जाने चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को कैसे बनाया महान सम्राट

चंद्रगुप्त मौर्य को इतिहासकार उन्हें केवल एक महान विजेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रबंधक और प्रशासक मानते हैं, जिन्होंने चाणक्य के मार्गदर्शन में भारतीय उपमहाद्वीप में एक विशाल और सुव्यवस्थित साम्राज्य की नींव रखी।

Chandragupta Maurya in the pages of history
इतिहास के पन्नों में चंद्रगुप्त मौर्य (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar09 Feb 2026 02:37 PM
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History of Chandragupta Maurya : चंद्रगुप्त मौर्य, जिन्होंने ईसा पूर्व चौथी सदी में लगभग 21 वर्षों तक भारत पर शासन किया था, आज भी इतिहास के पन्नों में एक रहस्यमयी और शक्तिशाली व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। संस्कृत, पाली, प्राकृत और यूनानी (ग्रीक) एवं लैटिन भाषाओं की रचनाओं में उनका ज़िक्र मिलता है, लेकिन उनके बारे में प्रामाणिक जानकारी का अभाव है। यहाँ तक कि उनके पोते सम्राट अशोक ने भी अपने शिलालेखों में अपने दादा का नाम नहीं लिखा है। ऐसे में इतिहासकारों के अनुसार, एक बालक (चंद्रगुप्त मौर्य) को महान सम्राट बनाने में चाणक्य की भूमिका और उनकी तैयारी की प्रक्रिया काफी दिलचस्प है।

जन्म और विवाद: क्षत्रिय या शूद्र?

चंद्रगुप्त मौर्य की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। बौद्ध ग्रंथों जैसे 'दीघ निकाय' और 'दिव्यावदान' में उन्हें पिप्पलिवन के क्षत्रिय राजाओं का वंशज बताया गया है। वहीं, कुछ विद्वान 'मौर्य' शब्द को 'मयूर' (मोर) से जोड़ते हैं, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि वे मोर पालने वाले या उस क्षेत्र के निवासी थे। विशाखदत्त के नाटक 'मुद्राराक्षस' में चंद्रगुप्त के लिए 'वृषला' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसे कई लोग 'शूद्र पुत्र' कहते हैं। हालांकि, इतिहासकार राधाकुमुद मुखर्जी अपनी किताब 'चंद्रगुप्त मौर्य एंड हिज़ टाइम्स' में 'वृषला' को एक आदरसूचक शब्द बताते हैं, जिसका अर्थ है 'सबसे अच्छा राजा'।

चाणक्य से मुलाकात और गुरुकुल की शिक्षा

इतिहासकार देविका रंगाचारी की किताब 'द मौर्याज़, चंद्रगुप्त टु अशोका' के अनुसार, चाणक्य की मुलाक़ात चंद्रगुप्त से तब हुई जब वह मगध के राजा धनानंद के अपमान से क्षुब्ध होकर ग्रामीण इलाकों में घूम रहे थे। उन्होंने लगभग 11-12 वर्षीय चंद्रगुप्त को बच्चों के खेल में राजा की भूमिका निभाते हुए एक पेड़ की डाल पर बैठकर सबूतों के आधार पर न्याय करते देखा। चाणक्य इस बालक की प्रतिभा से प्रभावित हुए और उसे अपने साथ तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान) ले गए। तक्षशिला उस समय शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र था। चाणक्य ने उसे गुरुकुल में प्रवेश दिलाया और भविष्य की चुनौतियों के लिए बार-बार परीक्षाओं से गुज़ार कर उसे तैयार किया।

सिकंदर से टकराव और सेना का निर्माण

तक्षशिला में शिक्षा के दौरान ही सिकंदर (अलेक्जेंडर) ने भारत पर आक्रमण किया। चाणक्य ने मौके का फायदा उठाते हुए चंद्रगुप्त को सिकंदर से मिलने भेजा। यूनानी इतिहासकार प्लूटार्क और जस्टिन के अनुसार, यह मुलाकात असफल रही। चंद्रगुप्त की बातों से नाराज़ सिकंदर ने उसे मारने का आदेश दे दिया, लेकिन चंद्रगुप्त तेज़ी से भागकर अपनी जान बचाने में सफल रहा। जस्टिन लिखते हैं कि भागने के बाद जब चंद्रगुप्त सो रहा था, एक शेर ने उसका पसीना चाटा, जिसे शक्ति का संकेत माना गया। इसके बाद चंद्रगुप्त ने स्थानीय लोगों को इकट्ठा कर सेना बनानी शुरू कर दी और सिकंदर की मृत्यु के बाद पंजाब और सिंध को आज़ाद करा लिया।

