Vijay Singh Pathik - अमर शहीद विजय सिंह पथिक की 142वीं जयंती आज
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 09:11 PM
Vijay Singh Pathik - अमर विजय सिंह पथिक ना सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि ये बिजोलिया किसान आंदोलन के प्रणेता, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता व साहित्यकार के रूप में भी जाने जाते थे। आज इनकी 142वीं जयंती पर राजस्थान (Rajasthan) की जनता के साथ-साथ पूरा देश इन्हें याद कर रहा है।
विजय सिंह पथिक का संक्षिप्त जीवन परिचय (Vijay Singh Pathik Biography in short)-
विजय सिंह पथिक जिन्हें भूप सिंह के नाम से भी जाना जाता है, इनका जन्म 27 फरवरी 1882 को उत्तर प्रदेश राज्य में हुआ था। उत्तर प्रदेश राज्य के बुलंदशहर (Bulandshahar, UP) जिले के एक छोटे से गांव गुठावली के एक किसान परिवार में इनका जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम हमीर सिंह और माता का नाम कंवल कुंवर था। इनका पूरा परिवार ब्रिटिश शासन काल में जुर्म के खिलाफ लड़ता रहा। बचपन से ही इन्हें एक ऐसा माहौल मिला कि आगे चलकर ये भी जुर्म के खिलाफ लड़ने के लिए आगे आए और एक क्रांतिकारी के रूप में जाने गए।
बचपन में ही पिता की मृत्यु और फिर मां की भी मृत्यु हो गई। तब ये बहन के साथ इंदौर में आकर रहने लगे। इंदौर में ही साल 1907 में शचींद्र नाथ सान्याल से इनकी भेंट हुई, जिन्होंने इनके क्रांतिकारी व्यवहार को देखते हुए इनकी मुलाकात रासबिहारी बोस के साथ करवाई। रासबिहारी बोस उस दरमियान एक क्रांतिकारी दल की अगुवाई कर रहे थे। अपने इस दल में उन्होंने भूप सिंह को भी शामिल कर लिया। और यहीं से शुरुआत हुई इनके क्रांतिकारी सफर की।
साल 1915 में 'अभिनव भारत समिति' द्वारा 21 फरवरी को अंग्रेजो के खिलाफ सशस्त्र क्रांति को शुरुआत करने की योजना तैयार की गई। इस योजना को सफल बनाने के लिए अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग लोगों को इसकी जिम्मेदारी दी गई। रास बिहारी बोस, सचिंद्र नाथ सान्याल के साथ-साथ विजय सिंह पथिक को भी इस योजना की अगुवाई करने का मौका मिला। राजस्थान में इस योजना को सफल करने की जिम्मेदारी विजय सिंह पथिक को दी गई।
विजय सिंह पथिक की नेतृत्व क्षमता इतनी तीव्र थी कि देखते ही देखते राजस्थान में 2 हजार युवकों का दल तैयार हो गया। 21 फरवरी को राजस्थान में अजमेर ब्यावर और नसीराबाद में बम धमाका करने की योजना तैयार की गई, परंतु ब्रिटिश शासकों को योजना की भनक लग जाने की वजह से क्रांतिकारियों को पकड़ा जाने लगा। विजय सिंह पथिक और उनके साथी गिरफ्तार हो गए। और उन्हें टॉडगढ़ के जेल में डाल दिया गया। परिणामस्वरुप सशस्त्र क्रांति की योजना सफल होने में नाकामयाब रही।
कई दिनों तक जेल में बंद रहने के बाद भूप सिंह जेल से फरार होने में कामयाब हुए, और नाम बदलकर विजय सिंह पथिक (Vijay Singh Pathik) के नाम पर छिप छिप कर अलग-अलग गांव में अपना ठिकाना बनाने लगे। नौजवानों में देशभक्ति की भावना पैदा करने के लिए इन्होंने हरिभाई किनकर के साथ मिलकर 'विद्या प्रचारिणी सभा' की स्थापना की।
बिजौलिया का किसान आंदोलन -
बिजोलिया का किसान आंदोलन भारतीय इतिहास में सबसे लंबे चलने वाले आंदोलन के रूप में जाना जाता है 1897 से लेकर 1941, पूरे 44 वर्षों तक यह आंदोलन कई चरणों में चला। साल 1916 में विजय सिंह पथिक ने बिजोलिया किसान आंदोलन के नेतृत्व की बागडोर अपने हाथ में ली।
