यूजीसी ने शिकायतों की जांच और निगरानी के लिए समता समिति(Equity Committee) का प्रावधान रखा है और इसकी संरचना ऐसी है कि सवर्ण प्रतिनिधित्व की संभावना बनी रहती है, क्योंकि समिति के सभी सदस्य किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं किए गए हैं।

UGC Regulations 2026 : यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में बहस और विरोध दोनों तेज हैं। देश की राजनीती की दिशा तय करने वाले प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों में सवर्ण संगठनों ने आपत्ति जताई है। विरोध करने वाले एक वर्ग की दो बड़ी चिंताएं सामने आ रही हैं। पहली, नियमों के बाद संस्थानों में फर्जी शिकायतों का खतरा बढ़ेगा। दूसरी, ओबीसी/एससी/एसटी छात्रों की शिकायतों की जांच करने वाली कमेटी में सवर्ण प्रतिनिधि शामिल नहीं होंगे। लेकिन नियमावली को ध्यान से पढ़ें तो यह दावा पूरी तरह सच नहीं ठहरता। यूजीसी ने शिकायतों की जांच और निगरानी के लिए समता समिति(Equity Committee) का प्रावधान रखा है और इसकी संरचना ऐसी है कि सवर्ण प्रतिनिधित्व की संभावना बनी रहती है, क्योंकि समिति के सभी सदस्य किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं किए गए हैं।
यूजीसी के प्रावधानों के मुताबिक हर उच्च शिक्षण संस्थान में समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre) बनाया जाएगा और इसी के तहत समता समिति का गठन होगा। इस समिति की कमान सीधे संस्थान के शीर्ष अधिकारी यानी कुलपति/डायरेक्टर के हाथ में होगी, क्योंकि वे इसके पदेन अध्यक्ष होंगे। इसका सीधा मतलब है कि समिति में कौन-कौन सदस्य होंगे, यह फैसला बड़ी हद तक संस्थान प्रमुख की समझ, प्राथमिकता और विवेक पर निर्भर करेगा। समिति का समन्वयक पदेन सचिव की भूमिका निभाएगा, जो मामलों का रिकॉर्ड, समन्वय और फॉलो-अप सुनिश्चित करेगा। नियमों में यह भी संकेत दिया गया है कि समन्वयक के तौर पर स्थायी प्रोफेसर या वरिष्ठ फैकल्टी में से ऐसे व्यक्ति को जिम्मेदारी दी जा सकती है, जिसका रुझान वंचित वर्गों के कल्याण और सामाजिक मुद्दों पर काम करने में रहा हो ताकि व्यवस्था सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर असर दिखा सके।
यूजीसी के प्रावधानों के मुताबिक समता समिति को 10 सदस्यीय ढांचे में तैयार किया गया है, ताकि जांच और निगरानी की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या एक वर्ग तक सीमित न रहे। इस समिति में संस्थान प्रमुख (डायरेक्टर/कुलपति) पदेन सदस्य के तौर पर शामिल होंगे। उनके साथ तीन प्रोफेसर या वरिष्ठ फैकल्टी सदस्य, संस्थान का एक नॉन-टीचिंग स्टाफ, और समाज से जुड़े दो ऐसे प्रतिनिधि भी रखे जाएंगे जिनके पास पेशेवर अनुभव हो। छात्र पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है दो छात्र प्रतिनिधि समिति का हिस्सा होंगे, हालांकि उन्हें विशेष आमंत्रित सदस्य की श्रेणी में रखा गया है। सबसे अहम बिंदु यह है कि नियम स्पष्ट रूप से कहता है कि समिति में ओबीसी, एससी, एसटी, महिला और दिव्यांग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होना चाहिए।
नहीं, नियमों में सवर्णों के लिए दरवाजा बंद नहीं किया गया है। वजह साफ है समिति के बाकी 5 सदस्य किसी भी वर्ग, समुदाय या पृष्ठभूमि से चुने जा सकते हैं। यानी अगर संस्थान चाहे तो सवर्ण प्रतिनिधि भी इस समिति का हिस्सा बन सकते हैं। इतना ही नहीं, महिला और दिव्यांग प्रतिनिधित्व की शर्त भी किसी एक जाति तक सीमित नहीं है महिला या दिव्यांग सदस्य सवर्ण समाज से भी हो सकते हैं। लेकिन यहां सबसे अहम ट्विस्ट यही है कि चयन प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा संस्थान प्रमुख के विवेक पर टिका होगा। इसी कारण अलग-अलग विश्वविद्यालयों/कॉलेजों में समता समिति की तस्वीर और संतुलन एक जैसा नहीं रहेगा कहीं प्रतिनिधित्व व्यापक होगा, तो कहीं चयन की प्राथमिकताएं अलग दिशा में जाती दिख सकती हैं।
समता समिति की व्यवस्था सिर्फ कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि जवाबदेही का एक तय कैलेंडर लेकर आती है। नियमों के मुताबिक समिति के सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होगा, जबकि छात्र प्रतिनिधि विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर एक वर्ष तक शामिल रहेंगे। समिति को साल में कम-से-कम दो बैठकें अनिवार्य रूप से करनी होंगी और इन बैठकों में सिर्फ बातचीत नहीं, बल्कि पिछले छह महीनों में आए मामलों उनकी प्रगति रिपोर्ट और अन्य समितियों को भेजे गए प्रकरणों की विस्तृत समीक्षा होगी। इतना ही नहीं, विशेष आमंत्रित सदस्यों को छोड़कर कोरम के लिए कम से कम चार सदस्यों की मौजूदगी जरूरी रखी गई है, ताकि फैसले कम लोगों में न निपटें। इसके साथ ही यूजीसी ने शिकायत दर्ज कराने की राह भी आसान की है नियमों में 24x7 समता हेल्पलाइन का प्रावधान है, जहां किसी भी वक्त शिकायत की जा सकती है। सबसे अहम बात यह है कि भेदभाव की सूचना देने वाले व्यक्ति को अपनी पहचान गोपनीय रखने का अधिकार मिलेगा, ताकि डर, दबाव या बदले की आशंका के बीच भी शिकायत की राह बंद न हो। UGC Regulations 2026