OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने के लिए क्या माता-पिता की सैलरी और कृषि से होने वाली आय ही पर्याप्त आधार हो सकती है ? आखिर OBC नॉन-क्रीमी लेयर का दर्जा तय करने के लिए किन नियमों और मानकों को ध्यान में रखना जरूरी है ?
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National News : अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने के मानकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम कानूनी व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता की सैलरी या कृषि से होने वाली आय को अकेले आधार बनाकर किसी अभ्यर्थी को क्रीमी लेयर में शामिल नहीं किया जा सकता। क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय माता-पिता के पद, उनकी सेवा-श्रेणी और निर्धारित नियमों को भी ध्यान में रखना होगा। इस फैसले का असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है, जिन्हें माता-पिता की आय के आधार पर OBC नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ देने से वंचित कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले में यह व्यवस्था दी थी। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए कहा था कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने 1993 के कार्यालय ज्ञापन और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि वेतन और कृषि आय को आय-संपत्ति परीक्षण में दूसरी आय के साथ जोड़कर मनमाने ढंग से क्रीमी लेयर तय नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, OBC अभ्यर्थी की क्रीमी लेयर स्थिति तय करने के लिए केवल माता-पिता की कुल आय देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उनके पद और सेवा की श्रेणी जैसे पहलुओं पर भी विचार करना जरूरी है। अदालत ने कहा कि 8 सितंबर 1993 के कार्यालय ज्ञापन में निर्धारित व्यवस्था को नजरअंदाज करके केवल वेतन के आधार पर अभ्यर्थियों को आरक्षण से बाहर करना उचित नहीं है। यह मामला खास तौर पर उन अभ्यर्थियों से जुड़ा था, जिनके माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU), बैंकों और निजी संस्थानों में कार्यरत थे। उनकी सैलरी निर्धारित सीमा से अधिक होने के आधार पर उन्हें क्रीमी लेयर में रख दिया गया था, जबकि संबंधित पदों की सरकारी सेवाओं के पदों से समकक्षता का निर्धारण नहीं हुआ था।
विवाद उन OBC अभ्यर्थियों से जुड़ा था, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास की थी, लेकिन माता-पिता की सैलरी को क्रीमी लेयर का आधार बनाए जाने के कारण उन्हें OBC नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ नहीं मिला। इसके चलते उनकी आरक्षित श्रेणी के तहत सेवा आवंटन की मांग प्रभावित हुई। कुछ अभ्यर्थियों ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और अलग-अलग हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी थी। मद्रास, दिल्ली और केरल हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद केंद्र सरकार ने इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। शीर्ष अदालत ने केंद्र की अपील खारिज करते हुए संबंधित अभ्यर्थियों के दावों पर निर्धारित नियमों के अनुसार दोबारा विचार करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि 2004 का स्पष्टीकरण पत्र 1993 के मूल कार्यालय ज्ञापन की व्यवस्था को बदल नहीं सकता। अदालत के मुताबिक, वेतन और कृषि आय को आय-संपत्ति परीक्षण के तहत दूसरी आय के साथ जोड़कर क्रीमी लेयर का निर्धारण नहीं किया जाना चाहिए। माता-पिता का पद और उनकी सेवा-श्रेणी भी महत्वपूर्ण आधार हैं।
11 मार्च के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने इसके लागू होने के तरीके और पुराने चयन व नियुक्तियों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। सरकार की चिंता थी कि फैसले को पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों और सेवा आवंटन पर लागू करने से वरिष्ठता, कैडर और सेवा संबंधी मामलों में जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अर्जी पर सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था।
इस फैसले से उन OBC अभ्यर्थियों को राहत मिलने की संभावना है, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास की थी, लेकिन माता-पिता की सैलरी के आधार पर उन्हें क्रीमी लेयर में रखकर आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया। अदालत ने संबंधित उम्मीदवारों और मामले में हस्तक्षेप करने वाले अभ्यर्थियों के दावों पर अपने फैसले में तय सिद्धांतों के अनुसार विचार करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि पात्र अभ्यर्थियों को समायोजित करने के लिए जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त यानी सुपरन्यूमेरेरी पद बनाए जा सकते हैं। हालांकि, राहत उन्हीं अभ्यर्थियों को मिलेगी जो निर्धारित नियमों और अन्य जरूरी पात्रता शर्तों को पूरा करेंगे।
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