कृषि क्षेत्र में 'जीरो टिलेज' की बढ़ती लोकप्रियता
जीरो टिलेज एक ऐसी कृषि दृष्टिकोण है, जिसमें फसलों की खेती के लिए मिट्टी को जोता या परेशान नहीं किया जाता। इस पद्धति में बीजों को सीधे मिट्टी में बोया जाता है, जिससे जमीन की संरचना बनी रहती है।

Zero Tillage: दुनियाभर के कृषि क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और लागत बचत को लेकर 'जीरो टिलेज' (शून्य जुताई) तकनीक तेजी से लोकप्रिय हो रही है। कई देशों के किसान इस पद्धति को अपनाकर पारंपरिक खेती के तरीकों को बदल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक न केवल मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, बल्कि आर्थिक रूप से भी किसानों को मजबूत बना सकती है, हालांकि इसकी कुछ चुनौतियों से भी निपटना जरूरी है।
जाने जीरो टिलेज के बारे में
जीरो टिलेज एक ऐसी कृषि दृष्टिकोण है, जिसमें फसलों की खेती के लिए मिट्टी को जोता या परेशान नहीं किया जाता। इस पद्धति में बीजों को सीधे मिट्टी में बोया जाता है, जिससे जमीन की संरचना बनी रहती है।
पर्यावरण और आर्थिक लाभ
बता दें कि नो-टिल खेती कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) में वृद्धि करती है और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने में मदद करती है। मिट्टी की सतह पर फसल अवशेषों की एक सुरक्षात्मक परत बनने से नमी संरक्षित रहती है और वाष्पीकरण कम होता है। यह मिट्टी के कटाव, खासकर ढलान वाले क्षेत्रों में, को भी रोकता है और भूमिगत जल स्तर को बनाए रखने में सहायक होता है।आर्थिक रूप से, इस पद्धति से किसानों को ईंधन खपत, मशीनरी के मरम्मत और श्रम घंटों में काफी बचत होती है। खेत की जुताई में लगने वाले समय की बचत से किसान जल्दी फसल बो सकते हैं, जिससे पैदावार में वृद्धि की संभावना बढ़ जाती है।
चुनौतियां और नुकसान
हालांकि, यह तकनीक बिना चुनौतियों के नहीं है। शून्य जुताई में सबसे बड़ी समस्या खरपतवार नियंत्रण की है। चूंकि मिट्टी को नहीं जोता जाता, इसलिए खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए हैरोइंग जैसी यांत्रिक विधियों का उपयोग नहीं हो पाता, जिससे किसानों को रासायनिक शाकनाशी (herbicides) पर अधिक निर्भर होना पड़ता है। रसायनों का अधिक उपयोग मिट्टी और पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है। हालांकि, खरपतवार नियंत्रण के लिए डिस्क चेन (Disk Chain) जैसी यांत्रिक तकनीकों का भी उपयोग किया जा रहा है, जो खरपतवारों को बाहर निकालकर उन्हें सतह पर सुखाने में मदद करती हैं। इसके अलावा, समय के साथ खेतों में पानी के बहाव से 'गलियों' (rills) का निर्माण हो सकता है और अवशेषों के प्रबंधन में कठिनाई होती है। पारंपरिक किसानों के लिए इस नई तकनीक को सीखना भी एक बड़ी बाधा साबित हो सकती है, जिसके लिए उन्हें विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
विश्व स्तर पर बढ़ती प्रगति
इस तकनीक के प्रति दुनिया भर में रुझान बढ़ रहा है। 1970 के दशक की शुरुआत में यह केवल 3.3 मिलियन एकड़ में सीमित थी, जो अब 2017 तक बढ़कर 104 मिलियन एकड़ हो गई है। अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2021 तक यह आंकड़ा 110 मिलियन एकड़ को पार कर चुका है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया इस मामले में अग्रणी है, जहां लगभग 67% कृषि भूमि (56.7 मिलियन एकड़) पर जीरो टिलेज विधि अपनाई गई है, जो वहां के शुष्क क्षेत्रों में किसानों के लिए वरदान साबित हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जीरो टिलेज कृषि का भविष्य हो सकती है, लेकिन इसे अंधविश्वास से नहीं, बल्कि जागरूकता के साथ अपनाने की जरूरत है। इसके फायदे जैसे मिट्टी संरक्षण और लागत बचत को देखते हुए किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसका चयन करना चाहिए, ताकि खरपतवार प्रबंधन और फसल अवशेषों की समस्याओं का समाधान किया जा सके और खेती टिकाऊ बनी रहे। Zero Tillage
