बिहार में कांग्रेस का पतन: 1985 की सत्ता से 2020 की हाशिए तक की कहानी
Bihar
भारत
चेतना मंच
27 May 2025 08:54 PM
Bihar : उत्तर भारत के कई राज्यों में कांग्रेस पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर रही है। बिहार भी इन्हीं राज्यों में शामिल है, जहां कांग्रेस आखिरी बार 1985 में अपने बलबूते पर सरकार बना पाई थी। उस समय बिहार और झारखंड एक ही राज्य हुआ करते थे और विधानसभा की कुल 324 सीटें थीं। 1985 के चुनाव में कांग्रेस ने 196 सीटों पर जीत हासिल की थी और सरकार बनाई थी। हालांकि, 1985 से 1990 के बीच कांग्रेस को तीन बार मुख्यमंत्री बदलने पड़े, जिससे उसकी स्थिरता पर सवाल उठे। अब बिहार मे कांग्रेश हाशिए पर है ।
1990 में कांग्रेस बिहार की सत्ता से हुई बाहर
बिहार की राजनीति में वर्ष 1990 में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला था जब कांग्रेस पार्टी लंबे समय के बाद राज्य की सत्ता से बाहर हो गई। यह परिवर्तन केवल एक चुनावी हारने की बजे से नही थी बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर गहरे बदलावों का परिणाम था। 1980 और 90 के दशक में कांग्रेस के खिलाफ जन असंतोष लगातार बढ़ रहा था। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों पर कांग्रेस की नीतियों की आलोचना होने लगी थी। इसी दौरान जनता दल एक नए राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरा, जिसने सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों को सत्ता में भागीदारी का वादा किया।
1990 के विधानसभा चुनाव में जनता दल ने जबरदस्त सफलता प्राप्त की और लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में सरकार बनाई गई। लालू प्रसाद यादव पिछड़े वर्गों के एक मजबूत नेता के रूप में सामने आए और उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों को लेकर जनता के बीच एक मजबूत समर्थन हासिल किया। इस सामाजिक समीकरण ने कांग्रेस की पारंपरिक राजनीति को झटका दिया। जनता दल की इस जीत ने बिहार में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत की और कांग्रेस को राज्य की सत्ता से बाहर कर दिया गया। यह बदलाव आने वाले दशकों की राजनीति को भी गहराई से प्रभावित करने वाला साबित हुआ।
1995 में जनता दल की शानदार जीत और कांग्रेस की करारी हार
1995 में बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल को एक बार फिर शानदार जीत मिली, जबकि कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। यह चुनाव राजनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने बिहार की राजनीति की दिशा को पूरी तरह बदल दिया। मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद लालू यादव सामाजिक न्याय के प्रतीक बन गए। 1995 के चुनाव में उन्होंने "सामाजिक न्याय" और "गरीब-पिछड़े के हक की लड़ाई" को मुख्य मुद्दा बनाया ।
दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी लंबे समय से सत्ता में रहते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई थी। भ्रष्टाचार, जातिवाद और जनता से जुड़ाव की कमी जैसे कारणों से उसकी लोकप्रियता घट गई। कांग्रेस नेतृत्व राज्य स्तर पर कमजोर था और वह कोई करिश्माई नेता नहीं पेश कर सकी जो लालू यादव की बराबरी कर सके।
इस चुनाव में जनता दल को 167 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस महज 29 सीटों पर सिमट गई। यह परिणाम साफ तौर पर दिखाता है कि जनता ने सामाजिक न्याय, पिछड़ों के अधिकार और बदलाव की राजनीति को समर्थन दिया, जबकि पुराने ढर्रे की राजनीति को नकार दिया। इस तरह 1995 का चुनाव न सिर्फ जनता दल की जीत और कांग्रेस की हार का प्रतीक था, बल्कि यह बिहार में नई सामाजिक-राजनीतिक धारा की शुरुआत भी हुई थी ।
2000 के चुनाव में कांग्रेस की सीटों की संख्या और गिरी
वर्ष 2000 में विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस की सीटों की संख्या गिरकर 23 पर आ गई। यानी कांग्रेस का ग्राफ बिहार में पहले की अपेक्षा और कमजोर हो चुका था। इस बार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने लेकिन महज 7 दिन के लिए। 7 दिन बाद फिर से गठबंधन में दरार पड़ती है और राबड़ी देवी एक बार फिर से बिहार की मुख्यमंत्री बन जाती हैं। यह सरकार करीब 5 साल तक चल जाती है। हालांकि 2005 का विधानसभा चुनाव कई मायनों में अलग हो गया था। अलग राजनीतिक समीकरण तो बन ही गए थे और सीटों की संख्या भी कम हो गई थी, क्योंकि झारखंड अलग राज्य बन चुका था। 2005 विधानसभा चुनाव में बिहार में कुल 243 सीटें हो गई थी।