मगध विजय और चाणक्य की शपथ

चंद्रगुप्त का अगला और सबसे बड़ा लक्ष्य मगध था। इतिहासकार दीपा अग्रवाल के अनुसार, चाणक्य की धनानंद से दुश्मनी की वजह एक अपमान थी। जब चाणक्य धनानंद के दरबार में भोजन कर रहे थे, तभी राजा ने आकर उनका अपमान किया और भोजन रोकने को कहा। गुस्से से चाणक्य ने शपथ ली कि जब तक वे नंद वंश की जड़ें नहीं उखाड़ देते, तब तक अपनी चोटी की गांठ नहीं बांधेंगे। 'मिलिंद पन्हो' के अनुसार, भद्दसाला के नेतृत्व में हुए युद्ध में चंद्रगुप्त ने धनानंद को पराजित कर दिया। इस पूरे अभियान में चाणक्य की रणनीति महत्वपूर्ण रही।

राजनीतिक विवाह और प्रशासन

विजय के बाद चाणक्य ने चंद्रगुप्त का विवाह निर्वासित राजा धनानंद की सबसे छोटी बेटी दुर्धरा से कराने का प्रस्ताव दिया। इसका मुख्य कारण राजनीतिक स्थिरता थी। 320 ईसा पूर्व तक चंद्रगुप्त ने पूरे गंगा के मैदान पर नियंत्रण कर लिया था। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज़ की किताब 'इंडिका' के अनुसार, उस समय पाटलिपुत्र (वर्तमान पाटन) दुनिया का सबसे बड़ा शहर था, जिसका क्षेत्रफल 33.8 वर्ग किलोमीटर था—यह रोम से 11 गुना और अलेक्जेंड्रिया से दोगुना बड़ा था। मेगस्थनीज़ ने चंद्रगुप्त की सेना का विवरण देते हुए लिखा है कि उनके पास 6 लाख पैदल सैनिक, 30 हजार घुड़सवार और 9 हजार हाथी थे।

सुरक्षा, दिनचर्या और अंत

बताया जाता है कि चंद्रगुप्त का जीवन भव्य महल में बीता, लेकिन उन्हें हमेशा हत्या का डर रहता था। उनकी सुरक्षा में सशस्त्र महिला अंगरक्षक तैनात थीं। वे दिन में नहीं सोते थे और रात में अपना कमरा बदल-बदलकर सोते थे। अपने जीवन के अंतिम चरण में, लगभग 293 ईसा पूर्व, चंद्रगुप्त ने शांति की खोज में जैन धर्म अपनाया और सिंहासन का त्याग कर अपने पुत्र बिंदुसार को राजा बनाया। वे जैन साधु भद्रबहु के साथ दक्षिण की ओर चले गए और कर्नाटक के श्रवण बेलगोला में संज्ञा (शरीर त्याग) के माध्यम से अपना शरीर छोड़ा। History of Chandragupta Maurya

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किसान नेताओं ने खोल दी सरकार के दावों की पोल

भारत सरकार का दावा है कि अमेरिका के साथ टे्रड डील में किसानों का पूरा ध्यान रखा गया है। भारत सरकार के दावों के विपरीत किसान नेताओं का कहना है कि यह टे्रड डील भारत के किसानों के लिए बहुत ही खतरनाक डील है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने सरकार के दावों पर उठाए सवाल
संयुक्त किसान मोर्चा ने सरकार के दावों पर उठाए सवाल
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar09 Feb 2026 02:18 PM
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India US trade deal farmers protest : अमेरिका के साथ भारत के टे्रड डील के मुद्दे पर किसान नेताओं की स्पष्ट राय सामने आई है। भारत सरकार अमेरिका के साथ टे्रड डील पर लगातार बड़े-बड़े दावे कर रही है। भारत सरकार का दावा है कि अमेरिका के साथ टे्रड डील में किसानों का पूरा ध्यान रखा गया है। भारत सरकार के दावों के विपरीत किसान नेताओं का कहना है कि यह टे्रड डील भारत के किसानों के लिए बहुत ही खतरनाक डील है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने मांगा मंत्री का इस्तीफा

भारत में अनेक किसान संगठन सक्रिय हैं। देश के तमाम बड़े किसान संगठनों ने मिलकर संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) बना रखा है। संयुक्त किसान मोर्चा ने अमेरिका के साथ चल रही टे्रड डील का कड़ा विरोध किया है। संयुक्त किसान मोर्चा ने एक बयान जारी करके टे्रड डील को अमेरिका के सामने भारत सरकार को ‘‘आत्मसमर्पण’’ बताया है। साथ ही इस मुद्दे पर केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के त्याग-पत्र की मांग की है। संयुक्त किसान मोर्चा ने टे्रड डील के विरोध में बड़े पैमाने पर आंदोलन छेडऩे की घोषणा भी की है। किसान नेताओं का स्पष्ट मत है कि इस टे्रड डील से भारत के किसान बर्बाद हो जाएंगे।

