रीय योजना के प्राविधानों के अनुसार था। इस निर्णय के फलस्वरूप 01 अक्टूबर 1991 को प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाया गया। तब से लगातार प्रतिवर्ष 01 अक्टूबर को अन्तर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाया जाता है। इसमें प्रतिवर्ष एक थीम का चयन कर वर्ष पर्यन्त उस थीम के अन्तर्गत वृद्धजनों के कल्याण के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। वर्ष-2022 के लिए उक्त थीम 'The Resilience Contributions of Older Women' घोषित किया गया है। यह दिवस भारतवर्ष सहित पूरे विश्व में मनाया जाता है।
भारतवर्ष में भी समाज के उपेक्षित, निराश्रित व अशक्त वृद्धजनों के लिए इस प्रकार के विधिक प्राविधानों की आवश्यकता समझते हुए इस दिशा में प्रयत्न प्रारम्भ किए गए। वर्ष 1999 में ‘अन्तर्राष्ट्रीय वृद्धजन वर्ष’ का भी आयोजन हुआ, जो भारतवर्ष में भी मनाया गया। सामान्यतः यह आयोजन एक रस्म अदायगी मात्र था, किन्तु देश में वर्ष-1999 में राष्ट्रीय नीति की घोषणा की गई, जिसके अनुसार वृद्धों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए विधिक प्राविधानों की अपेक्षा की गई थी। सामान्यतः जैसा होता है, इन विधिक प्राविधानों के प्रबन्ध में आठ वर्ष लग गए और अन्ततः वर्ष 2007 में ही ‘मेन्टीनेन्स एण्ड वेलफेयर आफ पैरेन्ट्स एण्ड सीनियर सिटिजन एक्ट 2007’ संसद से पारित होकर कानून बन गया। इसमें वृद्धों को सम्मानजनक नाम देते हुए उन्हें वरिष्ठ नागरिक का नाम दिया गया तथा इन वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक भरण पोषण, निवास, चिकित्सा की पूरी जिम्मेदारी कानून परिजनों (पुत्र, पौत्र, पुत्री) की निर्धारित की गई। इस अधिनियम के अंतर्गत राज्य सरकारों की वृद्धजन नीति व कानून का अनुपालन सुनिश्चित कराने हेतु ट्रिब्यूनल बनाने का दायित्व दिया गया था, किन्तु दुखद पक्ष यह है कि उप्र सरकार को इस नीति को बनाने में 07 वर्ष लग गए और अंततः वर्ष 2014 में ‘उप्र माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण नियमावली 2014’ बन पाई। इसी के अगले चरण में शासनादेश दिनांक-14 मार्च 2016 द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य वरिष्ठ नागरिक नीति बनाई गई, जिसके निम्न उद्देश्य रखे गए-
1. उप्र के वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा की उचित व प्रभावी व्यवस्था।2. उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के देखभाल की उचित व प्रभावी व्यवस्था।3. उनकी आर्थिक सुरक्षा, आवासीय सुविधा, उनके कल्याण तथा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु यथावश्यक सहयोग की व्यवस्था।4. दुर्व्यवहार व शोषण से उनकी रक्षा की व्यवस्था।5. सक्रिय सृजनात्मक, उत्पादक व संतोषप्रद जीवन जीने का प्रबन्ध।6. उनके दीर्घकालीन अनुभवों का समाज के उत्थान में उपयोग करने का प्रबंध।7. उक्त सुविधायें ग्रामीण क्षेत्र के निवासी वरिष्ठजनों को भी उपलब्ध कराना।8. प्रदेश में आयु समन्वित समाज की अवधारणा को पुष्ट करना।9. उक्त हेतु बजट का प्राविधान।
इस नियमावली एवं नीति के अनुसार शासन द्वारा वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण हेतु विभिन्न प्राविधान किए गए हैं, जिनमें वृद्धजनों की व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधा हेतु उपकेन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, सीएचसी व जिला अस्पतालों में चिकित्सकीय परामर्श, परीक्षणों आदि हेतु अलग से लाइन, अलग रोगी सेवा केन्द्र का संचालन, निशुल्क परीक्षण का प्रबंन्ध, साथ ही केजीएमयू लखनऊ में वृद्धावस्था जनित रोगों के उपचार के लिए ‘सेन्टर फार एडवांस रिसर्च इन एजिंग एण्ड जिरियाट्रेक मेंटल हेल्थ’ के रूप में उच्चस्तरीय सुविधाओं से युक्त केन्द्र की स्थापना की गई है।
