Spiritual : ओ३म् ही परम सत्य आदि और अनंत है, आप भी जानिए
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भारत
RP Raghuvanshi
10 Oct 2022 08:47 PM
भारत
RP Raghuvanshi
10 Oct 2022 08:47 PM
Spiritual : हम अक्सर भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मूल आधार वेदों की बहुत चर्चा करते हैं। इस चर्चा में वेदों का सार तत्व ओइम भी निहित है। आज इस आलेख में हम ओइम के महत्व, उसके इतिहास व प्रभाव को जानेंगे।
ओ३म् शब्द निश्चित रूप से भारत में सबसे अधिक उच्चारित किया जाने वाला शब्द है, लेकिन विडम्बना यह है कि समाज में इस शब्द के अर्थ और प्रभाव के विषय में बहुत कम चर्चा होती है।
Spiritual :
ओ३म् शब्द तीन अक्षरों ओ, उ और म की सन्धि से बना है, यह ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ नाम है, क्योंकि यह ईश्वर के मुख्य गुणों को बताता है, अन्य शब्दों में कहें तो यह ईश्वर का पूर्ण परिचय देता है।
ईश्वर के केवल तीन काम है। पहला सृष्टि की उत्पत्ति अर्थात् उसका प्रारम्भ करना, दूसरा उसका लालन-पालन अर्थात् उसे चलाना जो अब हो रहा है, तीसरा काम है सृष्टि को समाप्त करना, जिसे प्रलय कहते हैं।
ओ३म् में जो पहला अक्षर अ है, वह सृष्टि का प्रारम्भ बताता है, क्योंकि अ को बोलने के लिए बन्द होंठ खोलने पड़ते हैं, इसका उच्चारण एक क्षण से भी कम समय में हो जाता है। हम सभी जानते हैं कि पदार्थ (MASS) कभी नष्ट नहीं होता, उसे ऊर्जा में परिवर्तित कर सकते हैं, इसी प्रकार ऊर्जा को पदार्थ में परिवर्तित किया जा सकता है। परमाणु ऊर्जा इसी सिद्धान्त पर आधारित है। यह परिवर्तन की क्रिया एक क्षण से भी बहुत छोटे भाग में पूर्ण हो जाती है। अ अक्षर का उच्चारण इसी का द्योतक है।
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ओ३म् के उच्चारण में होठ खुले रहते हैं और इसमें एक निरन्तरता होती है, इस प्रकार ओ३म् सृष्टि के चलने की क्रिया को दर्शता है जैसा कि वर्तमान में संसार चल रहा है। इसकी अवधि लाखों करोड़ों वर्षों की होती है और ओ३म् अक्षर इसी का द्योतक है।
ओ३म् शब्द में जब म बोलते हैं तो होंठ स्वतः ही बन्द हो जाते हैं अर्थात् म अक्षर सृष्टि की समाप्ति, जिसे प्रलय भी कहते हैं का द्योतक है।
ओ३म् का उच्चारण ईश्वर से सीधा संवाद है। इसके उच्चारण में जीभ का प्रयोग नहीं होता, इसका उच्चारण कण्ठ द्वारा हृदय की गहराई से किया जाता है। महर्षि दयानन्द जी द्वारा आर्य समाज के दूसरे नियम में ईश्वर के गुण व स्वरूप को बताया गया है। जैसा कि वह सच्चिदानन्द स्वरूप, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, पवित्र, आदि-आदि अर्थात् ये सभी दिव्य गुण हैं और मनुष्य भी अपने जीवन में इन्हीं गुणों को यथासंभव पाने की इच्छा रखता है। जब हम किसी का नाम पुकारते हैं तो उसके गुणों का भाव तुरन्त हमारे मन में आ जाता है। लोकाचार में भी हम देखते हैं कि जब भी किसी से संवाद स्थापित करना होता है तो सबसे पहले हम उसके नाम का संबोधन करते हैं। इस आधार पर मेरी निश्चित मान्यता है कि ईश्वर की उपासना करने का सबसे आसान व प्रभावी तरीका ओ३म् शब्द का उच्चारण है।
जीभ का प्रयोग एक व्यक्ति द्वारा दूसरे से संवाद के लिए किया जाता है, बिना जीभ के एक-दूसरे से संवाद संभव नहीं है। इसका भी तात्पर्य यही है कि ईश्वर से संवाद स्थापित करने के लिए ओ३म् के अतिरिक्त कोई अन्य शब्द नहीं है।
ओ३म् के उच्चारण से शरीर में एक झंकार पैदा होती है, जो मन को गहरी शान्ति व ऊर्जा प्रदान करती है।
उल्लेखनीय है कि संसार की किसी भी भाषा में ईश्वर के लिए ओ३म् से उपयुक्त व पूर्ण अन्य कोई शब्द नहीं है। उदाहरणार्थ, ईश्वर, भगवान, राम, कृष्ण, शंकर आदि-आदि व अल्लाह, खुदा व (GOD ) जैसे ईश्वर के जितने भी पर्यायवाची शब्द हैं, उन सभी का उच्चारण बिना जीभ के प्रयोग के नहीं हो सकता और न ही कोई अन्य शब्द ईश्वर के सारे गुणों का बोध कराता है।
अपने-अपने सम्प्रदायों के पूर्वाग्रहों व अज्ञानता के कारण भारतवर्ष में भी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो ओ३म् शब्द के सार्वजनिक उच्चारण का विरोध करते हैं तथा इसे किसी एक धर्म व सम्प्रदाय से सम्बन्धित शब्द मानते हैं, जबकि वास्तव में ओ३म् शब्द मानव मात्र के लिए है, इसका विरोध मात्र नादानी और साम्प्रदायिक संकीर्णता है।
प्रतिदिन कुछ समय शान्ति से आँखें बन्द करके इस शब्द का गहरे साँस के साथ उच्चारण करें और स्वयं इसकी शक्ति का अनुभव करें।