यह गांव 'होली' से है कोसों दूर! देवी के आदेश पर 100 साल से नहीं बजी रंगों की गूंज
खजुरपदर गांव की यह अनोखी परंपरा सिर्फ एक रिवाज़ नहीं, बल्कि एक जीवंत आस्था है, जिसके पीछे एक भयावह इतिहास है। ग्रामीणों का मानना है कि करीब 100 साल पहले यहां होली खेली जाती थी।

Chhattisgarh Holi 100 year old story : जब पूरा देश रंगों की बौछारों, गुलाल और होलिका दहन के साथ होली के त्योहार को धूमधाम से मनाता है, तब छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का एक गांव इस उल्लास से साइकिल स्टैंड पर खड़ी गाड़ी की तरह सन्नाटे में रहता है। यहां होली नहीं एक त्योहार, बल्कि एक 'वर्जित गतिविधि' है। हम बात कर रहे हैं मैनपुर तहसील से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित खजुरपदर गांव की, जहां पिछले एक सदी से अधिक समय से देवियों के आदेश पर होली का त्योहार नहीं मनाया जाता है।
100 साल पुरानी 'आस्था' और दैवीय प्रकोप की कहानी
खजुरपदर गांव की यह अनोखी परंपरा सिर्फ एक रिवाज़ नहीं, बल्कि एक जीवंत आस्था है, जिसके पीछे एक भयावह इतिहास है। ग्रामीणों का मानना है कि करीब 100 साल पहले यहां होली खेली जाती थी। लेकिन एक बार जब गांव ने रंग-गुलाल का त्योहार मनाया, तो ग्राम देवी 'शानपाठ देवी' और 'श्रीमाटी देवता' को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया।
देवियों के कोप से गांव में तबाही मच गई। अचानक से चेचक (Smallpox) और उल्टी-दस्त जैसी महामारी फैल गई, जिससे गांव तबाह होने के कगार पर पहुंच गया। तब गांव के पूर्वजों ने देवी माता से माफी मांगी, विशेष पूजा-अर्चना और व्रत रखे। कहा जाता है कि देवी प्रसन्न हुईं और बीमारी गायब हो गई। उसी दिन से गांव ने एक सामूहिक फैसला लिया—'अब कभी होली नहीं खेलेंगे।'
होली के दिन कैसा रहता है गांव?
होली के दिन जब बाकी दुनिया 'होली है...' के नारे लगाती है, तब खजुरपदर गांव की दिनचर्या बिल्कुल सामान्य दिनों जैसी रहती है।
- न तो यहां होलिका दहन होता है, न ही बच्चे पिचकारी लेकर निकलते हैं।
- गांव के 2,000 की आबादी वाले लोग अपने-अपने घरों में रहते हैं।
- पूरा दिन शानपाठ देवी और अन्य देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना और प्रार्थना में बीतता है।
- गांव के लोग इस दिन परिवार और गांव की सुख-शांति के लिए दुआ मांगते हैं और रंग-गुलाल से पूरी तरह परहेज करते हैं।
बाहरी लोगों को भी करना पड़ता है पालन
यह परंपरा इतनी मजबूत है कि आसपास के गांवों के लोग भी इसे जानते हैं और मानते हैं। होली के दिन अगर कोई बाहरी व्यक्ति गांव से गुजरता है, तो वह चुपचाप निकल जाता है। किसी की हिम्मत नहीं होती कि वह यहां रंग लगाने की कोशिश करे।
करीब 15-20 साल पहले एक बार पड़ोसी गांव के कुछ लोगों ने इस नियम को तोड़ने की कोशिश की थी और रंग खेला दिया था। ग्रामीणों का दावा है कि इसके तुरंत बाद फिर से चेचक जैसी बीमारी का प्रकोप दिखा, जो देवी की पूजा के बाद ही शांत हो सका। इस घटना ने गांव वालों के विश्वास को और पक्का कर दिया।
क्या कहते हैं गांव के प्रतिनिधि?
