सुप्रीम कोर्ट में Transgender Act 2026 पर नई याचिका की सुनवाई हुई। महिला संगठन ने आरक्षण, खेल और कानूनी संरक्षण पर सवाल उठाए। जानिए अदालत और केंद्र सरकार ने क्या कहा।

National News : ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों और महिलाओं के लिए निर्धारित कानूनी संरक्षण के बीच संतुलन का सवाल अब सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका के जरिए उठा है। Women’s Declaration International India नामक संगठन ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 के कुछ प्रावधानों के प्रभाव पर सवाल उठाए हैं। संगठन का तर्क है कि महिलाओं के लिए निर्धारित आरक्षण, खेल प्रतियोगिताओं, जेल व्यवस्था और अन्य कानूनी सुरक्षा उपायों पर इसके संभावित प्रभाव को स्पष्ट किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 28 अक्टूबर को मामले पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा। अदालत की टिप्पणियों और सरकार के रुख से इस संवेदनशील कानूनी बहस के कई अहम पहलू सामने आए हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने महिला संगठन की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में 2026 के संशोधन कानून के उन संभावित प्रभावों पर चिंता जताई गई है, जो याचिकाकर्ता के अनुसार महिलाओं के लिए निर्धारित संवैधानिक और वैधानिक लाभों से जुड़े हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने संकेत दिया कि इस याचिका में उठाया गया दृष्टिकोण पहले से लंबित मामलों से अलग है। अदालत ने केंद्र सरकार को याचिका पर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया और मामले को इसी कानून को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ दिया। सुनवाई में जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने याचिकाकर्ता के पक्ष को संबोधित करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता मामले का एक अलग पहलू सामने रख रहा है। संबंधित मुद्दा पहले से अदालत के विचाराधीन है, लेकिन याचिकाकर्ता का दृष्टिकोण अलग है। अदालत ने मामले के गुण-दोष पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। National News
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याचिका दायर करने वाले संगठन Women’s Declaration International India ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट में 2026 के संशोधन और उससे जुड़े नियमों के प्रभाव पर सवाल उठाए हैं। संगठन का तर्क है कि लैंगिक पहचान को कानूनी मान्यता देने के सवाल और उन अधिकारों के दायरे में अंतर किया जाना चाहिए, जो कुछ कानूनों के तहत महिलाओं के लिए विशेष रूप से निर्धारित हैं। याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया है कि उसका दावा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के पहचान के अधिकार को चुनौती देना नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए निर्धारित लाभों और संरक्षण के दायरे को स्पष्ट कराना है। यह याचिकाकर्ता का पक्ष है। National News
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याचिका में कई ऐसे क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है, जहां कानून के अलग-अलग प्रावधानों के बीच स्पष्टता की मांग की गई है:
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि असली सवाल यह है कि किसी व्यक्ति की पहचान पुरुष या महिला के रूप में कैसे निर्धारित की जाए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई जैविक पुरुष, जिसमें पुरुषों के सभी शारीरिक गुण मौजूद हैं, खुद को महिला बताकर स्पोर्ट्स इवेंट में हिस्सा लेने का अधिकार मांगता है, तो इससे महिलाओं की खेल प्रतियोगिताओं में निष्पक्षता का सवाल उठता है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ अदालतों ने ऐसे मामलों में आदेश दिए हैं, जिनके तहत संबंधित व्यक्ति को महिला खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति मिली।
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याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कई पुराने अदालती फैसलों और प्रशासनिक आदेशों का उल्लेख किया है। अंजलि गुरु संजना जान बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने जन्म के समय पुरुष माने गए, लेकिन स्वयं को महिला मानने वाले व्यक्ति को महिलाओं के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से पंचायत चुनाव लड़ने की अनुमति दी थी। वहीं, नवंबर 2025 में केरल राज्य चुनाव आयोग ने अमया प्रसाद और अरुणिमा एम. कुरुप को महिलाओं के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने की अनुमति दी थी। याचिका में हिना हनीफा बनाम केरल राज्य मामले का भी हवाला दिया गया है, जिसमें ट्रांसजेंडर महिला को NCC के गर्ल्स डिवीजन में भर्ती होने की अनुमति मिली थी। इसके अलावा, अनामिका बनाम केरल राज्य मामले में महिला वर्ग की जिला स्तरीय जूडो चैंपियनशिप में भाग लेने की अनुमति और नर्सिंग असिस्टेंट की सरकारी नियुक्ति से जुड़े फैसले का भी उल्लेख है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन फैसलों के प्रभाव को महिला आरक्षण, खेलों में पात्रता और प्रतिस्पर्धात्मक निष्पक्षता के संदर्भ में समझना जरूरी है। याचिका में महिला हॉस्टल और जेलों में प्रवेश, महिला मरीजों की निजता तथा महिलाओं के लिए निर्धारित सुविधाओं की सुरक्षा से जुड़े सवाल भी उठाए गए हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट के 2014 के NALSA बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले का हवाला देते हुए जेंडर पहचान और सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन के अधिकारों का उल्लेख किया गया है।
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3), 16, 19(1)(a) और 21 का भी जिक्र किया है। यह याचिका SS शॉफ एंड AOR के माध्यम से दाखिल की गई है। ये सभी याचिकाकर्ता के तर्क हैं, इन्हें सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा मामले में अंतिम निर्णय नहीं माना जाना चाहिए।
ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 ने 2019 के कानून में बदलाव किए हैं। इन संशोधनों को लेकर अलग-अलग पक्षों से न्यायिक चुनौती दी गई है। एक ओर, संशोधन का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं ने लैंगिक पहचान, आत्म-पहचान के अधिकार और निजता से जुड़े सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, Women’s Declaration International India की याचिका महिलाओं के लिए निर्धारित संवैधानिक और वैधानिक संरक्षण के दायरे पर केंद्रित है। इन याचिकाओं में उठाए गए तर्क एक-दूसरे से अलग हैं। अदालत को कानून की संवैधानिक वैधता और संबंधित अधिकारों के प्रश्नों पर सुनवाई के बाद निर्णय लेना होगा।
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