देश के कई सूखाग्रस्त और कम बारिश वाले इलाकों में किसान अब फसल विविधीकरण (Crop Diversification) अपनाकर अपनी खेती को नई दिशा दे रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक न केवल खेती को जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचाती है, बल्कि किसान की आमदनी भी कई गुना बढ़ा देती है। खासकर वे क्षेत्र जहां सालाना बारिश 50 सेंटीमीटर से भी कम होती है, वहां फसल विविधकरण किसी वरदान से कम नहीं साबित हो रहा।
पूसा संस्थान के विशेषज्ञ बताते हैं कि करौंदा, आंवला, फालसा, सहजन (मोरिंगा), अनार और अमरूद जैसे फलदार वृक्ष कम पानी में भी आसानी से बढ़ते हैं। इन पेड़ों की गहरी जड़ें नमी को संभाले रखती हैं और 3–4 साल में फल देना शुरू कर देती हैं। किसानों को सलाह दी जा रही है कि इन पेड़ों को 4–5 मीटर की दूरी पर लगाकर बीच की खाली जगह का भी उपयोग किया जाए।
पेड़ों के बीच की खाली जगह यानी ‘एलिज’ में किसान पूरक फसलें लगाकर अतिरिक्त लाभ कमा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन फसलों से न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बेहतर होती है।
मूंगफली और सोयाबीन कम पानी में अच्छी पैदावार देती हैं। दोनों फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाकर लंबे समय तक भूमि की उर्वरता बनाए रखती हैं।
मानसून के बाद किसानों को रबी सीजन खाली नहीं छोड़ने की सलाह दी जा रही है। सरसों की पूसा सरसों 26 और 28 जैसी जल्दी पकने वाली किस्में तथा आलू की 'कुफरी चिप्स सोना' जैसी वैरायटी किसानों की जेब भर रही हैं। विशेषज्ञों का दावा है कि सही फसल संयोजन अपनाकर किसान प्रति हेक्टेयर 2 से 2.5 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं।
खेती विशेषज्ञों का मानना है कि फसल विविधकरण खेती को स्थायी, लाभकारी और जलवायु जोखिमों से सुरक्षित बनाता है। पूसा संस्थान की उन्नत किस्में और वैज्ञानिक सलाह अपनाकर किसान अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिक किसानों से अपील कर रहे हैं कि बदलते मौसम और बढ़ती चुनौतियों के बीच फसल विविधकरण ही भविष्य की टिकाऊ खेती का रास्ता है।