1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की स्थिति काफी कमजोर रही। पार्टी को केवल 114 सीटें मिलीं, जबकि पिछले चुनाव (1998) में उसे 141 सीटें मिली थीं। यानी उसकी 27 सीटें कम हो गईं। यह कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका था क्योंकि यह लगातार तीसरा चुनाव था जिसमें वह सत्ता से बाहर रही। इस गिरावट की बड़ी वजह पार्टी का कमजोर नेतृत्व था। सोनिया गांधी उस समय कांग्रेस की नई नेता थीं और लोगों को उनके अनुभव और नेतृत्व पर संदेह था। कांग्रेस पार्टी के अंदर आपसी मतभेद भी थे और वह जनता से जुड़ने में असफल रही। इन सब कारणों से कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई और उसे भारी नुकसान झेलना पड़ा।
2005 में आरजेडी का सफाया
2005 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी और कांग्रेस की करारी हार होती नजर आयी है। नीतीश कुमार की जेडीयू 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनती है जबकि भाजपा की 55 सीटें आती हैं। दोनों मिलकर सरकार बनाते हैं। कांग्रेस ने इस चुनाव में आरजेडी के साथ गठबंधन में 51 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे महज 9 सीटों पर जीत मिली थी।
बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को भारी झटका लगा। लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में करीब 15 वर्षों तक सत्ता में रही आरजेडी को जनता ने नकार दिया। इस चुनाव में भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था की खराब स्थिति और जंगलराज जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। जनता ने बदलाव की मांग करते हुए जनता दल और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन को समर्थन दिया। फरवरी 2005 में हुए चुनाव में कोई स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, जिसके कारण राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। इसके बाद अक्टूबर 2005 में दोबारा चुनाव कराए गए, जिसमें नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिला और आरजेडी का लगभग सफाया हो गया। यह चुनाव बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ।
2010 में कांग्रेस 4 सीटों पर सिमटी
2010 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी महज चार सीटों पर सिमट गई। लालू यादव की आरजेडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था हालांकि दोनों की करारी हार हुई। 2010 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को 206 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, जबकि आरजेडी को 22 और कांग्रेस को महज 4 सीट मिली थी।
2015 में कांग्रेस को लालू ने दिया ऑक्सीजन
2015 के विधानसभा चुनाव में केंद्र में मोदी की सरकार बन चुकी थी और बिहार में नया समीकरण बन चुका था। नीतीश कुमार और लालू यादव एक साथ हो गए थे और कांग्रेस भी साथ में ही थी। इस विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू यादव की पार्टी 101 सीटों पर चुनाव लड़ी। जबकि 42 सीटों में से कांग्रेस ने 24 पर जीत हासिल की। लंबे समय के बाद कांग्रेस ने दहाई का आंकड़ा पार किया था। कांग्रेस को मंत्री पद भी मिला था ।
2020 में कांग्रेस ने तेजस्वी के अरमानों पर फेरा पानी
2020 के आते ही बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिला। नीतीश कुमार, जो 2017 में ही एक बार फिर बीजेपी के साथ आ गए थे, एनडीए का हिस्सा बन चुके थे। इस बार भी मुख्य मुकाबला एनडीए और महागठबंधन के बीच था। एनडीए में जेडीयू और बीजेपी शामिल थीं, जबकि महागठबंधन में आरजेडी और कांग्रेस प्रमुख दल थे। महागठबंधन में कांग्रेस को 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिला, लेकिन पार्टी सिर्फ 19 सीटें ही जीत पाई। इस गठबंधन में सबसे कमजोर प्रदर्शन कांग्रेस का ही रहा और उसका स्ट्राइक रेट सबसे कम रहा।
लालू प्रसाद यादव अपने बेटे तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते थे, लेकिन मुकाबला बेहद करीबी रहा और महागठबंधन को हार का सामना करना पड़ा। ऐसा माना गया कि यदि कांग्रेस कुछ और सीटें जीतने में सफल हो जाती। लगभग 5 से 7 तो तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बन सकती थी। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित किया कि 1990 के बाद से बिहार में कांग्रेस का राजनीतिक प्रभाव लगातार घटता गया, जबकि आरजेडी धीरे-धीरे उभरती रही। 1990 के बाद कांग्रेस राज्य में कभी भी अकेले दम पर सत्ता में वापसी नहीं कर सकी है। Bihar