किसान नेताओं ने दिया कृषि विशेषज्ञों का हवाला

अमेरिका के साथ टे्रड डील के मुद्दे पर किसानों का पक्ष स्पष्ट करते हुए किसानों ने कृषि विशेषज्ञों का हवाला दिया है। किसान नेताओं का कहना है कि इस ट्रेड डील से अमेरिकी कृषि उत्पादों को पहली बार भारतीय बाज़ार में वो जगह मिलेगी, जो अब तक नहीं मिल पाई थी।'जगजीवन राम जब कृषि मंत्री थे तब अमेरिकी कृषि उत्पाद की लॉबी का दबाव था कि भारत बाज़ार खोले। दशकों तक WTO में भी भारत पर दबाव रहा है कि वो अपना कृषि बाज़ार खोले। "अभी तक भारत ने किसानों के हितों का बचाव किया है, ये बात सही है लेकिन ये समझ नहीं आता कि अमेरिकी कृषि मंत्री ने क्यों कहा कि इस समझौते से दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार खुल गया है और अमेरिकी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इससे नकदी बढ़ेगी।" हालांकि पहले से ही माना जा रहा था कि भारत को ट्रेड वार्ता में अमेरिका को कुछ तो रियायतें देनी पड़ेंगी। बीते कुछ महीनों में भारत सरकार ने कुछ ऐसे क़दम उठाए भी जैसे कपास के आयात पर टैरिफ को घटाना आदि। कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का कहना है, "अंतरिम समझौते के ढांचे पर जो सहमति बनी है उसमें भारत अगले पांच साल में 500 अरब डॉलर का आयात ख़रीदेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका को भारत के साथ व्यापार घाटा हो रहा है। इसमें भारत की क्या ग़लती है?" भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार आठ अरब डॉलर का है, जिसमें भारत चावल, झींगा और मसाले निर्यात करता है और अमेरिका मेवे, सेब और दालें भेजता है। अमेरिका पहले से ही भारत के साथ अपने 45 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को कम करने के लिए मक्का, सोयाबीन और कपास के बड़े कृषि निर्यात के लिए दरवाज़े खोले जाने की मांग करता रहा है। देवेंद्र शर्मा इस डील पर आपत्ति जताते हैं, "ये रेसिप्रोकल टैरिफ़ कैसे है, एक तरफ़ शून्य प्रतिशत है और दूसरी तरफ़ 18 प्रतिशत है।" वो कहते हैं, "अमेरिकी सरकार अपने यहां सालाना प्रति किसान औसतन 64,000 डॉलर (लगभग 60 लाख रुपये) की सब्सिडी देती है। जबकि भारत में प्रति किसान ये सब्सिडी 64 डॉलर के आस पास है।"

बड़ा अंतर है नीतियों में

कृषि वैज्ञानिक देवेंद्र शर्मा कपास का उदाहरण देकर बताते हैं कि कैसे भारत और अमेरिकी किसानों के बीच की प्रतिद्वंद्विता में कहीं लेवल प्लेइंग फ़ील्ड नहीं है। वो कहते हैं, "अमेरिका में कपास उत्पादक किसान आठ हज़ार हैं, जबकि भारत में 98 लाख कपास उत्पादक किसान हैं. अमेरिका में कपास के खेतों का आकार औसतन 600 हेक्टेयर है. हमारे यहां एक से तीन एकड़ है। " "अमेरिका अपने कपास किसानों को हर साल एक लाख डॉलर (क़रीब 90 लाख रुपये) की सब्सिडी देता है। हमारे यहां कपास किसान को मात्र 27 डॉलर की सब्सिडी मिलती है।" उन्होंने कहा, "बीते अक्तूबर, नवंबर, दिसंबर में भारत ने अमेरिका से कपास के आयात पर शुल्क को 11 प्रतिशत से शून्य कर दिया। इन तीन महीने में कपास की 30 लाख बेल्स (गांठ) आयात की गई, जोकि ज़रूरत से कहीं अधिक है।" वो कहते हैं, "आपूर्ति अधिक होने से भारतीय कपास उत्पादक किसानों को 1000 से 1500 रुपये कम दाम मिले. ये सिर्फ तीन महीने की बात है। आगे क्या होगा इससे अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है।" India US trade deal farmers protest

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किसानों की आमदनी बढ़ाएगा तरबूज, जानें बुवाई से कटाई तक का सही तरीका

भारत के मैदानी इलाकों में तरबूज की बुवाई का उत्तम समय फरवरी और मार्च का महीना है,लगभग ₹30,000 की लागत में आप अच्छी मात्रा में तरबूज की खेती कर सकते हैं, उत्तर-पूर्वी और पश्चिमी भारत में नवंबर से जनवरी के बीच बुवाई की जाती है, जबकि महाराष्ट्र में दिसंबर-जनवरी में इसकी खेती शुरू होती है।

