प्रदूषण के लिए पटाखे नहीं, इन 7 चीजों पर लगाइए लगाम
Pollution in delhi
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 01:50 AM
दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्सों में दिवाली के आसपास वायु प्रदूषण का स्तर अचानक बढ़ने की वजह पटाखे नहीं हैं। यह पढ़ते ही आपको लगेगा कि ज़रूर कोई धर्मांध व्यक्ति ये बात कह रहा होगा जिसे हर मुद्दे में हिंदू-मुसलमान करना है।
लेकिन, नासा (NASA) के गॉडआर्ड सेंटर और आईआईटी कानपुर के शोध-पत्र में यह बात कही गई है। नासा के गॉडआर्ड स्पेस सेंटर में भारतीय मूल के वैज्ञानिक हीरेन जेतवा, एयरफ्लो पैटर्न के विशेषज्ञ हैं। उनके साथ तीन अन्य वैज्ञानिकों ने एक शोधपत्र प्रकाशित किया जिसमें पिछले 15 साल के आंकड़ों के आधार पर उत्तर भारत में दिवाली के आसपास बढ़ने वाले प्रदूषण की वजह बताई गई है।
1. नासा के वैज्ञानिकों ने बताई उत्तर भारत में प्रदूषण बढ़ने की वजह
इस शोधपत्र में बताया गया है कि दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत में अक्टूबर-नवंबर में अचानक बढ़ने वाले वायु प्रदूषण की असल वजह धान की खेती है। नासा के सैटेलाइट से प्राप्त चित्रों और आंकड़ों के आधार उन्होंने बताया है कि पंजाब और हरियाणा, गेहूं की खेती के लिए जाने जाते हैं। आज़ादी के बाद अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में इस क्षेत्र के किसानों ने गेहूं की जगह धान (चावल) की खेती करनी शुरू कर दी। खासतौर, पर बासमती चावल की खेती पर ज्यादा जोर था क्योंकि इसकी अच्छी कीमत मिलती थी।
मानसून या बरसात के मौसम के बाद धान की कटाई होती है और उसके बाद खेतों में बचे खूंटों या पराली को साफ करने के लिए उसमें आग लगा दी जाती है। इससे उठने वाला धुंआ उत्तर भारत के बढ़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लेता है। इससे न सिर्फ़ पूरे क्षेत्र में धुंध की चादर फैल जाती है, बल्कि पीएम 2.5 का स्तर यानी प्रदूषण भी खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है।
2. गेहूं बेल्ट में धान की खेती ने बिगाड़ा सारा समीकरण
हालांकि, इसी दौरान उत्तर भारत में दिवाली का त्योहार मनाया जाता है जिसमें तीन से चार दिन तक बड़ी मात्रा में पटाखे जलाए जाते हैं। पराली की वजह से पहले से ही जहरीली हो चुकी हवा में पटाखों निकलने वाला धुंआ भी शामिल हो जाता है। यानी, नासा के गॉडआर्ड सेंटर का मानना है कि अक्टॅूबर-नवंबर के आसपास बढ़ने वाले प्रदूषण की असल वजह पंजाब-हरियाणा में धान की खेती का बढ़ता प्रचलन और पराली को जलाया जाना है।
इसी शोधपत्र में बताया गया है कि धान की खेती के लिए मध्य और दक्षिण भारत का इलाका सबसे मुफीद है। मुनाफे के लिए गेहूं बेल्ट में धान की खेती से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा है और प्रदूषण बढ़ा है।
3. आईआईटी की 12 वजहों की लिस्ट में पटाखे नदारद
अब बात करते हैं आईआईटी कानपुर की। आईआईटी-के ने दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत में अक्टूबर-नवंबर के आसपास बढ़ने वाले प्रदूषण के लिए 12 चीजों को जिम्मेदार बताया था। चौंकाने वाली बात ये है कि इसमें पटाखे शामिल नहीं है।
नासा और आईआईटी ने वैज्ञानिक तथ्यों, आंकड़ों और शोध के आधार पर यह बताया कि अक्टूबर-नवंबर के बीच दिल्ली-एनसीआर में बढ़ने वाले प्रदूषण की असल वजह क्या है। ऐसा नहीं है कि पटाखे पिछले 10-15 सालों से ही जलाए जा रहे हैं। यह परंपरा सदियों पुरानी है।