दरअसल साल 1915 में राजस्थान के राजाओं ने रियासतों में शासन करने के लिए अंग्रेजों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया था। मेवाड़ रियासत का प्रमुख ठिकाना बिजोलिया था, जो फसल उत्पादन में काफी समृद्ध क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। बिजोलिया के किसानों पर 84 अलग-अलग प्रकार के लगान और कर लगाए गए थे। जिसकी वजह से किसानों का बहुत शोषण हो रहा था। एक तरफ सामंत और जमीदार, दूसरी तरफ रियासत के राजा और तीसरी तरफ ब्रिटिश हुकूमत, इन सबके कर भरते भरते किसान खाली हो जाए थे। उनके कुल उत्पादन का 87% भाग कर चुकाने में ही खत्म हो जाता था।
किसानों को इस शोषण से बचाने के लिए, साधु सीताराम के नेतृत्व में किसान आंदोलन किया जा रहा था। जिस की बागडोर बाद में विजय सिंह पथिक के हाथ में आ गई।
साल 1917 में विजय सिंह पथिक ने किसानों को जागरूक करने के लिए किसान पंचायत बोर्ड (ऊपरमाल पंच बोर्ड) की स्थापना की। जिसके माध्यम से किसानों को उनके हक के प्रति जागरूक किया जाता था।
अलग-अलग गीतों के माध्यम से किसानों के मन से डर को निकाला गया और उन्हें बेवजह के लगाए हुए कर को ना देने के लिए समझाया गया। नतीजन किसानों में भी जोश आने लगा। किसानों ने ठिकाने दार की बेगार करने और लालबाग एवं अधिक लगान देने से मना कर दिया।
पथिक की प्रयास का ही नतीजा था कि साल 1917 में जब ₹14 का युद्ध कर लगाया गया तो किसानों में गुस्सा फूट गया। नतीजन किसानों ने खेती छोड़, सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया। किसानों की बगावत से खफा हो, किसान नेताओं की धरपकड़ शुरू हुई। किसान पंचायत बोर्ड के नेता नारायण पटेल को गिरफ्त में ले लिया गया। नारायण पटेल की गिरफ्तारी के बाद पथिक के नेतृत्व में हजारों किसानों ने ठिकानेदार के घर पर धावा बोल दिया और नारेबाजी शुरू कर दी कि -"या तो पटेल को छोड़ दो या हमें भी जेल दो"। नतीजा ठिकानेदार को पटेल को छोड़ना पड़ा।
इसके बाद किसान आंदोलन की गूंज पूरे देश में फैले लगी। उस समय के प्रचलित समाचार पत्रों में भी इस आंदोलन की ही खबरें छाई रही।
जुल्म के सख्त खिलाफ थे पथिक -
पथिक अपनी रचनाओं में हमेशा ही अन्य आय जाति व्यवस्था सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास पर करारा व्यंग करते नजर आए हैं। दरअसल वह हमेशा ही एक ऐसी व्यवस्था चाहते थे। जिसमें किसी प्रकार का जुल्म ना हो। आर्थिक, जाति, नस्ल, लिंग एवं धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव ना हो।
आज बिजोलिया में 'किसान कमेरा महापंचायत' -
शहीद विजय सिंह पथिक की (Vijay Singh Pathik) 142वीं जयंती के अवसर पर, उनकी कर्मभूमि बिजोलिया गांव में आज 'किसान कमेरा महापंचायत' का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन किसान संगठनों द्वारा मिलकर किया जा रहा है। मुख्य अतिथि के तौर पर राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी, भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद, एवं पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में सपा विधायक अतुल प्रधान, सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी, खादी बोर्ड के पूर्व चेयरमैन डॉक्टर यशवीर सिंह , किसान नेता हरपाल सिंह संघा, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर लक्ष्मण यादव, भारतीय किसान यूनियन के मुखिया गुरनाम सिंह शामिल होंगे।
आयोजकों का दावा है कि इस महापंचायत में देशभर से पथिक जी को चाहने वाले 1 लाख से भी अधिक किसान व मजदूर शामिल होंगे।