बिहार वोटर लिस्ट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, EC से मांगा जवाब
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 09:53 PM
Supreme Court : बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को राहत तो दी, लेकिन उसकी मंशा और प्रक्रिया पर गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा, "गैर-नागरिकों को सूची से बाहर करना गलत नहीं, लेकिन चुनाव से कुछ ही महीने पहले ऐसा कदम उठाना संदेह को जन्म देता है।"
दायर की गई 10 से ज्यादा याचिकाएं
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने दी। अदालत में इस मामले को लेकर 10 से ज्यादा याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें प्रमुख याचिकाकर्ता एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) है। कई राजनीतिक दलों और सांसदों जैसे मनोज झा (RJD), महुआ मोइत्रा (TMC), केसी वेणुगोपाल (कांग्रेस), सुप्रिया सुले (NCP) और अन्य ने मिलकर चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी है।
क्या है मुद्दा?
बिहार में चुनाव आयोग ने जून 2025 में SIR का आदेश जारी किया जिसके तहत लगभग 7.9 करोड़ मतदाताओं की जांच की जानी है। आरोप है कि इस प्रक्रिया में आधार कार्ड और वोटर ID जैसे मान्य दस्तावेजों को नजरअंदाज किया जा रहा है और सामान्य नागरिकों से भी कई अप्राप्य प्रमाण मांगे जा रहे हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि "अगर एक व्यक्ति 20 साल से वोट डाल रहा है, तो अब उससे नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज क्यों मांगे जा रहे हैं?" सिब्बल ने सवाल किया, "क्या B.L.O. जैसे कनिष्ठ कर्मचारी को यह अधिकार दिया जा सकता है कि वह तय करे कि कौन नागरिक है और कौन नहीं?"
पूरा देश भाग रहा है आधार के पीछे
सुनवाई में आधार कार्ड को लेकर भी गहन बहस हुई। कोर्ट ने पूछा कि जब देशभर में हर सरकारी योजना में आधार मान्य है तो चुनाव आयोग इसे पहचान का प्रमाण क्यों नहीं मान रहा? जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के बाद आधार को प्रमाण माना गया है, ऐसे में इसे इस प्रक्रिया से बाहर करना “कानून की आत्मा के खिलाफ” हो सकता है।
मतदाता सूची की शुद्धता बेहद जरूरी
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि मतदाता सूची की शुद्धता बेहद जरूरी है और यह प्रक्रिया किसी को बाहर करने के इरादे से नहीं, बल्कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए की जा रही है लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव से कुछ महीने पहले इस तरह की गहन प्रक्रिया लागू करना “गंभीर संदेह और अविश्वास की स्थिति पैदा करता है।” जस्टिस धूलिया ने तीखा सवाल पूछा, “20 साल से वोट डाल रहे लोगों से अचानक दस्तावेज क्यों मांगे जा रहे हैं? क्या यह सिर्फ नागरिकता तय करने की प्रक्रिया है या मतदाता अधिकार को सीमित करने की कोशिश?”
प्रक्रिया पर लग सकता है ब्रेक
द्विवेदी ने कहा कि, जरूरत पड़ी तो इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिका दायर करने वाले अधिकतर याचिकाकर्ता बिहार के वोटर नहीं हैं। इस पर कोर्ट ने संकेत दिए कि अगर प्रक्रिया मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित करती है, तो चुनाव आयोग को न्यायिक समीक्षा का सामना करना पड़ सकता है।