4. इन चीजें से खतरनाक स्तर तक बढ़ता है प्रदूषण
पराली के अलावा, वाहनों से निकलने वाला धुंआ, एसी-फ्रिज से निकलने वाली गैसें और सड़कों और निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल की वजह से दिल्ली-एनसीआर में औसतन पूरे साल वायु प्रदूषण का स्तर सामान्य से अधिक ही रहता है। अक्टूबर-नवंबर में पराली के साथ जब ये चीजें मिल जाती हैं, तो प्रदूषण का स्तर असहनीय हो जाता है।
5. पटाखों के व्यापार पर है सबसे कठोर सरकारी नियंत्रण
आमतौर पर पूरे साल चुप रहने वाले लोग दिवाली के आसपास प्रदूषण पर शोर मचाने लगते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके लिए पटाखे ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। जबकि, पटाखों के व्यापार पर सबसे कठोर सरकारी नियंत्रण है। विस्फोटक सामग्री होने के कारण सरकार की इस अद्योग पर सबसे ज्यादा नजर रहती है।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भी पटाखों से होने वाले शोर की अधिकतम सीमा को निर्धारित कर दिया है और ग्रीन क्रैकर्स का सख्त आदेश दे रखा है। पहले की तरह अब कोई भी या कहीं भी, न तो पटाखे बना सकता है, न ही बेच सकता है।
इससे उलट ऑटो-मोबाइल इंडस्ट्री यानी, वाहन उद्योग और कंस्ट्रक्शन (निर्माण) करने वाली कंपनियों पर ऐसी कोई सख्ती लागू नहीं की जाती। दिल्ली में यमुना को नाले में परिवर्तित करने में सबसे बड़ा हाथ उद्योगों का है लेकिन, उस पर कोई हंगामा नहीं होता।
6. पटाखों का धर्म या परंपरा से क्या नाता है?
पटाखों को न जलाने के पीछे यह तर्क भी दिया जाता है कि इसका धर्म या धर्मशास्त्रों से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि, उत्तर भारत ही नहीं, दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर और चीन में भी इस दौरान पितरों को स्वर्ग का मार्ग दिखाने के लिए आकाश दीप यानी, पटाखे जलाए जाते हैं।
साथ, नए साल के स्वागत में लगभग पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर पटाखे जलाए जाते हैं, लेकिन वहां इसका विरोध नहीं होता। असल बात यह है कि प्रदूषण के लिए जिन पटाखों को लेकर इतना शोर मचाया जा रहा है उनका योगदान लगभग ना के बराबर है। लेकिन, यह आसानी से मुद्दा बना जाता है क्योंकि, इससे सनसनी पैदा की जा सकती है।
7. दस लाख लोगों का रोजी-रोटी पर मंडरा रहा खतरा!
पटाखा उद्योग में आठ से दस लाख गरीब और निम्न-मध्यमवर्गीय लोग काम करते हैं। छह हजार करोड़ रुपये के इस उद्योग को कड़े लाइसेसिंग नियमों से गुजरना पड़ता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पटाखों के होने वाले शोर और उसमें इस्तेमाल होने वाले केमिकल से जुड़े कानून को और सख्त किया जाना चाहिए। साथ ही, पटाखों के कम इस्तेमाल को भी प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है। लेकिन, इससे वायु प्रदूषण कम हो जाएगा यह कहना सिर्फ़, विज्ञान और वैज्ञानिक तथ्यों की अनदेखी करना है।
यह ठीक वैसे ही है कि पश्चिमी देशों और यूरोप का यह कहना कि अब दुनिया के सभी देशों को शून्य कार्बन उत्सर्जन(zero carbon emissions) का फैसला लेना चाहिए। जबकि, 18वीं और 19वीं सदी में इन देशों ने ही सबसे ज्यादा कोयला जलाया और अपना विकास किया। नतीजे के तौर पर पूरी 21वीं सदी में पूरी दुनिया को ग्लोबल वार्निंग की सज़ा भुगतनी पड़ रही है। ज़रूरी है कि प्रदूषण के असल कारणों को समझा जाए और उस पर काम किया जाए।
-संजीव श्रीवास्तव