इस रहस्यमयी परंपरा को लेकर जनपद सदस्य जयसिंह नागेश और सरपंच कुमारी बाई नागेश ने पुष्टि की कि यह परंपरा बुजुर्गों से सुनी हुई सच्चाई है और देवी का आदेश सर्वोपरि है। वहीं, पूर्व सरपंच येपेश्वर नागेश ने बताया कि आसपास के गांव भी इस नियम का सम्मान करते हैं। ग्रामीण धरम सिंह और पूरन प्रताप ने कहा, "अगर देवी चाहती हैं कि होली न खेली जाए, तो यही हमारे लिए सर्वोत्तम है। गांव की खुशहाली सबसे जरूरी है।" Chhattisgarh Holi 100 year old story
Chhattisgarh Holi 100 year old story : जब पूरा देश रंगों की बौछारों, गुलाल और होलिका दहन के साथ होली के त्योहार को धूमधाम से मनाता है, तब छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का एक गांव इस उल्लास से साइकिल स्टैंड पर खड़ी गाड़ी की तरह सन्नाटे में रहता है। यहां होली नहीं एक त्योहार, बल्कि एक 'वर्जित गतिविधि' है। हम बात कर रहे हैं मैनपुर तहसील से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित खजुरपदर गांव की, जहां पिछले एक सदी से अधिक समय से देवियों के आदेश पर होली का त्योहार नहीं मनाया जाता है।
100 साल पुरानी 'आस्था' और दैवीय प्रकोप की कहानी
खजुरपदर गांव की यह अनोखी परंपरा सिर्फ एक रिवाज़ नहीं, बल्कि एक जीवंत आस्था है, जिसके पीछे एक भयावह इतिहास है। ग्रामीणों का मानना है कि करीब 100 साल पहले यहां होली खेली जाती थी। लेकिन एक बार जब गांव ने रंग-गुलाल का त्योहार मनाया, तो ग्राम देवी 'शानपाठ देवी' और 'श्रीमाटी देवता' को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया।
देवियों के कोप से गांव में तबाही मच गई। अचानक से चेचक (Smallpox) और उल्टी-दस्त जैसी महामारी फैल गई, जिससे गांव तबाह होने के कगार पर पहुंच गया। तब गांव के पूर्वजों ने देवी माता से माफी मांगी, विशेष पूजा-अर्चना और व्रत रखे। कहा जाता है कि देवी प्रसन्न हुईं और बीमारी गायब हो गई। उसी दिन से गांव ने एक सामूहिक फैसला लिया—'अब कभी होली नहीं खेलेंगे।'
होली के दिन कैसा रहता है गांव?
होली के दिन जब बाकी दुनिया 'होली है...' के नारे लगाती है, तब खजुरपदर गांव की दिनचर्या बिल्कुल सामान्य दिनों जैसी रहती है।
- न तो यहां होलिका दहन होता है, न ही बच्चे पिचकारी लेकर निकलते हैं।
- गांव के 2,000 की आबादी वाले लोग अपने-अपने घरों में रहते हैं।
- पूरा दिन शानपाठ देवी और अन्य देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना और प्रार्थना में बीतता है।
- गांव के लोग इस दिन परिवार और गांव की सुख-शांति के लिए दुआ मांगते हैं और रंग-गुलाल से पूरी तरह परहेज करते हैं।
बाहरी लोगों को भी करना पड़ता है पालन
यह परंपरा इतनी मजबूत है कि आसपास के गांवों के लोग भी इसे जानते हैं और मानते हैं। होली के दिन अगर कोई बाहरी व्यक्ति गांव से गुजरता है, तो वह चुपचाप निकल जाता है। किसी की हिम्मत नहीं होती कि वह यहां रंग लगाने की कोशिश करे।
करीब 15-20 साल पहले एक बार पड़ोसी गांव के कुछ लोगों ने इस नियम को तोड़ने की कोशिश की थी और रंग खेला दिया था। ग्रामीणों का दावा है कि इसके तुरंत बाद फिर से चेचक जैसी बीमारी का प्रकोप दिखा, जो देवी की पूजा के बाद ही शांत हो सका। इस घटना ने गांव वालों के विश्वास को और पक्का कर दिया।
क्या कहते हैं गांव के प्रतिनिधि?
इस रहस्यमयी परंपरा को लेकर जनपद सदस्य जयसिंह नागेश और सरपंच कुमारी बाई नागेश ने पुष्टि की कि यह परंपरा बुजुर्गों से सुनी हुई सच्चाई है और देवी का आदेश सर्वोपरि है। वहीं, पूर्व सरपंच येपेश्वर नागेश ने बताया कि आसपास के गांव भी इस नियम का सम्मान करते हैं। ग्रामीण धरम सिंह और पूरन प्रताप ने कहा, "अगर देवी चाहती हैं कि होली न खेली जाए, तो यही हमारे लिए सर्वोत्तम है। गांव की खुशहाली सबसे जरूरी है।" Chhattisgarh Holi 100 year old story












