JNU में फिर गूंजेगा लोकतंत्र का नारा, CUET से दाखिला को लेकर विवाद
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भारत
चेतना मंच
24 May 2025 04:59 PM
JNU : जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में एक बार फिर दाखिला प्रक्रिया को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रसंघ आमने-सामने हैं। इस बार विवाद का मुद्दा कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) के जरिए दाखिला को लेकर है। पिछले दो वर्षों से JNU के सभी स्नातक (UG) और परास्नातक (PG) कोर्सों में दाखिला NTA द्वारा आयोजित CUET परीक्षा की मेरिट के आधार पर हो रहा है। जबकि तीन साल पहले तक JNU खुद अपनी प्रवेश परीक्षा आयोजित करता था जिसके आधार पर छात्रों का चयन होता था। अब छात्रसंघ इसी पुरानी प्रणाली को बहाल करने की मांग कर रहा है।
छात्रसंघ का जनमत संग्रह का ऐलान
JNU छात्रसंघ ने साफ कहा है कि CUET आधारित प्रणाली विश्वविद्यालय की मूल पहचान और उद्देश्य के खिलाफ है। इसी मुद्दे को लेकर छात्रसंघ ने शनिवार 24 मई को जनमत संग्रह कराने का फैसला लिया है। शाम 7 बजे से रात 10 बजे तक होने वाले इस जनमत संग्रह में छात्र यह तय करेंगे कि JNU में दाखिला CUET के जरिए हो या यूनिवर्सिटी की अपनी प्रवेश परीक्षा से। छात्रसंघ का मानना है कि CUET प्रणाली मुख्य रूप से शहरी और संसाधनों से सम्पन्न पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए अनुकूल है। जबकि JNU की पुरानी प्रवेश परीक्षा ग्रामीण, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों को ध्यान में रखकर तैयार की जाती थी। उनका यह भी कहना है कि NTA की परीक्षा प्रक्रिया जटिल और केंद्रीकृत है, जिसमें सामाजिक रूप से वंचित वर्ग के छात्रों के लिए जगह बनाना मुश्किल होता जा रहा है।
पुरानी व्यवस्था में क्या था खास?
CUET लागू होने से पहले, JNU खुद प्रवेश परीक्षा आयोजित करता था। परीक्षा का प्रश्नपत्र विश्वविद्यालय के शिक्षक तैयार करते थे, जिसमें विविध पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को बराबरी का मौका देने की कोशिश होती थी। विश्वविद्यालय का यह मॉडल वर्षों तक उसकी समावेशी शिक्षा नीति की पहचान बना रहा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शनिवार के जनमत संग्रह में छात्र क्या निर्णय लेते हैं। हालांकि, मतदान के परिणाम कब घोषित किए जाएंगे इस पर अब तक कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है।
यह मुद्दा सिर्फ एक प्रवेश परीक्षा का नहीं बल्कि JNU की उस परंपरा का भी है, जो वंचित तबकों को उच्च शिक्षा तक पहुंचने का अवसर देती रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या छात्रसंघ की यह मुहिम विश्वविद्यालय प्रशासन पर कोई असर डाल पाएगी या नहीं।