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इसके अलावा वृद्धावस्था पेंशन, मनरेगा में कम श्रमपरक कार्य उपलब्ध कराने, वृद्ध सहायता समूहों की स्थापना, अपराधों से सुरक्षा हेतु पुलिस की जिम्मेदारी हेल्पलाइन आदि बहुविभागीय योजनाओं का प्रबंध है।
इन नीतियों में वरिष्ठ नागरिकों की हर प्रकार की सुरक्षा, सुविधाओं की प्राप्ति में वरीयता उनकी देखभाल आदि के पूरे प्रबंध किए गए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। वृद्धजनों के लिए वृद्धाश्रम की व्यवस्था की गई है, किन्तु उनकी स्थापना ऐसे दूरस्थ स्थानों पर की गई है, जिनकी जानकारी ही लोगों को नहीं है। ये आश्रय भी लूट-खसोट का सरकारी अड्डा बन गए हैं, जहां के संचालकगण फर्जी संख्या प्रदर्शित कर अपनी जेबें भर रहे हैं और उन्हें देखने वाला कोई नहीं है।
वरिष्ठ नागरिक निधि 5 करोड़ रुपये की धनराशि से स्थापित की गई है। यह धनराशि उस निधि में उपलब्ध भी है, किन्तु उसमें आजतक कोई व्यय नहीं हैं, न इसकी कोई योजना बनी है। सरकार के स्तर से ‘वृद्धजन नियामक समिति’ ‘राज्य वरिष्ठ नागरिक नीति प्रकोष्ठ’ व ‘उप्र राज्य वरिष्ठ नागरिक कौंसिल’ का गठन किया जाना था, किन्तु 2016 के 6 वर्ष बाद नए समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण के हस्तक्षेप के बाद मुश्किल से उप्र राज्य वरिष्ठ नागरिक कौंसिल का गठन जून-2022 में हो पाया है।
कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि कानून, नियम, नियमावली आदि बन गए हैं, जिनमें प्रभावी प्राविधान भी किए गए हैं, किन्तु जमीनी स्तर पर 10 प्रतिशत अनुपालन भी नहीं हो रहा है। निर्देशों के अनुपालन के परीक्षण की कोई प्रभावी अनुश्रवण व्यवस्था भी नहीं है। सबसे बड़ी विडम्बना है कि जनसामान्य को इन प्राविधानों व कानून की जानकारी ही नहीं है। माता-पिता घर से निकाले जा रहे हैं और वे धक्के खा रहे हैं। वृद्धाश्रमों में शरण ले रहे हैं, लेकिन वे जानते ही नहीं कि उन्हें कानूनी अधिकार एवं संरक्षण प्राप्त है।
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इन परिस्थितियों ने सबसे ज्यादा आवश्यक है कि इन नियमों, प्राविधानों का व्यापक प्रचार प्रसार नियमित रूप से ग्रामीण क्षेत्रों तक किया जाए, ताकि वरिष्ठजन अपने अधिकारों व सुविधाओं के बारे में जानें और उसका दावा कर सकें। एक अधिकार प्राप्त केन्द्रीय नोडल एजेन्सी गठित की जाए, जो आकस्मिक निरीक्षणों प्रभावी अनुश्रवण व्यवस्था के माध्यम से इन योजनाओं से संबंधित सभी विभागों के कार्यों का नियमित पर्यवेक्षण करे तथा उन्हें सुनिश्चित कराए। जागरूकता के लिए विद्यालयों में कार्यक्रम कराए जायें, जहां आने वाली पीढ़ी के बच्चों को अपने घर के बुजुर्गों का आदर सम्मान व सेवा करने के लिए प्रेरित किया जा सके। वृद्धों की शिकायतों का त्वरित निस्तारण किया जाए।
कुल मिलाकर जब तक सामाजिक जागरूकता, वरिष्ठजनों को उनके अधिकारों से अवगत कराने, प्रदत्त सुविधाओं को सुचारू रूप से लाभार्थी तक पहुंचाने और इसका प्रभावी अनुश्रवण का प्रबंध करने की आवश्यकता है। इसके बिना 01 अक्टूबर ‘अन्तर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस’ एक रस्म अदायगी, फोटोग्राफी व जलपान तक ही सीमित रह जाएगी।
(इस आलेख के लेखक देश के प्रसिद्ध आईपीएस अधिकारी रहे हैं। इन दिनों उत्तर प्रदेश भर्ती बोर्ड के सदस्य हैं।)