जैविक उत्पादों की बढ़ती उपभोक्ता माँग और कृषि में रासायनिक उपयोग को कम करने के लिए कड़े कानूनों के बीच, किसानों के लिए अपनी फसलों की देखभाल और उपज बढ़ाने के लिए गैर-रासायनिक विकल्पों की आवश्यकता बढ़ रही है।

बता दे कि इस संदर्भ में, जीवित सूक्ष्मजीवों का उपयोग, जिन्हें 'माइक्रोब्स' या 'इनोक्युलेंट्स' भी कहा जाता है, जैविक और पारंपरिक दोनों तरह की कृषि के लिए एक आशाजनक समाधान के रूप में उभर रहा है।
सूक्ष्मजीव जीवित या निष्क्रिय जीवाणु (बैक्टीरिया) या कवक (फंगी) होते हैं, जिनका उपयोग बीजों पर, सीधे मिट्टी में (इन-फरो), या पत्तियों पर छिड़काव के रूप में किया जा सकता है। ये माइक्रोब्स पौधे के साथ मिलकर काम करते हैं और कई तरह के लाभ प्रदान करते हैं:
पिछले 25 वर्षों से छोटी बायोटेक कंपनियाँ सूक्ष्मजीवों पर काम कर रही हैं, लेकिन हाल के वर्षों में बड़े कृषि-रसायन दिग्गजों का ध्यान भी इस ओर गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि में सूक्ष्मजीवों का भविष्य रसायनों और माइक्रोब्स के संयोजन में निहित है, न कि एकल उत्पादों में।
हालांकि सूक्ष्मजीवों में भारी क्षमता है, लेकिन उनके पूर्ण विकास में अभी भी कुछ बाधाएँ हैं:
बावजूद इसके, कृषि में सूक्ष्मजीवों का भविष्य उज्ज्वल और आशाजनक दिखता है। ये उत्पाद न केवल जैविक कृषि के लिए आवश्यक हैं, बल्कि पारंपरिक कृषि में भी रसायन-आधारित समाधानों के साथ सह-अस्तित्व में रहकर अधिक टिकाऊ और लचीली फसल विकास रणनीतियों का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।