जाने प्राचीन मिस्र में अजीबोगरीब टैक्स, जिसकी वजह से बने विश्व के सात अजूबे
प्राचीन मिस्र में टैक्स की दरें नील नदी की बाढ़ पर निर्भर करती थीं। 'निलोमीटर' नामक एक डिवाइस से नदी के पानी का स्तर मापा जाता था। अगर बाढ़ अच्छी आती थी, तो माना जाता था कि फसल अच्छी होगी और टैक्स बढ़ा दिए जाते थे।

Sweat Tax: प्राचीन मिस्र की सभ्यता कई रहस्यों को अपने आप में समाए हुए है, लेकिन हाल ही में सामने आई एक जानकारी ने सबको हैरान कर दिया है। क्या आप जानते हैं कि प्राचीन मिस्र में 'पसीने पर टैक्स' (Sweat Tax) लगाया जाता था? यह सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन इतिहासकारों के मुताबिक इसके पीछे की असलियत काफी प्रैक्टिकल और दिलचस्प है।
क्या है 'पसीने का टैक्स'?
दरअसल, जिसे लोग पसीने पर टैक्स कहते हैं, वह असल में जरूरी शारीरिक मेहनत का एक सिस्टम था, जिसे 'कोर्वी' (Corvée) कहा जाता था। उस समय सिक्कों और कागज की करेंसी का प्रचलन नहीं के बराबर था। ऐसे में टैक्स अक्सर पैसे के बजाय अनाज, जानवरों या मेहनत के रूप में वसूला जाता था। अगर कोई व्यक्ति राज्य को फसल या अनाज के रूप में टैक्स नहीं दे सकता था, तो उसे इसके बदले अपना समय और श्रम देना पड़ता था।
पिरामिडों का निर्माण और मजदूरों का सच
प्राचीन मिस्र की अर्थव्यवस्था खेती पर आधारित थी, लेकिन हर किसान के पास हमेशा टैक्स के रूप में अनाज नहीं होता था। ऐसे में राज्य को सरकारी प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए काबिल आदमियों की जरूरत होती थी। इसी 'कोर्वी सिस्टम' के तहत नागरिक खुदाई, पत्थर तराशने और सामान ढोने जैसे कामों में अपनी मेहनत का भुगतान करते थे।
इतिहासकारों का मानना है कि मिस्र के बड़े आर्किटेक्चर, जैसे कि पिरामिड, मंदिर और नहरें, इसी श्रम प्रणाली पर निर्भर थे। अक्सर यह माना जाता है कि पिरामिड गुलामों ने बनाए थे, लेकिन आधुनिक शोध बताते हैं कि कई मजदूर गुलाम नहीं, बल्कि टैक्स अदा करने वाले मौसमी कामगार थे, जो अपना कर्तव्य निभाने के लिए यह काम करते थे।
नील नदी से था टैक्स का गहरा संबंध
यह भी जानकारी दी गई है कि प्राचीन मिस्र में टैक्स की दरें नील नदी की बाढ़ पर निर्भर करती थीं। 'निलोमीटर' नामक एक डिवाइस से नदी के पानी का स्तर मापा जाता था। अगर बाढ़ अच्छी आती थी, तो माना जाता था कि फसल अच्छी होगी और टैक्स बढ़ा दिए जाते थे। वहीं, कम बाढ़ की स्थिति में फसल को देखते हुए टैक्स में छूट या एडजस्टमेंट किया जाता था। यह प्रणाली मिस्र की आर्थिक व्यवस्था को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती थी। Sweat Tax
Sweat Tax: प्राचीन मिस्र की सभ्यता कई रहस्यों को अपने आप में समाए हुए है, लेकिन हाल ही में सामने आई एक जानकारी ने सबको हैरान कर दिया है। क्या आप जानते हैं कि प्राचीन मिस्र में 'पसीने पर टैक्स' (Sweat Tax) लगाया जाता था? यह सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन इतिहासकारों के मुताबिक इसके पीछे की असलियत काफी प्रैक्टिकल और दिलचस्प है।
क्या है 'पसीने का टैक्स'?
दरअसल, जिसे लोग पसीने पर टैक्स कहते हैं, वह असल में जरूरी शारीरिक मेहनत का एक सिस्टम था, जिसे 'कोर्वी' (Corvée) कहा जाता था। उस समय सिक्कों और कागज की करेंसी का प्रचलन नहीं के बराबर था। ऐसे में टैक्स अक्सर पैसे के बजाय अनाज, जानवरों या मेहनत के रूप में वसूला जाता था। अगर कोई व्यक्ति राज्य को फसल या अनाज के रूप में टैक्स नहीं दे सकता था, तो उसे इसके बदले अपना समय और श्रम देना पड़ता था।
पिरामिडों का निर्माण और मजदूरों का सच
प्राचीन मिस्र की अर्थव्यवस्था खेती पर आधारित थी, लेकिन हर किसान के पास हमेशा टैक्स के रूप में अनाज नहीं होता था। ऐसे में राज्य को सरकारी प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए काबिल आदमियों की जरूरत होती थी। इसी 'कोर्वी सिस्टम' के तहत नागरिक खुदाई, पत्थर तराशने और सामान ढोने जैसे कामों में अपनी मेहनत का भुगतान करते थे।
इतिहासकारों का मानना है कि मिस्र के बड़े आर्किटेक्चर, जैसे कि पिरामिड, मंदिर और नहरें, इसी श्रम प्रणाली पर निर्भर थे। अक्सर यह माना जाता है कि पिरामिड गुलामों ने बनाए थे, लेकिन आधुनिक शोध बताते हैं कि कई मजदूर गुलाम नहीं, बल्कि टैक्स अदा करने वाले मौसमी कामगार थे, जो अपना कर्तव्य निभाने के लिए यह काम करते थे।
नील नदी से था टैक्स का गहरा संबंध
यह भी जानकारी दी गई है कि प्राचीन मिस्र में टैक्स की दरें नील नदी की बाढ़ पर निर्भर करती थीं। 'निलोमीटर' नामक एक डिवाइस से नदी के पानी का स्तर मापा जाता था। अगर बाढ़ अच्छी आती थी, तो माना जाता था कि फसल अच्छी होगी और टैक्स बढ़ा दिए जाते थे। वहीं, कम बाढ़ की स्थिति में फसल को देखते हुए टैक्स में छूट या एडजस्टमेंट किया जाता था। यह प्रणाली मिस्र की आर्थिक व्यवस्था को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती थी। Sweat Tax