Zero Tillage: दुनियाभर के कृषि क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और लागत बचत को लेकर 'जीरो टिलेज' (शून्य जुताई) तकनीक तेजी से लोकप्रिय हो रही है। कई देशों के किसान इस पद्धति को अपनाकर पारंपरिक खेती के तरीकों को बदल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक न केवल मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, बल्कि आर्थिक रूप से भी किसानों को मजबूत बना सकती है, हालांकि इसकी कुछ चुनौतियों से भी निपटना जरूरी है।
जाने जीरो टिलेज के बारे में
जीरो टिलेज एक ऐसी कृषि दृष्टिकोण है, जिसमें फसलों की खेती के लिए मिट्टी को जोता या परेशान नहीं किया जाता। इस पद्धति में बीजों को सीधे मिट्टी में बोया जाता है, जिससे जमीन की संरचना बनी रहती है।
पर्यावरण और आर्थिक लाभ
बता दें कि नो-टिल खेती कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) में वृद्धि करती है और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने में मदद करती है। मिट्टी की सतह पर फसल अवशेषों की एक सुरक्षात्मक परत बनने से नमी संरक्षित रहती है और वाष्पीकरण कम होता है। यह मिट्टी के कटाव, खासकर ढलान वाले क्षेत्रों में, को भी रोकता है और भूमिगत जल स्तर को बनाए रखने में सहायक होता है।आर्थिक रूप से, इस पद्धति से किसानों को ईंधन खपत, मशीनरी के मरम्मत और श्रम घंटों में काफी बचत होती है। खेत की जुताई में लगने वाले समय की बचत से किसान जल्दी फसल बो सकते हैं, जिससे पैदावार में वृद्धि की संभावना बढ़ जाती है।
चुनौतियां और नुकसान
हालांकि, यह तकनीक बिना चुनौतियों के नहीं है। शून्य जुताई में सबसे बड़ी समस्या खरपतवार नियंत्रण की है। चूंकि मिट्टी को नहीं जोता जाता, इसलिए खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए हैरोइंग जैसी यांत्रिक विधियों का उपयोग नहीं हो पाता, जिससे किसानों को रासायनिक शाकनाशी (herbicides) पर अधिक निर्भर होना पड़ता है। रसायनों का अधिक उपयोग मिट्टी और पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है। हालांकि, खरपतवार नियंत्रण के लिए डिस्क चेन (Disk Chain) जैसी यांत्रिक तकनीकों का भी उपयोग किया जा रहा है, जो खरपतवारों को बाहर निकालकर उन्हें सतह पर सुखाने में मदद करती हैं। इसके अलावा, समय के साथ खेतों में पानी के बहाव से 'गलियों' (rills) का निर्माण हो सकता है और अवशेषों के प्रबंधन में कठिनाई होती है। पारंपरिक किसानों के लिए इस नई तकनीक को सीखना भी एक बड़ी बाधा साबित हो सकती है, जिसके लिए उन्हें विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
विश्व स्तर पर बढ़ती प्रगति
इस तकनीक के प्रति दुनिया भर में रुझान बढ़ रहा है। 1970 के दशक की शुरुआत में यह केवल 3.3 मिलियन एकड़ में सीमित थी, जो अब 2017 तक बढ़कर 104 मिलियन एकड़ हो गई है। अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2021 तक यह आंकड़ा 110 मिलियन एकड़ को पार कर चुका है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया इस मामले में अग्रणी है, जहां लगभग 67% कृषि भूमि (56.7 मिलियन एकड़) पर जीरो टिलेज विधि अपनाई गई है, जो वहां के शुष्क क्षेत्रों में किसानों के लिए वरदान साबित हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जीरो टिलेज कृषि का भविष्य हो सकती है, लेकिन इसे अंधविश्वास से नहीं, बल्कि जागरूकता के साथ अपनाने की जरूरत है। इसके फायदे जैसे मिट्टी संरक्षण और लागत बचत को देखते हुए किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसका चयन करना चाहिए, ताकि खरपतवार प्रबंधन और फसल अवशेषों की समस्याओं का समाधान किया जा सके और खेती टिकाऊ बनी रहे। Zero Tillage












