किसानों के बीच मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए चूने (लाइम) का उपयोग तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि अम्लीय मिट्टी को संतुलित करने और फसलों की पैदावार बढ़ाने में चूना एक प्रभावी और किफायती उपाय साबित हो रहा है।

बता दे कि विशेषज्ञों के अनुसार, जिन क्षेत्रों में मिट्टी का pH 6 से कम होता है, वहां फसलों की जड़ों को पोषक तत्व उपलब्ध नहीं हो पाते। ऐसे में प्रति हेक्टेयर 200–500 किलोग्राम चूना डालने से मिट्टी का pH 6.5–7.5 तक पहुंच जाता है, जो खेती के लिए आदर्श माना जाता है।
चूना मिट्टी के कणों को जोड़कर उसे भुरभुरा बनाता है, जिससे जल निकासी और जड़ों का विकास बेहतर होता है। साथ ही यह कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे आवश्यक तत्व भी प्रदान करता है, जो पौधों की बढ़वार और क्लोरोफिल निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि चूना उपयोग करने से मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है, जिससे जैविक उर्वरता में सुधार होता है।
कई किसान संगठनों का दावा है कि चूने का नियमित और वैज्ञानिक उपयोग फसलों की पैदावार में 15 से 25 प्रतिशत तक की वृद्धि ला रहा है। इसके साथ ही नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे उर्वरकों की प्रभावशीलता भी बढ़ जाती है, जिससे खाद पर होने वाला खर्च कम होता है।
गेहूं, धान, मक्का, बाजरा, चना, मूंग, उड़द, मसूर, टमाटर, आलू, प्याज, अंगूर, खट्टे फल, सेब, गन्ना, अदरक और हल्दी जैसी फसलों में चूने का उपयोग बेहद लाभकारी साबित हो रहा है।
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को चूना डालने से पहले मिट्टी का परीक्षण कराने की सलाह दी है। उनका कहना है कि चूना बुवाई से 1–2 महीने पहले खेत में डालना चाहिए ताकि इसका पूरा असर मिल सके। कुल मिलाकर, चूने का उपयोग खेती को अधिक टिकाऊ, किफायती और उत्पादक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसके प्रति किसानों की जागरूकता भी तेजी से बढ़ रही है।