Watermelon Cultivation
किसानों के लिए नई सफलता का रास्ता (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar09 Feb 2026 01:22 PM
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Watermelon Cultivation: देश में गर्मियों के मौसम की शुरुआत हो चुकी है और इस दौरान किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर तरबूज की खेती की जा रही है। जो कि लगभग ₹30,000 की लागत में आप अच्छी मात्रा में तरबूज की खेती कर सकते हैं। गर्मी के मौसम में तरबूज की बाजार में भारी मांग रहती है, जिसे देखते हुए किसान इस फसल को अच्छा खासा मुनाफा देने वाला माना जाता है।अन्य फलों की तुलना में तरबूज की खेती में कम समय, कम खाद और कम पानी की आवश्यकता होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, उचित तरीके से और बड़े पैमाने पर खेती करने पर यह आय का एक बेहतरीन स्रोत बन सकता है।

तरबूज की खेती क्यों है फायदेमंद?

बता दें कि तरबूज एक गर्मियों का फल है जिसकी मांग पूरे साल रहती है। इसकी खेती में शुरुआती लागत बहुत ज्यादा नहीं है, और यदि सही तरीके से की जाए तो यह बहुत लाभकारी साबित हो सकती है। लगभग ₹30,000 की लागत में आप अच्छी मात्रा में तरबूज की खेती कर सकते हैं। इसमें बीज, खाद, सिंचाई, और अन्य आवश्यक संसाधन शामिल हैं। यदि आप इस फसल की सही देखरेख करते हैं, तो 3 से 4 महीने के अंदर ही आप 4 से 5 लाख रुपये तक की कमाई कर सकते हैं।

बुवाई का सही समय और उपयुक्त जलवायु

बता दें कि भारत के मैदानी इलाकों में तरबूज की बुवाई का उत्तम समय फरवरी और मार्च का महीना है, जिससे गर्मियों में फल मिलते हैं। हालांकि, उत्तर-पूर्वी और पश्चिमी भारत में नवंबर से जनवरी के बीच बुवाई की जाती है, जबकि महाराष्ट्र में दिसंबर-जनवरी में इसकी खेती शुरू होती है। इसकी खेती के लिए 25 से 32 डिग्री सेल्सियस का तापमान और रेतीली या रेतीली दोमट भूमि सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

तरबूज की खेत की तैयारी और नर्सरी प्रबंधन

बता दें कि उच्च उपज के लिए खेत की तैयारी बेहद महत्वपूर्ण है। खेत को प्लाउ की सहायता से जोतकर खरपतवारों और कीटों को नष्ट किया जाता है, जिसके बाद हैरो से जुताई कर भूमि को समतल बनाया जाता है। पौधों को मजबूती देने के लिए पॉलिथीन बैग या ट्रे में नर्सरी तैयार की जाती है, जिसमें काली मिट्टी, बालू और गोबर की खाद को 1:1:1 के अनुपात में मिलाया जाता है। लगभग 12 दिन पुराने पौधों को मुख्य खेत में रोपा जाता है।

तरबूज की रोपाई विधि और खाद प्रबंधन

बता दें कि रोपाई के लिए 1.2 मीटर चौड़ी और 30 सेमी ऊंची क्यारियां बनाई जाती हैं। बुवाई से पहले खरपतवारनाशी दवाओं का छिड़काव करना लाभदायक रहता है। खेत की अंतिम जुताई के समय 8 टन गोबर की सड़ी खाद, 1 किलोग्राम एजोस्पिरिलम, 1 किलोग्राम फॉस्फोबैक्टीरिया और 40 किलोग्राम नीम केक का उपयोग किया जाता है। फसल के 10-20 दिन बाद 22-22 किलोग्राम फोस्फोरस, यूरिया और पोटाश देने की सिफारिश की गई है, जिसे फर्टिगेशन के जरिए भी दिया जा सकता है।

तरबूज की सिंचाई और कटाई

तरबूज की खेती में पानी की बचत के लिए ड्रिप सिंचाई प्रणाली को सबसे बेहतर माना जाता है। इससे फसल को समान मात्रा में नमी मिलती है। बुवाई के 78-90 दिन बाद तरबूज पकने लगते हैं और इन्हें कैंची या चाकू की मदद से काटा जाता है। किसानों को सलाह दी जाती है कि कटाई के बाद फसल के अवशेषों को नष्ट कर दें और मिट्टी के क्षय को रोकने के लिए फसल चक्र का पालन करें। गर्मियों में डिहाइड्रेशन से बचने के लिए लोगों द्वारा तरबूज के अधिक सेवन किए जाने के कारण किसानों का मुनाफा लाखों में पहुंच सकता है। Watermelon Cultivation

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